सत्य का अनुसरण कैसे करें (14) भाग एक
पिछली बार हमने लोगों के अनुसरणों, आदर्शों और आकांक्षाओं को जाने देने के व्यापक विषय में परिवार से जुड़ी चीजों पर संगति की थी—हमारी संगति परिवार विषय के किस खंड पर थी? (पिछली बार परमेश्वर ने परिवार से मिली शिक्षा से आने वाली कुछ कहावतों पर संगति की थी, जैसे कि “साथ-साथ चल रहे किन्हीं भी तीन लोगों में कम-से-कम एक ऐसा होता है जो मेरा शिक्षक बन सकता है,” “लोगों की नजरों में प्रतिष्ठित बनना हो, तो तुम्हें तब कष्ट झेलने होंगे जब कोई देखता न हो,” “जैसे बाड़ को तीन खूँटों के सहारे की जरूरत होती है, वैसे ही एक योग्य मनुष्य को तीन अन्य लोगों का सहारा चाहिए,” “महिला उन लोगों के लिए सजेगी-सँवरेगी जो उसकी तारीफ करते हैं, जबकि एक सज्जन उसे समझने वालों के लिए अपनी जान न्योछावर कर देगा,” “बेटियों को अमीर बच्चों की तरह पाल-पोसकर बड़ा करना चाहिए, और बेटों को गरीब बच्चों की तरह,” “लोगों में ऊँचा आईक्यू नहीं बल्कि सिर्फ ऊँचा ईक्यू होना चाहिए,” “किसी के घंटी बजाने पर उसकी आवाज सुनो; किसी के बोलने पर उसकी वाणी सुनो,” और “माता-पिता हमेशा सही होते हैं।” कुल मिलाकर इन आठ कहावतों पर चर्चा हुई थी।) हमने परिवार से मिली शिक्षा को जाने देने के बारे में संगति की थी, जिसकी विषयवस्तु में किसी व्यक्ति के विचारों के प्रति परिवार से मिली शिक्षा और अनुकूलन शामिल थे। कुछ कहावतों पर विस्तार से संगति की गई थी, जबकि कुछ का केवल संक्षेप में जिक्र किया गया था और उन पर विशेष संगति नहीं की गई थी। हर व्यक्ति के जीवन में परिवार का बहुत अधिक महत्त्व होता है। यह वह स्थान है जहाँ लोगों की यादें बनती हैं, वे बड़े होते हैं और उनके विविध विचार आकार लेने लगते हैं। लोग कैसा आचरण और व्यवहार करें, चीजों से कैसे निपटें, दूसरों से कैसे मिलें-जुलें, विभिन्न हालात का कैसे सामना करें, और इन हालात का सामना होने पर फैसले कैसे करें और कैसे नजरियों और दृष्टिकोणों से इन चीजों को सँभालें, भले ही उनके विचार और नजरिये शुरुआती हों या ज्यादा ठोस, ये सभी मुख्य रूप से परिवार से मिली शिक्षा पर आधारित होते हैं। यानी बाकायदा समाज में कदम रखने और सामाजिक समूहों से जुड़ने से पहले लोगों के विचारों और नजरियों का अंकुरण परिवार में ही होता है। इसलिए परिवार सबके लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसकी महत्ता शारीरिक विकास से बहुत आगे होती है; ज्यादा अहम यह है कि समाज में कदम रखने से पहले लोग घर में ऐसे बहुत-से विचार और नजरिये सीख लेते हैं जिन्हें समाज, सामाजिक समूहों और अपने आगामी जीवन को देखने के तरीके में अपनाया जाना चाहिए। हालाँकि ये विचार और नजरिये किसी व्यक्ति के परिपक्व होते समय खास या सही ढंग से परिभाषित नहीं होते, फिर भी ये विविध विचार और नजरिये, और ये विविध तरीके, नियम और दुनिया से निपटने के साधन भी समाज में कदम रखने से पहले ही उनके माता-पिता, बड़े-बूढ़ों और परिवार के दूसरे सदस्यों द्वारा बुनियादी और मुख्य रूप से उनके मन में बिठाकर उन्हें प्रभावित और शिक्षा से प्रभावित कर दिया जाता है। मन में बैठाने, प्रभावित करने और शिक्षा से प्रभावित करने का यह अभ्यास तब कराया जाता है जब लोग अपने परिवार में बड़े हो रहे होते हैं; इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए परिवार इतना महत्वपूर्ण होता है। बेशक, इस महत्त्व का निशाना महज उस स्तर पर होता है जब लोग समाज में कदम रखकर सामाजिक समूहों में शामिल होते हैं, और प्रौढ़ अवस्था के जीवन और अस्तित्व में प्रवेश करते हैं—यह शारीरिक अस्तित्व के स्तर तक सीमित होता है। यह दिखाता है कि परिवार से मिली शिक्षा समाज और प्रौढ़ जीवन में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के लिए कितनी अहम होती है। यानी जब लोग वयस्क होकर समाज में कदम रखते हैं तो सांसारिक आचरण के उनके फलसफे का ज्यादातर अंश अपने माता-पिता की विरासत और परिवार के प्रभाव से उपजता है। इस परिप्रेक्ष्य से यह भी कहा जा सकता है कि समाज की सबसे छोटी इकाई के रूप में परिवार किसी व्यक्ति के विचारों को गढ़ने के साथ ही दुनिया से निपटने के उसके विविध तौर-तरीकों, सिद्धांतों और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को भी आकार देने में सर्वोपरि भूमिका निभाता है। यह मानकर कि ये विविध विचार, नजरिये, दुनिया से निपटने के तौर-तरीके और जीवन के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक हैं, सत्य के अनुरूप नहीं हैं, सत्य से असंबद्ध हैं या यह भी कहा जा सकता है कि ये सत्य के प्रतिकूल हैं और परमेश्वर से नहीं उपजते, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि लोग अपने परिवार द्वारा दी गई शिक्षा को त्याग दें। परिवार से मिली शिक्षा के परिणामों पर विचार करने पर हम देखते हैं कि यह सत्य का खंडन करती है और उसके अनुरूप नहीं है, परमेश्वर का विरोध करती है और अनिवार्य रूप से कहा जा सकता है कि परिवार वह स्थान है जहाँ शैतान मानवता को भ्रष्ट करता है, लोगों को परमेश्वर को नकारने, उसका प्रतिरोध करने और जीवन के गलत पथ पर चलने की