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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

1.मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए।

2. तुम्हें ऐसा कुछ भी करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक हो, और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए हानिकारक हो। तुम्हें परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही, और परमेश्वर के कार्य का समर्थन करना चाहिए।

3. परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ, और समस्त सम्पत्ति ऐसी भेंटें हैं जो मनुष्य के द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटो का आनन्द याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता है, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनन्द के लिए हैं, परमेश्वर इन भेंटो को केवल याजकों के साथ ही साझा करता है, और उनके किसी भी अंश का आनन्द उठाने के लिए अन्य कोई भी योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और चीजों सहित, जिनका भौतिक रूप से आनन्द लिया जा सकता है) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं। और इसलिए, इन चीज़ों का मनुष्य के द्वारा आनन्द नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनन्द उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि, यहूदा एक ग़द्दार होने के अतिरिक्त, जो कुछ रूपयों की थैली में डाला जाता था, उससे स्वयं की भी सहायता करता था।

4. मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और, इसके अतिरिक्त, उसमें भावनाएँ हैं। अपने आप में, परमेश्वर की सेवा करते समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को एक साथ मिलकर काम करना निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते हुए पाए जाते हैं, उन्हें, बिना किसी अपवाद के, निष्कासित कर दिया जाएगा—किसी को भी छूट नहीं है।

5. तुम परमेश्वर की आलोचना नहीं करोगे, और न ही परमेश्वर से संबंधित बातों पर यूँ ही विचारविमर्श करोगे। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा मनुष्य को करना चाहिए, और वैसे ही बोलना चाहिए जैसे मनुष्य को बोलना चाहिए, और तुम्हें अपनी सीमाओं को पार अवश्य नहीं करना चाहिए और न ही अपनी सीमाओं का उल्लंघन करना चाहिए। अपनी स्वयं की ज़ुबान पर लगाम लगाओ और अपने स्वयं के पदचिह्नों के बारे में सतर्क रहो। यह सब तुम्हें ऐसा कुछ भी करने से रोकेगा जो परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करता है।

6. तुम्हें वही करना चाहिए जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए, और अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को धारण करना चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अयोग्य हो, और परमेश्वर के घर में रहने के अयोग्य हो।

7. कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञा मानने के अलावा, हर चीज में तुम्हें उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है। यहाँ तक कि जरा सा अतिक्रमण भी अस्वीकार्य है। तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में पूर्ण होना चाहिए, और सही या ग़लत का विश्लेषण अवश्य नहीं करना चाहिए; क्या सही या ग़लत है इससे तुम्हारा कोई लेनादेना नहीं है। तुम्हें स्वयं केवल सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता अवश्य करनी चाहिए।

8. जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं ठहराना चाहिए या किसी व्यक्ति पर श्रद्धा नहीं रखनी चाहिए; तुम्हें पहला स्थान परमेश्वर को, दूसरा स्थान उन लोगों को जिनकी तुम श्रद्धा करते हो, और तीसरा स्थान अपने आपको नहीं देना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं लेना चाहिए, और तुम्हें लोगों को—विशेष रूप से उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य, उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

9. तुम्हारे विचार कलीसिया के कार्य के बारे में होने चाहिए। तुम्हें अपनी स्वंय की देह की संभावनाओं की उपेक्षा कर देनी चाहिए, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक होना चाहिए, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के काम के लिए समर्पित करना चाहिए, और परमेश्वर के काम को पहले स्थान पर और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए। यह एक सन्त की शालीनता है।

10. सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं रखते हैं (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारा पति या तुम्हारी पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता, इत्यादि) उन्हें कलीसिया के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है, और इसकी संख्या को ऐसे लोगों से पूरा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो प्रसन्नतापूर्वक विश्वास नहीं करते हैं उन्हें कलीसिया के भीतर अवश्य नहीं ले जाना चाहिए। यह आज्ञा सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और एक दूसरे को स्मरण दिलाना चाहिए, और कोई भी इस का उल्लंघन नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि जब सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं करते हैं अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें अवश्य किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं दिया जाना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं, और कलीसिया में उनके प्रवेश पर किसी भी आवश्यक तरीके से रोक अवश्य लगायी जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया में समस्या आती है, तो तुम स्वयं निर्वासित कर दिये जाओगे या तुम अपने ऊपर प्रतिबंध लगवा लोगे। संक्षेप में, इस मामले में हर किसी का एक उत्तरदायित्व है, किन्तु तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, अथवा व्यक्तिगत बदला लेने के लिए इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन

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