परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है" | अंश 91

इजराइल में किए गए कार्य में और आज के कार्य में बहुत बड़ा अंतर है। यहोवा ने इजराइलियों के जीवन का मार्गदर्शन किया, तो उस समय इतनी ताड़ना और न्याय नहीं था, क्योंकि उस वक्त लोग दुनियादारी बहुत ही कम समझते थे और उनके स्वभाव थोड़े ही भ्रष्ट थे। तब इजराइली पूरी तरह से यहोवा की आज्ञा का पालन करते थे। जब उसने उन्हें वेदियों का निर्माण करने के लिए कहा, तो उन्होंने जल्दी से वेदियों का निर्माण कर दिया; जब उसने उन्हें याजकों का लिबास पहनने के लिए कहा, तो उन्होंने उसकी आज्ञा का पालन किया। उन दिनों यहोवा भेड़ों के झुंड की देखभाल करने वाले चरवाहे की तरह था, जिसके मार्गदर्शन में भेड़ें हरे-भरे मैदान में घास चरती थीं; यहोवा ने उनकी ज़िंदगी को राह दिखाई, उनके खाने, पहनने, रहने और यात्रा करने में उनकी अगुआई की। वह समय परमेश्वर के स्वभाव को स्पष्ट करने का नहीं था, क्योंकि उस समय मनुष्य नवजात था; कुछ ही लोग थे, जो विद्रोही और विरोधी थे, मनुष्यों में मलिनता अधिक नहीं थी, इसलिए लोग परमेश्वर के स्वभाव के लिए विषमता नहीं बन सकते थे। परमेश्वर की पवित्रता मलिनता की धरती से आए लोगों के माध्यम से ज़ाहिर होती है; आज वह मलिनता की धरती के इन लोगों में दिखने वाली मलिनता का इस्तेमाल कर रहा है, और ऐसा करते समय उसके न्याय में उसका स्वरूप प्रकट होता है। वह न्याय क्यों करता है? वह न्याय के वचन इसलिए बोल पाता है, क्योंकि वह पाप से घृणा करता है; अगर वह मनुष्य की विद्रोहशीलता से घृणा न करता, तो वह इतना क्रोधित कैसे हो सकता था? अगर उसके अंदर चिढ़ न होती, कोई नफरत न होती, अगर वह लोगों की विद्रोहशीलता की ओर कोई ध्यान न देता, तो इससे वह मनुष्य जितना ही मलिन प्रमाणित हो जाता। वह मनुष्य का न्याय और उसकी ताड़ना इसलिए कर सकता है, क्योंकि उसे मलिनता से घृणा है, और जिस मलिनता से वह घृणा करता है, वह उसके अंदर नहीं है। अगर उसके अंदर भी विरोध और विद्रोहशीलता होते, तो वह विरोधी और विद्रोही लोगों से घृणा न करता। अगर अंत के दिनों का कार्य इजराइल में किया गया होता, तो उसका कोई मतलब न होता। अंत के दिनों का कार्य सबसे अंधकारमय और सबसे पिछड़े स्थान चीन में ही क्यों किया जा रहा है? यह सब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता दिखाने के लिए है। संक्षेप में, स्थान जितना अधिक अंधकारमय होता है, परमेश्वर की पवित्रता वहाँ उतनी ही स्पष्टता से दिखाई जा सकती है। दरअसल, यह सब परमेश्वर के कार्य के लिए है। केवल आज तुम लोगों को यह एहसास हुआ है कि परमेश्वर तुम लोगों के बीच रहने के लिए स्वर्ग से धरती पर उतर आया है, जो तुम लोगों की मलिनता और विद्रोहशीलता द्वारा दिखाया गया है, और केवल अब तुम लोग परमेश्वर को जानते हो। क्या यह सबसे बड़ा उत्कर्ष नहीं है? दरअसल, तुम लोग चीन में लोगों का वह समूह हो, जिन्हें चुना गया था। और चूँकि तुम्हें चुना गया था और तुमने परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है, लेकिन चूँकि तुम लोग ऐसे महान अनुग्रह के उपयुक्त नहीं हो, इसलिए इससे साबित होता है कि यह सब तुम लोगों के लिए सर्वोच्च उत्कर्ष है। परमेश्वर तुम लोगों के समक्ष आया है, और उसने तुम लोगों को पूरी समग्रता में अपना पवित्र स्वभाव दिखाया है, उसने तुम लोगों को वह सब दिया है और उन तमाम आशीषों का आनंद लेने दिया है, जिसका तुम आनंद ले सकते थे। तुमने न केवल परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का स्वाद लिया है, बल्कि तुम परमेश्वर के उद्धार का, परमेश्वर के छुटकारे का और परमेश्वर के असीम और अनंत प्रेम का स्वाद भी ले चुके हो। तुम लोगों ने, जो कि सबसे मलिन हो, ऐसे महान अनुग्रह का आनंद लिया है—क्या तुम धन्य नहीं हो? क्या यह परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को ऊपर उठाना नहीं है? तुम लोगों के सबसे निम्न कद हैं; तुम स्वाभाविक