ओर आगे बढ़ाता है। इस नजरिये से क्या यह कहा जा सकता है कि समाज की सबसे छोटी इकाई के रूप में परिवार वह स्थान है जहाँ लोग शुरू में भ्रष्ट किए जाते हैं? ऐसा कहना कि शैतान और सामाजिक चलन लोगों को भ्रष्ट करते हैं एक व्यापक परिप्रेक्ष्य है, मगर विशिष्ट बात की जाए तो परिवार को वह स्थान मानना चाहिए जहाँ लोग शुरू में भ्रष्टता और नकारात्मक विचार, बुरी प्रवृत्तियाँ और शैतान के नजरिये स्वीकार करते हैं। और भी विशिष्ट रूप से कहें तो व्यक्ति जिस भ्रष्टता को स्वीकार करता है वह उसके माता-पिता, बड़े-बूढ़ों, परिवार के दूसरे सदस्यों, और उसके संपूर्ण परिवार की प्रथाओं, मूल्यों, परंपराओं, वगैरह से उपजती है। किसी भी स्थिति में परिवार एक आरंभ बिंदु है जहाँ लोग भ्रष्टता से मिलते हैं, शैतान के बुरे विचार और प्रवृत्तियाँ स्वीकारते हैं, और यहीं लोग अपने शुरुआती रचनात्मक वर्षों में विविध भ्रष्ट और बुरे विचार स्वीकार करते हैं। लोगों को भ्रष्ट करने में परिवार वह भूमिका निभाता है जो पूरा समाज, सामाजिक प्रवृत्तियाँ और शैतान नहीं निभा सकते, यानी समाज में कदम रखकर सामाजिक समूहों में शामिल होने से पहले ही बच्चों को परिवार शैतान की बुरी प्रवृत्तियों के विविध विचारों और नजरियों से मिलवा देता है। परिवार का ढाँचा चाहे जैसा भी हो, यह तुम्हारे शैतानी विचारों और नजरियों का प्राथमिक स्रोत है। इसलिए, विविध गलत विचारों और नजरियों को जाने देने में लोगों की मदद करने के लिए यह जरूरी है कि सिर्फ समाज में व्याप्त गलत विचारों और नजरियों को ही नहीं बल्कि परिवार से मिली शिक्षा के गलत विचारों और नजरियों और साथ ही दुनिया से निपटने के सिद्धांतों को भी पहचान कर उनका विश्लेषण किया जाए। परिवार ही ऐसी चीज है जो सारे मानव समाज का अंग है, न कि कलीसिया या परमेश्वर का घर, और स्वर्ग का राज्य तो बिल्कुल भी नहीं। यह भ्रष्ट मानवता के बीच रची गई समाज की सबसे छोटी इकाई मात्र है, और यह सबसे छोटी इकाई भी भ्रष्ट मानवता से ही बनी है। इसलिए, अगर कोई व्यक्ति गलत विचारों और नजरियों की विवशताओं, बंधनों और मुसीबतों से खुद को आजाद करना चाहता हो, तो उसे पहले परिवार से मिली शिक्षा के विविध विचारों और नजरियों पर चिंतन कर उन्हें तब तक समझना और उनका विश्लेषण करना चाहिए, जब तक कि वह उस मुकाम पर न पहुँच जाए जहाँ वह उन्हें जाने दे सके। लोगों को परिवार से मिली शिक्षा को त्यागने के अभ्यास का यह एक सही सिद्धांत है।
पहले हमने लोगों को परिवार से मिली शिक्षा पर संगति की थी, जिसका संबंध समाज में कदम रखते समय उनके जीवन दृष्टिकोण, जीवित रहने के नियमों, दुनिया से व्यवहार और उससे निपटने के तरीकों के सिद्धांतों और खेल के कुछ अलिखित नियमों से है। इस विषयवस्तु से जुड़े जीवन के कुछ दृष्टिकोण क्या हैं? मिसाल के तौर पर, “एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है,” और “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है।” दुनिया से निपटने के कुछ ऐसे सिद्धांत क्या हैं जिन्हें परिवार लोगों के मन में बैठाते हैं? इनके उदाहरण हैं : “सामंजस्य एक निधि है; धीरज एक गुण है,” और “समझौते से संघर्ष सुलटना आसान हो जाएगा।” इनके अलावा और क्या? (“जैसे बाड़ को तीन खूँटों के सहारे की जरूरत होती है, वैसे ही एक योग्य मनुष्य को तीन अन्य लोगों का सहारा चाहिए,” और “किसी के घंटी बजाने पर उसकी आवाज सुनो; किसी के बोलने पर उसकी वाणी सुनो।” ये दुनिया से निपटने के तरीके और सिद्धांत भी हैं।) क्या खेल के कुछ सामाजिक नियम होते हैं? जैसे कि “जो पक्षी अपनी गर्दन उठाता है गोली उसे ही लगती है”? (हाँ।) “जो ज्यादा बोलता है वह अधिक गलतियाँ करता है।” और कुछ? (अपनी ही दवा का स्वाद चखो।) एक यह भी है, लेकिन हमने पिछली बार इस पर संगति नहीं की थी। इसके अलावा, तुम्हारे माता-पिता ने अक्सर तुम्हें बताया, “बाहर दुनिया में तुम्हारा फैसला पक्का, तुम्हारी बोली मीठी और नजर पैनी होनी चाहिए। तुम्हें ‘अपनी आँखें हर रास्ते के लिए खोले रखो, कान हर दिशा में लगाए रखो।’ अपनी चाल-ढाल में इतने ज्यादा स्थिर मत रहो।” साथ ही यह भी है, “किसी का अभिनंदन करना कभी आहत नहीं करता,” और “जहाँ भी रहो तुम्हें बहाव के साथ जाना चाहिए। जब हर कोई अपराधी हो तो कानून लागू नहीं किया जा सकता। शंका होने पर भीड़ के पीछे चलो।” ये सभी खेल के नियमों के प्रकार हैं। फिर ऐसी कहावतें भी हैं, “महिला उन लोगों के लिए सजेगी-सँवरेगी जो उसकी तारीफ करते हैं, जबकि एक सज्जन उसे समझने वालों के लिए अपनी जान न्योछावर कर देगा,” और “दुनिया में बदसूरत महिलाएँ हैं ही नहीं, सिर्फ आलसी महिलाएँ हैं।” ये किस श्रेणी की हैं? ये दैनिक जीवन की श्रेणी की हैं; ये तुम्हें बताती हैं कि कैसे जिएँ और अपने भौतिक शरीर से कैसे पेश आएँ। फिर ऐसी कहावतें भी हैं, “माता-पिता हमेशा सही होते हैं,” “माँ दुनिया में सबसे अच्छी होती है,” “सभी चीजें प्रकृति और परिवेश द्वारा नियत होती हैं,” और “बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है।” ये पारिवारिक स्नेह और भावना के विचारों और नजरियों से जुड़े होते हैं। साथ ही लोग अक्सर