परमेश्वर के दैनिक वचन | "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है" | अंश 82

देह के उसके कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, जिसे कार्य के सम्बन्ध में कहा गया है, और वह परमेश्वर जो अंततः कार्य का समापन करता है वह देहधारी परमेश्वर है, और आत्मा नहीं है। कुछ लोग विश्वास करते हैं कि शायद परमेश्वर किसी समय पृथ्वी पर आए और लोगों को दिखाई दे, जिसके बाद वह समस्त मानवजाति का न्याय करेगा, किसी को छोड़े बिना उन्हें एक एक करके जांचेगा। ऐसे लोग जो इस रीति से सोचते हैं वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते हैं। परमेश्वर एक एक करके मनुष्य का न्याय नहीं करता है, और एक एक करके मनुष्य की जांच नहीं करता है; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मानवजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या मनुष्य का मूल-तत्व सब एक जैसा नहीं है? जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य का भ्रष्ट मूल-तत्व है, मनुष्य का मूल-तत्व जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है, और मनुष्य के समस्त पाप हैं। परमेश्वर मनुष्य की छोटी-मोटी एवं मामूली त्रुटियों का न्याय नहीं करता है। न्याय का कार्य प्रतिनिधिक है, और इसे विशेषकर किसी निश्चित व्यक्ति के लिए क्रियान्वित नहीं किया जाता है। इसके बजाए, यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मानवजाति के न्याय को दर्शाने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। लोगों के एक समूह पर व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को क्रियान्वित करने के द्वारा, देह में प्रगट परमेश्वर समूची मानवजाति के कार्य को दर्शाने के लिए अपने कार्य का उपयोग करता है, जिसके पश्चात् यह धीरे धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य भी इस प्रकार ही है। परमेश्वर किसी निश्चित किस्म के व्यक्ति या लोगों के किसी निश्चित समूह का न्याय नहीं करता है, परन्तु समूची मानवजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है—परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, उदाहरण के लिए, या उसके विरुद्ध मनुष्य का अनादर, या परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी डालना, एवं इत्यादि। जिसका न्याय किया जाता है वह परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य का मूल-तत्व है, और यह कार्य अंतिम दिनों के विजय का कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य एवं वचन जिसकी गवाही मनुष्य के द्वारा दी जाती है वे अंतिम दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसे पिछले समयों के दौरान मनुष्य के द्वारा सोचा विचारा गया था। ऐसा कार्य जिसे वर्तमान में देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है वह बिलकुल उस बड़े श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंतिम दिनों के दौरान समूची मानवजाति का न्याय करता है। यह देह एवं उसका कार्य, वचन, और समूचा स्वभाव वे उसकी सम्पूर्णता हैं। यद्यपि उसके कार्य का दायरा सीमित है, और सीधे तौर पर समूचे विश्व को शामिल नहीं करता है, फिर भी न्याय के कार्य का मूल-तत्व समस्त मानवजाति का प्रत्यक्ष न्याय है; यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे केवल चीन के लिए, या कम संख्या के लोगों के लिए आरम्भ किया गया है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य का दायरा समूचे विश्व को शामिल नहीं करता है, फिर भी यह समूचे विश्व के कार्य को दर्शाता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे के भीतर उस कार्य का समापन करता है उसके पश्चात्, वह तुरन्त ही इस कार्य को समूचे विश्व में फैला देगा, उसी रीति से जैसे यीशु के पुनरूत्थान एवं स्वर्गारोहण के बाद उसका सुसमाचार सारी दुनिया में फैल गया था। इसकी परवाह किए बगैर कि यह आत्मा का कार्य है या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे के भीतर सम्पन्न किया गया है, परन्तु जो समूचे विश्व के कार्य को दर्शाता है। अन्त के दिनों के दौरान, परमेश्वर अपनी देहधारी पहचान का उपयोग करते हुए अपने कार्य को करने के लिए प्रगट हुआ है, और देह में प्रगट परमेश्वर वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। इसकी परवाह किए बगैर कि वह आत्मा है या देह, वह जो न्याय का काम करता है वही ऐसा परमेश्वर है जो अंतिम दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। उसके कार्य के आधार पर इसे परिभाषित किया गया है, परन्तु उसके बाहरी रंग-रूप एवं विभिन्न अन्य कारकों के अनुसार इसे परिभाषित नहीं किया गया है। यद्यपि मनुष्य के पास इन वचनों के विषय में धारणाएं हैं, फिर भी कोई देहधारी परमेश्वर के न्याय एवं समस्त मानवजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता है। इसकी परवाह किए बगैर कि किस प्रकार इसका मूल्यांकन किया जाता है, तथ्य, आखिरकार, तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि "यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया है, परन्तु यह देह परमेश्वर नहीं है।" यह बकवास है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर को छोड़कर किसी के भी द्वारा नहीं किया जा सकता है। जबकि इस कार्य को पहले से ही पूरा किया जा चुका है, तो इस कार्य के बाद मनुष्य के विषय में परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रगट नहीं होगा; दूसरे देहधारी परमेश्वर ने पहले से ही समूचे प्रबंधन के सभी कार्यों का समापन कर लिया है, और परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि वह मनुष्य है जिसका न्याय किया जाता है, मनुष्य जो हाड़-मांस का है और उसे भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान का आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, न्याय के कार्य को आत्मिक संसार में सम्पन्न नहीं किया जाता है, परन्तु मनुष्यों के बीच किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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