परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 10

परमेश्वर का भय न मानना और बुराई से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आज तुम लोग परमेश्वर के आमने-सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हो; परमेश्वर के बारे में तुम लोगों का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक है। मैं यह बात क्यों कह रहा हूँ? ये बातें कहने का मेरा क्या अभिप्राय है? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ : अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था; लेकिन आजकल लोग ऐसा करने में असफल क्यों रहते हैं? (क्योंकि वे बुरी तरह से भ्रष्ट हैं।) "बुरी तरह से भ्रष्ट"—यह एक सतही घटना है, लेकिन मैं कभी इसे इस तरह नहीं देखूँगा। तुम लोग प्रायः इस्तेमाल किए जाने वाले सिद्धांतों और शब्दों को अपनाते हो, जैसे कि "बुरी तरह से भ्रष्ट," "परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अवज्ञा," "सत्य को पसंद न करना", वगैरह-वगैरह, और हर एक समस्या के सार की व्याख्या करने के लिए तुम लोग इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक दोषपूर्ण तरीका है। भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के मामलों को समझाने के लिए एक ही उत्तर का उपयोग करना सत्य और परमेश्वर की निंदा करने के संदेह उत्पन्न करता है; मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसंद नहीं है। इसके बारे में अच्छी तरह सोचो! तुममें से किसी ने भी इस मामले पर विचार नहीं किया है, परन्तु मैं इसे हर दिन देख सकता हूँ, और हर दिन इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, जब तुम लोग कार्य कर रहे होते हो, तो मैं देख रहा होता हूँ। जब तुम लोग ये कर रहे होते हो, तब तुम इस मामले के सार को महसूस नहीं कर पाते। किंतु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को भी देख सकता हूँ, और मैं इसके सार को महसूस भी कर सकता हूँ। तो फिर यह सार क्या है? इन दिनों लोग परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान पाते और बुराई से दूर क्यों नहीं रह पाते? तुम लोगों के उत्तर दूर-दूर तक इस प्रश्न के सार की व्याख्या नहीं कर सकते, न ही वे इस प्रश्न के सार का समाधान कर सकते हैं। क्योंकि इसका एक स्रोत है जिसके बारे में तुम लोग नहीं जानते। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम लोग इस बारे में सुनना चाहते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को इस समस्या के स्रोत के बारे में बताऊँगा।

जब से परमेश्वर ने कार्य की शुरुआत की, तब से उसने मनुष्य को कैसे देखा है? परमेश्वर ने मनुष्य को बचाया; उसने मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में, उस रूप में देखा है जिसे वह जीतना और बचाना चाहता था, जिसे वह पूर्ण करना चाहता था। अपने कार्य के आरंभ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अपरिचित था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति ने सही परिणाम नहीं दिए, और मनुष्य इस बारे में स्पष्ट नहीं था कि उसे परमेश्वर के साथ कैसे पेश आना चाहिए। इसलिए उसने परमेश्वर के साथ मनमाना व्यवहार किया और जैसा चाहा वैसा किया। क्या परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण था? आरंभ में नहीं था; परमेश्वर के संबंध में मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण उसके बारे में बस कुछ धारणाओं और कल्पनाओं तक ही सीमित था। जो कुछ लोगों की धारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया, और जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया, लेकिन मन ही मन एक संघर्ष चल रहा था और वे उसका विरोध करते थे। आरंभ में यह मनुष्य और परमेश्वर का संबंध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी-सा व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समयावधि के पश्चात्, मनुष्य की समझ में आ गया कि परमेश्वर क्या प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि वही सच्चा परमेश्वर है; वे यह भी जान गए थे कि वे परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकते हैं। उस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में देखता था? मनुष्य अनुग्रह, आशीष एवं प्रतिज्ञाएँ पाने की आशा करते हुए परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में देखता था। उस समय परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में देखता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में देखता था। परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने, उसकी परीक्षा लेने, उसका परीक्षण करने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। किन्तु उस समय जहाँ तक मनुष्य का संबंध था, परमेश्वर एक वस्तु था जिसे वह अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकता था। लोगों ने देखा कि परमेश्वर द्वारा जारी सत्य उन पर विजय पा सकता है, उन्हें बचा