कहते हैं, “मृत व्यक्ति जीवित लोगों की नजरों में महान होते हैं”—मरने के बाद व्यक्ति महान हो जाता है। अगर तुम ऊँची हैसियत चाहते हो, यह चाहते हो कि लोग तुम्हारे बारे में अच्छा बोलें, तुम्हारा आदर करें, तो तुम्हें मरना होगा। मरने के बाद तुम महान हो जाओगे। “मृत व्यक्ति जीवित लोगों की नजरों में महान होते हैं”—यह तर्क हास्यास्पद है क्या? वे कहते हैं, “किसी के मर जाने के बाद उसके बारे में कुछ बुरा मत बोलो। मृत व्यक्ति जीवित लोगों की नजरों में महान होते हैं। उन्हें थोड़ा आदर दो!” उस व्यक्ति ने जितने भी बुरे काम किए हों, मरने के बाद वह महान हो जाता है। क्या यह लोगों में अच्छे-बुरे को पहचानने का घोर अभाव और आचरण में सिद्धांतहीनता नहीं दर्शाता? (बिल्कुल।) “माता-पिता हमेशा सही होते हैं।” पिछली बार हमने इस पर विस्तार से संगति की थी। ये दूसरी कहावतें, जैसे कि “बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है,” और “सभी चीजें प्रकृति और परिवेश द्वारा नियत होती हैं,” संगति का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन क्या इन्हें समझना आसान नहीं है? क्या कहावत “बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है” सही है? इससे ऐसा लगता है मानो पिता की दी हुई शिक्षा बहुत अहम होती है। कोई पिता अपने बच्चों को किस प्रकार के पथ पर आगे बढ़ा सकता है? क्या वह तुम्हें सही पथ पर ले जा सकता है? क्या वह तुम्हें परमेश्वर की आराधना करने और एक सच्चा नेक इंसान बनने की ओर ले जा सकता है? (नहीं।) तुम्हारे पिता तुम्हें बताते हैं, “पुरुष आसानी से आँसू नहीं बहाते,” लेकिन तुम छोटे हो, और जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारे साथ कुछ गलत हुआ है तो तुम रोते हो। तुम्हारे पिता तुम्हें डाँट कर कहते हैं, “आँसू रोको! असली पुरुष बनो। हर छोटी-मोटी चीज पर रो देते हो, निकम्मे कहीं के!” इसके बाद तुम सोचते हो, “मैं आँसू नहीं बहा सकता; अगर रोया तो निकम्मा बन जाऊँगा।” तुम अपने आँसू रोक लेते हो, रोने की हिम्मत नहीं करते, और रात को लिहाफ में छिपकर रोते हो। पुरुष होने के नाते तुम्हें सहज रूप से अपनी भावनाएँ व्यक्त करने या जताने का भी हक नहीं है; तुम्हें रोने का भी हक नहीं है, जब भी यह महसूस करो कि तुम्हारे साथ गलत हुआ है, तुम्हें आँसू भीतर ही रोक लेने होंगे। तुमने अपने पिता से यही शिक्षा पाई है, और “बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है” का सच्चा अर्थ यही है। तुम्हारे पिता, तुम्हारी माँ और बड़ी पीढ़ी सब यह कहकर इस शिक्षा से चिपके रहते हैं, “तुम, लड़के हो, किसी भी चीज पर रो बैठते हो, अपने साथ कुछ भी गलत महसूस होने पर रो पड़ते हो, बाहर मार खाने पर भी रोते हो। निकम्मे कहीं के! उन्होंने तुम्हें पीटा, तो तुमने पलटकर क्यों नहीं पीटा? उन्होंने तुम्हें पीटा, इसलिए अब उनके साथ मत खेलना। वे तुम्हें दोबारा दिखें और तुम्हें लगे कि तुम उन्हें पीट सकते हो, तो पीटना; अगर नहीं तो दूर भाग जाना। देखो हान शिन[क] ने किसी दूसरे की टाँगों के बीच से रेंगने पर मजबूर किए जाने की बेइज्जती कैसे झेली। वह नहीं रोया; ऐसा होता है असली पुरुष!” पिता अपने बेटों को ऐसी शिक्षा देते हैं और उनके मन में एक असली पुरुष होने का विचार बैठा देते हैं। पुरुष अपनी मुश्किलें बयान नहीं कर सकते और आँसू नहीं बहा सकते; उन्हें आँसू अपने भीतर रोके रखने होते हैं। तुम्हीं बताओ, पुरुषों को कितना अन्याय सहना चाहिए? इस समाज में, पुरुषों को अपने परिवारों का साथ देना चाहिए, अपने बड़े-बूढ़ों के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखानी चाहिए, और वे कितने भी थके हुए हों, शिकायत करने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कितना भी अन्याय सहा हो, वे अपनी भड़ास नहीं निकाल सकते। क्या यह पुरुषों के साथ अन्याय नहीं है? (बिल्कुल है।) जब तुम लोगों के पिताओं ने तुम्हें इस तरह शिक्षा दी, तो तुम्हें कैसा लगा? कभी तुम्हारा रोने का मन हुआ, तो तुम्हारे पिता ने क्या कहा? “मैं जिंदगी भर होशियारी से जिया और बढ़िया करने को उत्सुक रहा। मैंने भला तुझ जैसा मरियल बच्चा कैसे पाला? तेरी उम्र में तो मैं अपने परिवार को सहारा देने लगा था। और एक तू है, लाड़-दुलार पाकर बिगड़ गया, निकम्मा कहीं का!” तुम लोगों को कैसा लगा? तुम्हारे माता-पिता और दादा-दादी ने तुम्हें यह कहकर शिक्षा दी : “पुरुष परिवार का स्तंभ होता है, हम तुझे सहारा क्यों देते हैं? तुझे कॉलेज क्यों भेजते हैं? यह परिवार को सहारा देने में तेरी मदद करने के लिए है, इसलिए नहीं कि कुछ भी होने पर तू महसूस करे कि तेरे साथ गलत हुआ है और तू रोए।” तुम लोगों के पिताओं और बड़े-बूढ़ों ने जब ये बातें कहीं, तो तुम लोगों को कैसा लगा? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारे साथ गलत हुआ है या तुमने इसे हल्के में लिया था? (मैंने अवसादग्रस्त महसूस किया था, लगा मेरे साथ गलत हुआ है।) क्या तुम्हारे पास इसे मंजूर करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था, या क्या तुमने दिल में नाराजगी महसूस की थी? (मुझे नाराजगी महसूस हुई थी, पर मुझे इसे मंजूर करना पड़ा था।) तुमने ऐसा क्यों किया? (क्योंकि मुझे लगा कि ऐसी हालत या सामाजिक प्रणाली में मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।) समाज पुरुषों को ऐसी ही स्थिति में रखता है। वे ऐसी सामाजिक परिस्थिति में पैदा होते हैं और किसी के पास कोई विकल्प नहीं होता। तुमने अपने माता-पिता और बड़े-बूढ़ों से जो शिक्षा पाई वह समाज से उपजी थी; विचारधारा की यह शिक्षा पाने के बाद उन्होंने समाज से मिले ये विचार तुम्हारे भीतर बिठा दिए। वास्तविकता में, जब उन्होंने अपने शुरुआती रचनात्मक वर्षों में ये विचार और नजरिये स्वीकार किए थे, तब उन्होंने भी अनिच्छा से ही ऐसा किया था। बड़े होने पर उन्होंने ये विचार अगली पीढ़ी में पहुँचा दिए। उन्होंने यह नहीं सोचा कि नई पीढ़ी को ये विचार और नजरिये स्वीकार करने चाहिए या नहीं, ये सही हैं या नहीं, क्योंकि वे इसी तरह बड़े हुए थे। उन्होंने सोचा कि लोगों को इसी तरह जीना चाहिए; तुम्हारे साथ गलत हुआ भी हो तो क्या फर्क पड़ता है, अहम चीज यह है कि इन विचारों को स्वीकार करने से तुम्हें समाज में पाँव जमाने और दूसरे लोगों से धौंस न खाने में मदद मिलेगी। उन्होंने भी ये मुसीबतें सहीं, तुम्हारी तरह अवसादग्रस्त और रोषपूर्ण महसूस किया, फिर भी ये विचार और नजरिये तुम्हें क्यों पहुँचा दिए? एक कारण यह है कि उन्होंने समाज से विविध विचार और नजरिये सहज ही स्वीकार कर लिए जिससे उन्हें सामाजिक प्रवृत्तियों में घुल-मिल जाने और समाज में अपने पाँव जमाने में मदद मिली। सभी लोग इन पर सवाल उठाए बिना या इनसे दूर होने या इनके खिलाफ विद्रोह करने की इच्छा किए बिना, इन विचारों और नजरियों का निर्देशों और मानदंडों के रूप में पालन करते हैं। जीवित रहने के लिए यह एक पहलू है। दूसरा मुख्य पहलू यह है कि लोगों में सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच भेद करने की काबिलियत नहीं होती है। ऐसा क्यों है? इसलिए कि लोग सत्य को नहीं समझते, और उनमें जीवित रहने, दुनिया से निपटने या जिस पथ पर उन्हें चलना चाहिए, उस बारे में सही विचारों और नजरियों का अभाव होता है। समाज के अनुसार ढलने, उसमें शामिल होने, और इस समाज और सामाजिक समूहों में जीवित रहने के लिए लोगों को सक्रिय या निष्क्रिय रूप से दुनिया से निपटने के लिए समाज द्वारा तय किए गए विविध सिद्धांतों और समाज द्वारा स्थापित खेल के नियमों को स्वीकार करना पड़ता है। ढलने का प्रयोजन यह है कि लोग समाज में खुद को स्थापित कर सकें और जीवित रह सकें। लेकिन चूँकि लोग सत्य को नहीं समझते, इसलिए उनके पास समाज द्वारा तय किए गए दुनिया से निपटने के सिद्धांतों और खेल के नियमों को चुनने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होता है। इसलिए एक पुरुष के रूप में जब तुम्हारे पिता ने तुम्हें यह सिखाया, “पुरुष आसानी से आँसू नहीं बहाते,” तो अपने साथ गलत महसूस करके और अपनी भड़ास निकालना चाह कर भी तुम्हारे पास उनकी बात काटने का कोई तरीका नहीं था, न ही तुम यह समझ पाए कि वे क्या कह रहे थे। आखिरकार इसे दिल से स्वीकार करने के पीछे तुम्हारा कारण यह था कि “हालाँकि मेरे पिता की बातें सुनने में थोड़ी कठोर और मुश्किल हैं, और भले ही इनको स्वीकार करना मेरी इच्छा के विरुद्ध है, फिर भी वह ये सब मेरी भलाई के लिए कर रहे हैं, इसलिए मुझे इन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए।” अपनी अंतरात्मा और संतानोचित निष्ठा के कारण लिहाज कर लोगों को इन विचारों और नजरियों को स्वीकार करना पड़ता है। परिवार से मिली शिक्षा का चाहे कोई भी पहलू हो, वे निरंतर ऐसी दशा में होते हैं, इन तरीकों से लगातार उनके मन में ये बातें तब तक बिठाई जाती हैं जब तक वे अनिच्छा से ही सही इन्हें स्वीकार नहीं कर लेते। निरंतर स्वीकृति की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ये गलत और नकारात्मक विचार और नजरिये धीरे-धीरे रिसकर व्यक्ति के अंतरतम में समा जाते हैं, या धीमे-धीमे और लगातार उनके विचारों और नजरियों में बैठ जाते हैं, और ऐसे तमाम आधार बन जाते हैं जिनके जरिये वे दुनिया से व्यवहार कर उससे निपटते हैं। इस प्रक्रिया को भी भ्रष्ट होना कहना सही होगा क्योंकि गलत विचार और नजरिये स्वीकारना भी भ्रष्टता की प्रक्रिया है। तो लोगों को किसने भ्रष्ट किया? भावार्थ में, उन्हें शैतान ने, बुरी प्रवृत्तियों ने भ्रष्ट किया; और विशेष अर्थ में, उनके परिवार ने उन्हें भ्रष्ट किया, और भी अधिक विशेष अर्थ में उनके माता-पिता ने उन्हें भ्रष्ट किया। अगर मैंने दस वर्ष पहले यह कहा होता, तो शायद तुम लोगों में से कोई भी इसे स्वीकार न कर पाता और तुम सब मुझसे बैर रख लेते। लेकिन अब तुममें से ज्यादातर लोग इस वक्तव्य को तर्कपूर्ण ढंग से सही मानकर “आमीन” कह सकते हो, है कि नहीं? (बिल्कुल।) यह वक्तव्य सही क्यों है? यह समझने के लिए लोगों को धीरे-धीरे अपने पूरे अनुभव के दौरान इसे अच्छी तरह समझना होगा। तुम्हारी समझ जितनी विशिष्ट और गूढ़ होगी, और तुम्हारे अनुभवों में इसकी जितनी झलक मिलेगी, उतना ही ज्यादा तुम इस वक्तव्य से सहमत हो सकोगे।