तौर पर ऐसे महान आशीष का आनंद उठाने के योग्य नहीं हो, फिर भी परमेश्वर ने तुम्हें अपवाद के रूप में उन्नत किया है। क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? अगर तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा पाए, तो अंतत: तुम्हें अपने आप पर शर्म आएगी, और तुम स्वयं को दंडित करोगे। आज तुम्हें न तो अनुशासित किया गया है, न ही तुम्हें दंड दिया गया है; तुम्हारी देह एकदम सही-सलामत है—लेकिन अंतत: ये वचन तुम्हें शर्मिंदा करेंगे। आज तक मैंने किसी को भी खुले आम ताड़ना नहीं दी है; हो सकता है कि मेरे वचन कठोर हों, लेकिन मैं लोगों से किस तरह पेश आता हूँ? मैं उन्हें सांत्वना देता हूँ, उपदेश देता हूँ और याद दिलाता हूँ। मैं ऐसा किसी और कारण से नहीं, बल्कि तुम लोगों को बचाने के लिए करता हूँ। क्या तुम लोग सचमुच मेरी इच्छा नहीं समझते? मैं जो कुछ भी कहता हूँ, उसे तुम लोगों को समझना चाहिए और उससे प्रेरित होना चाहिए। अब जाकर कई लोग समझने लगे हैं। क्या यह विषमता होने का आशीष नहीं है? क्या विषमता होना सर्वाधिक धन्य चीज़ नहीं है? अंतत:, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने जाओगे, तो तुम लोग यह बात कहोगे : "हम विशिष्ट विषमताएँ हैं।" वे तुमसे पूछेंगे, "तुम्हारे विशिष्ट विषमता होने के क्या मायने हैं?" और तुम कहोगे, "हम परमेश्वर के कार्य और उसके महान सामर्थ्य के लिए विषमता हैं। हमारी विद्रोहशीलता परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकाश में लाती है; हम लोग अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की सेवा में काम आने वाली वस्तुएँ हैं, हम लोग उसके कार्य की लटकन हैं और उसके औज़ार भी हैं।" जब वे सुनेंगे, तो उन्हें कुतूहल होगा। तुम आगे कहोगे : "हम लोग परमेश्वर के पूरे ब्रह्मांड के कार्य की पूर्णता और मानव-जाति पर उसकी विजय के नमूने और प्रतिमान हैं। हम लोग पवित्र हों या मलिन, कुल मिलाकर, हम लोग अभी भी तुमसे अधिक धन्य हैं, क्योंकि हमने परमेश्वर को देखा है, और उसके द्वारा हमें जीते जाने के अवसर के ज़रिये परमेश्वर का महान सामर्थ्य ज़ाहिर होता है; केवल हम लोगों के मलिन और भ्रष्ट होने के कारण ही उसका धार्मिक स्वभाव उभरा है। क्या तुम लोग इस प्रकार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में सक्षम हो? तुम लोग पात्र नहीं हो! यह हमारे लिए परमेश्वर के उत्कर्ष के सिवा कुछ नहीं है! भले ही हम अहंकारी न हों, हम गर्व से परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं, क्योंकि कोई भी इस तरह की महान प्रतिज्ञा प्राप्त नहीं कर सकता, और कोई भी ऐसे महान आशीष का आनंद नहीं ले सकता। हम कृतज्ञ महसूस करते हैं कि हम लोग, जो कि इतने मलिन हैं, परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान विषमता के रूप में कार्य कर सकते हैं।" और जब वे पूछेंगे, "नमूने और प्रतिमान क्या होते हैं?" तो तुम कहोगे, "मानव-जाति में हम लोग सबसे विद्रोही और मलिन हैं; हमें शैतान द्वारा सबसे ज्यादा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, और हमारी देह बेहद पिछड़ी हुई और निम्न है। हम लोग शैतान द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। आज हम जीते जाने के लिए परमेश्वर द्वारा मानव-जाति में से चुने गए पहले मनुष्य हैं, और हमने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अवलोकन किया है और उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त किया है; और हम और अधिक लोगों को जीतने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इस प्रकार हम मानव-जाति के बीच जीते जाने वालों के नमूने और प्रतिमान हैं।" इन शब्दों से बेहतर कोई और गवाही नहीं है, और यह तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ अनुभव है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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