सकता है, उनके पास उन चीज़ों को जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे और उस मंज़िल को जिसे वे चाहते थे, प्राप्त करने का एक अवसर है। इस कारण, उनके हृदय में थोड़ी सी ईमानदारी आ गयी, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार हो गए। कुछ समय बीत गया, और लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ सतही और सैद्धांतिक ज्ञान हो जाने से, ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर और उसके द्वारा कहे गए वचनों के साथ, उसके उपदेशों के साथ, उस सत्य के साथ जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ "परिचित" होने लगे थे। इसलिए, लोग इस गलतफहमी का शिकार हो गए कि परमेश्वर अब अजनबी नहीं रहा, और वे पहले ही परमेश्वर के अनुरूप होने के पथ पर चल पड़े हैं। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत से धर्मोपदेश सुने हैं, और परमेश्वर के बहुत से कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी भिन्न-भिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेप एवं अवरोधों के कारण, अधिकांश लोग सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते, न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर पाते हैं। लोग उत्तरोत्तर आलसी होते जा रहे हैं, और उनके आत्मविश्वास में उत्तरोत्तर कमी आती जा रही है। वे उत्तरोत्तर महसूस कर रहे हैं कि उनका परिणाम अज्ञात है। वे कोई अनावश्यक विचार लेकर नहीं आते, और कोई प्रगति नहीं करते; वे बस अनमने ढंग से अनुसरण करते हैं, और धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहते हैं। मनुष्य की वर्तमान अवस्था के संबंध में, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है कि वह मनुष्य को ये सत्य प्रदान करे, उसके मन में अपना मार्ग बैठा दे, और फिर भिन्न-भिन्न तरीकों से मनुष्य को जाँचने के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की व्यवस्था करे। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सत्यों, और अपने कार्य को लेकर ऐसा परिणाम उत्पन्न करना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सके और बुराई से दूर रह सके। मैंने देखा है कि अधिकांश लोग बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धांत मान लेते हैं, उसे कागज़ पर लिखे शब्दों के रूप में मानते हैं, और पालन किए जाने वाले विनियमों के रूप में मानते हैं। जब वे कार्य करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षणों का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते जिसका उन्हें पालन करना चाहिए। यह बात विशेष रूप से तब लागू होती है जब लोगों का बड़े परीक्षणों से सामना होता है; मैंने किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की दिशा में अभ्यास करते नहीं देखा। इस वजह से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है! परमेश्वर द्वारा लोगों का बार-बार, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, परीक्षण कर लेने पर भी उनमें यह दृढ़ संकल्प प्रदर्शित करने की कोई स्पष्ट प्रवृत्ति नहीं होती कि "मैं परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना चाहता हूँ!" चूँकि लोगों का ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते, इसलिए उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति अब वैसी नहीं है जैसी पहले थी, जब उसने उन पर दया दिखायी थी, सहनशीलता, सहिष्णुता और धैर्य प्रदान किया था। बल्कि वह मनुष्य से बेहद निराश है। किसने ये निराशा पैदा की? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अपने अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक माँगें की हैं, और मनुष्य के लिए उसने अनेक परिस्थितियों की व्यवस्था की है। चाहे मनुष्य ने कैसा ही प्रदर्शन क्यों न किया हो, और परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति कैसी भी क्यों न हो, मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास करने में असफल रहा है। मैं इस बात को एक वाक्यांश में समेटूँगा, और उसकी व्याख्या करने के लिए इस वाक्यांश का उपयोग करूँगा जिसके बारे में हमने अभी बात की है कि क्यों लोग परमेश्वर के भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर नहीं चल पाते। यह वाक्यांश क्या है! यह वाक्यांश है : परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार का लक्ष्य, अपने कार्य लक्ष्य मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपना शत्रु, अपना विरोधी मानता है। क्या अब तुम लोग इस विषय को अच्छी तरह समझ गए? मनुष्य की प्रवृत्ति क्या है; परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट है। चाहे तुम लोगों ने कितने ही धर्मोपदेश क्यों न सुने हों, जिन चीज़ों का निष्कर्ष तुम लोगों ने स्वयं निकाला है—जैसे कि परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना, परमेश्वर के प्रति समर्पित होना, परमेश्वर के अनुरुप होने के लिए मार्ग खोजना, पूरा जीवन परमेश्वर के लिए खपाने की इच्छा रखना, परमेश्वर के लिए जीना चाहना—मेरे लिए ये चीज़ें होशोहवास में परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं है, जो कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है। ये केवल ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम लोग अनिच्छा से कुछ नियमों का पालन करते हो। यही नियम लोगों को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग से और भी दूर ले जाते हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर रख देते हैं।