बहुत संभव है कि परिवार से मिली शिक्षा में दुनिया से व्यवहार करने और निपटने के खेल के और भी बहुत-से नियम शामिल हों। मिसाल के तौर पर, माता-पिता अक्सर कहते हैं, “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए; तुम अत्यंत मूर्ख और भोले हो।” माता-पिता अक्सर ऐसी बातें दोहराते रहते हैं, और बड़े-बूढ़े यह कह कर तुम्हें तंग करते हैं, “नेक इंसान बनो, दूसरों को नुकसान मत पहुँचाओ, लेकिन तुम्हें खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए। सभी लोग ख़राब हैं। शायद तुम देखो कि कोई बाहर से तुमसे मीठी बातें करता है, मगर तुम्हें नहीं पता वह भीतर क्या सोच रहा है। लोगों के दिल उनकी त्वचा के नीचे छिपे होते हैं, और एक बाघ का चित्र बनाते समय तुम उसकी खाल दिखाते हो, उसकी हड्डियाँ नहीं; इंसान को जानने में, तुम उसकी शक्ल-सूरत को जान सकते हो, लेकिन उसके दिल को नहीं।” क्या इन वाक्यांशों का कोई सही पहलू भी है? इनमें से प्रत्येक को शाब्दिक रूप से देखें, तो ऐसे वाक्यांशों में कुछ गलत नहीं है। कोई व्यक्ति भीतर गहरे क्या सोच रहा है, उसका दिल शातिर है या दयालु, नहीं जाना जा सकता। किसी व्यक्ति की आत्मा के भीतर झाँकना नामुमकिन है। इन वाक्यांशों का निहितार्थ जाहिर तौर पर सही है, लेकिन यह एक प्रकार का सिद्धांत ही है। इन दो वाक्यांशों से लोग आखिरकार दुनिया से निपटने का कौन-सा सिद्धांत निकाल पाते हैं? वह यह है कि “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए।” पुरानी पीढ़ी यही कहती है। माता-पिता और बड़े-बूढ़े अक्सर यह कहते हैं, और वे तुम्हें यह कह कर निरंतर परामर्श देते हैं, “सावधान रहो, मूर्ख मत बनो, और अपने दिल की पूरी बात प्रकट मत करो। खुद को सुरक्षित रखना सीखो, और सतर्क रहो। अच्छे दोस्तों के सामने भी अपनी असलियत या अपना दिल खोल कर मत रखो। उनके लिए अपनी जान दाँव पर मत लगाओ।” क्या तुम्हारे बड़े-बूढ़ों की यह चेतावनी सही है? (नहीं, यह लोगों को कपटपूर्ण तरीके सिखाती है।) सैद्धांतिक तौर पर, इसका एक अच्छा प्राथमिक उद्देश्य है : तुम्हारी रक्षा करना, तुम्हें खतरनाक हालात में गिरने से रोकना, तुम्हें दूसरों से हानि होने या धोखा खाने से बचाना, तुम्हारे भौतिक हितों, निजी सुरक्षा और तुम्हारे जीवन को सुरक्षित रखना। इसका उद्देश्य तुम्हें मुसीबत, कानूनी मुकदमों और प्रलोभनों से बचाना और हर दिन अमन-चैन और खुशी से जीने देना है। माता-पिता और बड़े-बूढ़ों का मुख्य उद्देश्य बस तुम्हारी रक्षा करना है। लेकिन वे जिस तरह तुम्हारी रक्षा करते हैं, पालन करने के लिए तुम्हें जिन सिद्धांतों का परामर्श देते हैं, और जो विचार वे तुम्हारे मन में बैठाते हैं वे सब सही नहीं हैं। वैसे उनका मुख्य उद्देश्य सही है, पर जो विचार वे तुम्हारे भीतर बैठाते हैं वे अनजाने ही तुम्हें अति की ओर आगे बढ़ाते हैं। ये विचार तुम्हारे दुनिया से निपटने के तरीके के सिद्धांत और आधार बन जाते हैं। जब तुम सहपाठियों, सहयोगियों, सहकर्मियों, वरिष्ठ अधिकारियों और समाज के हर प्रकार के व्यक्ति, जीवन के हर वर्ग के लोगों से मिलते-जुलते हो, तो तुम्हारे भीतर तुम्हारे माता-पिता द्वारा बैठाए गए रक्षात्मक विचार अनजाने ही तुम्हारे परस्पर रिश्तों से जुड़े मामलों को संभालते समय तुम्हारा सबसे बुनियादी जंतर और सिद्धांत बन जाते हैं। यह कौन-सा सिद्धांत है? यह है : मैं तुम्हें हानि नहीं पहुँचाऊँगा, लेकिन मुझे हमेशा सतर्क रहना होगा ताकि मैं तुम्हारे छल-कपट से बच सकूँ, मुश्किलों या कानूनी मुकदमों में फँसने से बच सकूँ, अपने पारिवारिक धन-दौलत को डूबने से बचा सकूँ, अपने परिवार के लोगों का अंत होने और खुद को जेल जाने से बचा सकूँ। ऐसे विचारों और नजरियों के नियंत्रण में जीते हुए, दुनिया से निपटने के ऐसे रवैये वाले सामाजिक समूह में जीते हुए तुम सिर्फ ज्यादा उदास ही हो सकते हो, ज्यादा थक सकते हो, तन-मन दोनों से थक कर चूर हो सकते हो। आगे चलकर तुम इस दुनिया और मानवता के प्रति और ज्यादा प्रतिरोधी और विरक्त हो जाते हो, और उनसे ज्यादा घृणा कर सकते हो। दूसरों से घृणा करते हुए तुम खुद को कम आँकने लगते हो, ऐसा महसूस करते हो कि तुम एक इंसान जैसे नहीं जी रहे हो, बल्कि एक थका-हारा, उदासी भरा जीवन जी रहे हो। दूसरों से होने वाली हानि से बचने के लिए तुम्हें निरंतर सतर्क रहना होता है, और अपनी इच्छा के विरुद्ध काम करना पड़ता है, बातें कहनी पड़ती हैं। अपने हितों की रक्षा और निजी सुरक्षा के प्रयास में तुम अपने जीवन के हर पहलू में एक नकली मुखौटा पहन लेते हो, छद्मवेश में आ जाते हो, और कभी भी सत्य वचन कहने की हिम्मत नहीं करते। इस स्थिति में, जीवित रहने के इन हालात में, तुम्हारी अंतरात्मा को मुक्ति या आजादी नहीं मिल पाती। तुम्हें अक्सर किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है जिससे तुम्हें कोई हानि न हो, जो कभी तुम्हारे हितों के लिए खतरा न बने, जिसके साथ तुम अपने अंतर्मन के विचार साझा कर सको और अपनी बातों की कोई जिम्मेदारी लिए बिना, किसी के मखौल, हँसी, मजाक उड़ाए बिना या कोई नतीजा भुगते बिना अपनी भड़ास निकाल सको। ऐसी स्थिति में जहाँ “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए” का विचार और नजरिया दुनिया से निपटने का तुम्हारा सिद्धांत हो, वहाँ तुम्हारा अंतरतम भय और असुरक्षा से भर जाता है। स्वाभाविक रूप से तुम उदास रहते हो, इससे मुक्ति नहीं पाते और तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है जो तुम्हें सांत्वना दे, जिससे तुम अपने मन की बात कह सको। इसलिए, इन पहलुओं से परखें तो दुनिया से निपटने का तुम्हारे माता-पिता का सिखाया सिद्धांत “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए,” भले ही तुम्हारी रक्षा करने में सफल हो सकता है, मगर यह एक दुधारी तलवार है। वैसे तो यह तुम्हारे भौतिक हितों और निजी सुरक्षा की किसी हद तक रक्षा करता है, पर यह साथ ही तुम्हें उदास और दुखी बना देता है, तुम मुक्ति नहीं पाते, और यह तुम्हें इस दुनिया और मानवता से और भी ज्यादा विरक्त कर देता है। साथ ही, भीतर गहरे तुम हल्के-से उकताने भी लगते हो कि ऐसे बुरे युग में, ऐसे बुरे लोगों के समूह में तुम्हारा जन्म हुआ। तुम नहीं समझ पाते कि लोगों को जीना क्यों चाहिए, जीवन इतना थकाऊ क्यों है, उन्हें हर जगह मुखौटा पहनकर खुद को छद्मवेश में क्यों रखना पड़ता है, या तुम्हें अपने हितों की खातिर हमेशा दूसरों से सतर्क क्यों रहना पड़ता है। तुम चाहते हो कि सच बोल सको, मगर इसके नतीजों के कारण तुम नहीं बोल सकते। तुम एक असली इंसान बनना चाहते हो, खुलकर बोलना और आचरण करना चाहते हो, और एक नीच व्यक्ति बनने या चोरी-छिपे दुष्ट और शर्मनाक काम करने, पूरी तरह अंधकार में जीने से बचना चाहते हो, मगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। तुम ईमानदारी से क्यों नहीं जी सकते? अपने पूर्व कर्मों पर सोच-विचार करते हुए तुम एक हल्की-सी उपेक्षा महसूस करते हो। तुम इस बुरी प्रवृत्ति और इस बुरी दुनिया से घृणा और बेइंतहा नफरत करते हो, और साथ ही खुद से भी गहराई से घृणा करते हो, और तुम्हें अपने इस रूप से घिन होती है। फिर भी ऐसा कुछ नहीं है जो तुम कर सकते हो। भले ही तुम्हारे माता-पिता ने अपनी कथनी-करनी के जरिये तुम्हें यह जंतर सौंपा है, फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम्हारे जीवन में खुशी या सुरक्षा की भावना नहीं है। जब तुम इस खुशी, सुरक्षा, ईमानदारी और स्वाभिमान की कमी का अनुभव करते हो, तो तुम यह जंतर पाने के लिए अपने माता-पिता का आभार भी मानते हो और खुद को इन जंजीरों में बाँधने के लिए क्रोधित भी होते हो। तुम नहीं समझते कि तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें ऐसा आचरण करने को क्यों कहा, समाज में पाँव जमाने, इस सामाजिक समूह में शामिल होने और अपनी रक्षा करने के लिए ऐसा आचरण करना क्यों जरूरी है। यह एक जंतर है, मगर साथ ही यह एक प्रकार की जंजीर भी है, जिससे तुम अपने दिल में प्रेम और घृणा दोनों महसूस करते हो। लेकिन तुम क्या कर सकते हो? तुम्हारे पास जीवन में सही पथ नहीं है, तुम्हें कोई यह नहीं बताता कि कैसे जिएँ या अपने सामने आई चीजों से कैसे निपटें, और कोई यह नहीं बताता कि तुम जो कर रहे हो वह सही है या गलत, या तुम्हें अपने सामने के पथ पर कैसे चलना चाहिए। तुम सिर्फ भ्रम, अनिश्चय, पीड़ा और बेचैनी में पड़ सकते हो। ये नतीजे तुम्हारे माता-पिता और परिवार द्वारा तुम्हारे मन में बैठाए गए सांसारिक आचरण के फलसफे के हैं, जिससे एक सरल व्यक्ति बनने की तुम्हारी सबसे सरल कामना यानी दुनिया से निपटने के इन उपायों का इस्तेमाल किए बिना ईमानदारी से आचरण कर पाने की तुम्हारी आकांक्षा साकार नहीं हो सकती। तुम समझौते करते हुए, अपनी शोहरत की खातिर जीते हुए, दूसरों से सुरक्षित रहने के लिए खुद को खास तौर पर खूंख्वार बनाते हुए, धौंस खाने से बचने के लिए खूंख्वार, कद्दावर, ताकतवर, सामर्थ्यवान और असाधारण होने का नाटक करते हुए केवल भ्रष्ट ढंग से जी सकते हो। तुम अपनी इच्छा के विरुद्ध ही इस तरह जी सकते हो, जिसके कारण तुम खुद से घृणा करते हो, मगर तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है। चूँकि तुम्हारे पास दुनिया से निपटने के इन तरीकों या रणनीतियों से बचने की काबिलियत या राह नहीं है, इसलिए तुम खुद को अपने परिवार और माता-पिता द्वारा दी गई शिक्षा के विचारों के अनुसार ही चलने दे सकते हो। बेसुधी की इस प्रक्रिया में लोग अपने परिवारों और माता-पिता द्वारा अपने भीतर बैठाए गए विचारों से बेवकूफ बनते और नियंत्रित होते हैं, और चूँकि वे यह नहीं समझते कि सत्य क्या है और जीना कैसे है, इसलिए वे इसे सिर्फ भाग्य पर छोड़ सकते हैं। भले ही उनमें थोड़ी-सी अंतरात्मा बाकी हो, या उनमें मनुष्यों की तरह जीने की, दूसरों के साथ उचित ढंग से मिल-जुल कर रहने और स्पर्धा करने की छोटी-सी भी आकांक्षा हो, तो उनकी कामनाएँ चाहे जो भी हों, वे अपने परिवार से आए विविध विचारों और नजरियों की शिक्षा और नियंत्रण से बच नहीं सकते, और अंत में वे उसी विचार और नजरिये की शरण में लौट सकते हैं जिसकी उनके परिवार ने उन्हें शिक्षा दी है कि “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए,” क्योंकि