आज जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं वह थोड़ा गंभीर है, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अभी भी आशा है कि तुम लोग जब आने वाले अनुभवों से और आने वाले समय से गुज़रोगे तो तुम वो कर सकोगे जो मैंने अभी तुमसे कहा है। परमेश्वर को ऐसी हवाबाज़ी मत समझो कि जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी हो तो वह मौजूद है, पर जब उसका कोई उपयोग न हो तो वह मौजूद नहीं है। अगर तुम्हारे अवचेतन में ऐसे विचार हैं, तो समझो, तुमने परमेश्वर को पहले ही क्रोधित कर दिया है। शायद ऐसे कुछ लोग हों जो कहते हैं, "मैं परमेश्वर को खाली हवाबाज़ी नहीं मानता, मैं हमेशा उससे प्रार्थना करता हूँ, उसे संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ, मेरा हर काम उसकी अपेक्षाओं के दायरे, मानक और सिद्धांतों के अंतर्गत आता है। मैं निश्चित रूप से अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं कर रहा हूँ।" हाँ, जिस ढंग से तुम अभ्यास कर रहे हो वह सही है! किन्तु जब कोई समस्या आती है तो क्या सोचते हो? जब तुम्हारा सामना किसी मसले से होता है तो तुम किस प्रकार अभ्यास करते हो? कुछ लोग महसूस करते हैं कि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे आग्रह करते हैं तो वह मौजूद होता है। किन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने विचारों के अनुसार ही चलना चाहते हैं। इसका मतलब है कि वे परमेश्वर को खाली हवाबाज़ी मानते हैं और ऐसी स्थिति में उनके दिमाग में परमेश्वर नहीं होता। लोग सोचते हैं कि जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत होती तो उसे मौजूद होना चाहिए, न कि तब जब उन्हें उसकी ज़रूरत न हो। लोगों को लगता है कि अभ्यास करने के लिए अपने विचारों के अनुसार चलना ही काफी है। वे मानते हैं कि वे सबकुछ अपने मन-मुताबिक कर सकते हैं; वे सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है। जो लोग वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, और इस प्रकार की अवस्था में हैं—क्या वे खतरे को दावत नहीं दे रहे? कुछ लोग कहते हैं, "चाहे मैं खतरे को बुलावा दे रहा हूँ या नहीं, मैंने अनेक वर्षों से विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मेरा परित्याग नहीं करेगा, क्योंकि मेरे परित्याग को वह सहन नहीं कर सकता।" अन्य लोग कहते हैं, "मैं तो तब से प्रभु में विश्वास करता आ रहा हूँ जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था। करीब चालीस, पचास वर्ष हो गए, समय की दृष्टि से देखा जाये तो मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के अत्यंत योग्य हूँ और मैं जीवित रहने के अत्यंत योग्य हूँ। चार या पाँच दशकों की इस समय अवधि में, मैंने अपने परिवार और अपनी नौकरी का परित्याग कर दिया। जो कुछ मेरे पास था, जैसे धन, हैसियत, मौज-मस्ती, और पारिवारिक समय, मैंने वह सब त्याग दिया; मैंने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन नहीं खाए; मैंने बहुत-सी मनोरंजन की चीज़ों का आनंद नहीं लिया; मैंने बहुत से दिलचस्प जगहों का दौरा नहीं किया, यहाँ तक कि मैंने उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते। यदि इन सब कारणों से परमेश्वर मुझे नहीं बचा सकता, तो यह मेरे साथ अन्याय है और मैं इस तरह के परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता।" क्या इस तरह का दृष्टिकोण रखने वाले लोग काफी संख्या में हैं? (हाँ, काफी हैं।) ठीक है, तो आज मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझने में मदद करता हूँ : इस प्रकार के दृष्टिकोण वाले लोग अपने ही पाँव में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। क्योंकि वे अपनी कल्पनाओं से अपनी आँखें ढक रहे हैं। ये कल्पनाएँ और उनके निष्कर्ष, उस मानक का स्थान ले लेते हैं जिसे परमेश्वर इंसान से पूरा करने की अपेक्षा करता है, और उन्हें परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से रोकता है। यह उन्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का बोध नहीं होने देता, और उन्हें परमेश्वर की प्रतिज्ञा के किसी भी अंश का त्याग करते हुए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर गँवाने का कारण बनता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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