उनके सामने कोई दूसरा पथ नहीं है—उनके पास कोई विकल्प नहीं है। ये तमाम चीजें लोगों के सत्य को न समझ पाने और सत्य प्राप्त करने में उनकी विफलता के कारण होते हैं। बेशक, माता-पिता तुम्हें यह भी बताते हैं, “एक बाघ का चित्र बनाते समय तुम उसकी खाल दिखाते हो, उसकी हड्डियाँ नहीं; इंसान को जानने में, तुम उसकी शक्ल-सूरत को जान सकते हो, लेकिन उसके दिल को नहीं”; वे तुम्हें दूसरों से सुरक्षित रहने की कला के बारे में बताते हैं, और तुम्हें ऐसा इसलिए करने को कहते हैं क्योंकि तमाम लोग कपटी हैं; अगर तुम लोगों को गहराई से नहीं समझ सकते, तो उनकी चालों में फँसना आसान होता है, उनके अंदरूनी विचार शायद वही न हों जैसे वे बाहर से दिखते हैं, कोई व्यक्ति ऊपर से धार्मिक और दयालु दिखाई दे सकता है, लेकिन उसका दिल साँप या बिच्छू जैसा जहरीला हो सकता है; या कोई व्यक्ति ऊपर से तो परोपकार, धार्मिकता, उपयुक्तता, बुद्धिमत्ता और विश्वसनीयता की बातें कर सकता है, तमाम सही बातें कह सकता है, उसकी कथनी में धार्मिकता और नैतिकता भरी हो सकती है, लेकिन अपने दिल और आत्मा में कहीं गहरे वह निहायत गंदा, घिनौना, नीच और दुष्ट हो सकता है। इसलिए, तुम अपने माता-पिता द्वारा तुम्हारे भीतर बैठाए गए विचारों और नजरियों के आधार पर ही दूसरों को देख सकते हो और उनके साथ मिल-जुल सकते हो।
“किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए,” और “एक बाघ का चित्र बनाते समय तुम उसकी खाल दिखाते हो, उसकी हड्डियाँ नहीं; इंसान को जानने में, तुम उसकी शक्ल-सूरत को जान सकते हो, लेकिन उसके दिल को नहीं” दुनिया से निपटने के वे सबसे बुनियादी सिद्धांत हैं, और साथ ही लोगों को देखने और उनसे सुरक्षित रहने के सबसे बुनियादी मानदंड हैं, जो माता-पिता तुम्हारे भीतर बैठाते हैं। माता-पिता का प्राथमिक उद्देश्य तुम्हें बचाना और अपनी रक्षा करने में तुम्हारी मदद करना है। लेकिन एक दूसरी दृष्टि से इन वचनों, विचारों और नजरियों से तुम्हें और भी ज्यादा महसूस हो सकता है कि दुनिया खतरनाक है और लोग भरोसेमंद नहीं हैं, जिस कारण तुम्हारे मन में दूसरों के प्रति सकारात्मक भावना बिल्कुल नहीं होती। लेकिन तुम वास्तव में दूसरों को कैसे पहचान और देख सकते हो? किन लोगों के साथ तुम्हारी बन सकती है और लोगों के बीच उचित रिश्ता क्या होना चाहिए? किसी व्यक्ति को दूसरों के साथ सिद्धांतों के आधार पर कैसे मिलना-जुलना चाहिए, और कोई दूसरों के साथ कैसे उचित और सद्भावनापूर्ण ढंग से मिल-जुल सकता है? माता-पिता इन चीजों के बारे में कुछ भी नहीं जानते। वे लोगों से सुरक्षित रहने के लिए दुनिया से निपटने के विविध खेलों के नियमों, चालों, साजिशों का इस्तेमाल करना ही जानते हैं और वे खुद दूसरों को चाहे जितनी भी हानि पहुँचाएँ, लेकिन उनसे खुद को हानि से बचाने के लिए उनका फायदा उठाना और उन्हें नियंत्रित करना जानते हैं। अपने बच्चों को ये विचार और नजरिये सिखाते समय माता-पिता उनके भीतर जो चीजें बिठाते हैं वे महज दुनिया से निपटने की कुछ रणनीतियाँ ही होती हैं। ये रणनीतियों से अधिक कुछ नहीं हैं। इन रणनीतियों में क्या शामिल होता है? हर तरह की चालें, खेल नियम, दूसरों को कैसे खुश करें, अपने हितों की रक्षा कैसे करें और निजी फायदा कैसे खूब बढ़ाएँ। क्या ये सिद्धांत ही सत्य हैं? (नहीं, ये सत्य नहीं हैं।) क्या ये लोगों के पालन करने के सही पथ हैं? (नहीं।) इनमें से कोई भी सही पथ नहीं है। तो माता-पिता द्वारा तुम्हारे भीतर बैठाए गए इन विचारों का सार क्या है? ये सत्य के अनुरूप नहीं हैं, ये सही पथ नहीं हैं, और ये सकारात्मक चीजें नहीं हैं। तो फिर ये क्या हैं? (ये पूरी तरह से शैतान का वह फलसफा हैं जो हमें भ्रष्ट करता है।) नतीजे देखें तो ये लोगों को भ्रष्ट करते हैं। तो इन विचारों का सार क्या है? जैसे, “किसी व्यक्ति को दूसरे को हानि पहुँचाने का इरादा नहीं रखना चाहिए, बल्कि खुद को दूसरों से होने वाली हानि से हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए”—क्या यह दूसरों से मिलने-जुलने का सही सिद्धांत है? (नहीं, ये पूरी तरह से नकारात्मक चीजें हैं जो शैतान से आती हैं।) ये नकारात्मक चीजें हैं जो शैतान से आती हैं—तो उनका सार और उनकी प्रकृति क्या है? क्या ये चालें नहीं हैं? क्या ये रणनीतियाँ नहीं हैं? क्या ये दूसरों को जीतने की युक्तियाँ नहीं हैं? (बिल्कुल।) ये सत्य में प्रवेश करने के अभ्यास सिद्धांत या सकारात्मक सिद्धांत और दिशाएँ नहीं है जिनसे परमेश्वर लोगों को सिखाता है कि अपना आचरण कैसे करें; ये दुनिया से निपटने की रणनीतियाँ हैं, ये चालें हैं। इसके अलावा, क्या “एक बाघ का चित्र बनाते समय तुम उसकी खाल दिखाते हो, उसकी हड्डियाँ नहीं; इंसान को जानने में, तुम उसकी शक्ल-सूरत को जान सकते हो, लेकिन उसके दिल को नहीं” जैसे वाक्यांशों की प्रकृति भी वही है? (हाँ।) क्या ये वाक्यांश तुम्हें नहीं सिखाते कि कपटी बन जाओ, सीधे-सादे या ईमानदार न रहो, ऐसे बन जाओ कि दूसरों के लिए तुम्हें भाँपना और गहराई से समझना मुश्किल हो जाए? क्या इन विचारों और नजरियों से मिले दुनिया से निपटने के विशेष सिद्धांत तुम्हें नहीं बताते कि दूसरों से मेल-जोल के समय रणनीतियों का इस्तेमाल करो, दूसरों को जीतना सीखो और उन खेल नियमों को सीखो जो हर युग में लोगों के बीच प्रचलित रहते हैं? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं, “माता-पिता अपने बच्चों को ये वाक्यांश दूसरों से सुरक्षित रहने और दूसरों को देखने के नजरियों के बारे में निर्देश देने के लिए बताते हैं।” क्या उन्होंने तुम्हें बताया कि दूसरों को किस दृष्टि से देखें? उन्होंने तुम्हें नहीं बताया कि दूसरों को किस दृष्टि से देखें, उन्होंने तुम्हें नहीं बताया कि विभिन्न लोगों को सही सिद्धांतों के नजरिये से देखें, बल्कि विभिन्न लोगों की जरूरतों और रणनीतियों के मुताबिक चालों और साजिशों का इस्तेमाल करना बताया। मिसाल के तौर पर, तुम्हारा अधिकारी या उच्च अधिकारी घिनौना और कामुक है। तुम सोचते हो, “अधिकारी ऊपर से तो सम्मानित और ईमानदार लगता है, मगर भीतर से वह असल में कामुक व्यक्ति है। वह अपनी आत्मा में कहीं गहरे ऐसा नीच कमीना है। ठीक है, मैं उसकी पसंद का ख्याल रखूँगा, देखूंगा कि कौन-सी महिला सुंदर दिखती है, उससे मिलूँगा और अधिकारी को खुश करने के लिए उससे उसे मिलवाऊंगा।” क्या यह दुनिया से निपटने की रणनीति है? (हाँ।) मिसाल के तौर पर, जब तुम ऐसे किसी को देखते हो जिसके मूल्य का तुम फायदा उठा सकते हो, और जो तुम्हारे मेल-जोल के लायक हो, मगर जिसके साथ गड़बड़ करना आसान न हो, तो तुम सोचते हो, “मुझे उससे वैसी ही चापलूसी की बातें करनी हैं, जो वह सुनना चाहता हो।” वह व्यक्ति कहता है, “आज मौसम सुहाना है।” तुम कहते हो, “मौसम सचमुच सुहाना है, कल भी अच्छा होगा।” वह कहता है, “आज मौसम सचमुच ठंडा है।” तुम कहते हो, “हाँ, मौसम ठंडा है। आप कुछ गर्म क्यों नहीं पहनते? मेरा कोट गर्म है, ये लीजिए, पहन लीजिए।” वह जैसे ही जम्हाई लें, तुम फौरन उसे तकिया बढ़ाने लगते हो; वह दवा की शीशी ले, तो तुम उसके लिए जल्दी से ग्लास में पानी डालते हो; खाना खाने के बाद वह बैठ जाए, तो तुम उसके लिए जल्दी से चाय बनाते हो। क्या ये दुनिया से निपटने की रणनीतियाँ नहीं हैं? (बिल्कुल।) ये दुनिया से निपटने की रणनीतियाँ हैं। तुम ये रणनीतियाँ क्यों इस्तेमाल कर पाते हो? तुम उसकी चापलूसी क्यों करना चाहते हो? अगर तुम्हें उसकी जरूरत नहीं होती, अगर उससे तुम्हें कोई फायदा नहीं दिखता, तो क्या तुम उससे इस तरह पेश आते? (नहीं।) नहीं, यह वैसा ही है जैसा लोग कहते हैं, “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो।” यह सब्जियों के बगीचे में पानी की बाल्टी ले जाने जैसा है—तुम सिर्फ उन्हीं पौधों को पानी देते हो जो तुम्हारे काम के हैं। तुम सक्रिय रूप से उस व्यक्ति की चापलूसी करते हो जो तुम्हारे काम का है। एक बार जब वह अपने पद से उतर जाए या हटा दिया जाए, तो उसके प्रति तुम्हारा जोश तुरंत ठंडा हो जाता है और तुम उसकी अनदेखी करते हो। जब वह तुम्हें फोन करता है, तो या तो तुम अपना फोन बंद कर देते हो या बहाना करते हो कि लाइन व्यस्त है, और जवाब नहीं देते। जब तुम्हारी नजर उस पर पड़ती है तो वह तुम्हारा अभिवादन कर कहता है, “आज मौसम बढ़िया है।” तुम यह कह कर उन्हें भौंचक्का कर देते हो, “अरे हाँ। फिर मिलेंगे, कोई बात हुई तो आगे बात करेंगे, मैं किसी दिन आपको भोजन का निमंत्रण दूँगा।” खोखले वादे, और फिर तुम उसकी अनदेखी करते हो, उससे संपर्क नहीं करते और उसे ब्लॉक भी कर देते हो। माता-पिता के बैठाए विचार और नजरिये लोगों के दिलों पर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बना देते हैं। साथ-ही-साथ, वे दुनिया से निपटने या जीवित रहने के बुनियादी तरीके भी लोगों के भीतर बैठाते हैं, लोगों को दोनों ओर से खेलना और किसी सामाजिक समूह में घुल-मिल जाना, समाज में खुद को स्थापित करना और लोगों के समूह में धौंस खाने से बचना सिखाते हैं। हालाँकि तुम समाज में प्रवेश करो इससे पहले, तुम्हारे माता-पिता ने विशेष रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं किया कि विशिष्ट हालात से कैसे निपटें, दुनिया से निपटने के इन तरीकों और सिद्धांतों के संदर्भ में तुम्हारे माता-पिता या परिवार द्वारा दी गई शिक्षा ने तुम्हें दुनिया से निपटने के बुनियादी विचार और सिद्धांत दिए हैं। दुनिया से निपटने के ये बुनियादी विचार और सिद्धांत क्या हैं? ये तुम्हें सिखाते हैं कि लोगों से मिलते-जुलते समय कोई मुखौटा कैसे पहनें, प्रत्येक सामाजिक समूह में मुखौटे के साथ कैसे जिएँ, और आखिरकार अपनी शोहरत और फायदे को नुकसान से बचाने के लक्ष्य के साथ ही मनचाही शोहरत और फायदा कैसे हासिल करें, या अपनी सुरक्षा की बुनियादी गारंटी कैसे हासिल करें। तुम्हारे माता-पिता द्वारा तुम्हारे भीतर बैठाए गए दुनिया से निपटने के विचारों और नजरियों और विविध रणनीतियों से यह देखा जा सकता है कि माता-पिता ने तुम्हें यह नहीं सिखाया कि स्वाभिमानी व्यक्ति, वास्तविक व्यक्ति, एक नेक सृजित प्राणी या सत्य प्राप्त व्यक्ति कैसे बनें। इसके विपरीत उन्होंने तुम्हें बताया कि दूसरों को धोखा कैसे दें, दूसरों से सतर्क कैसे रहें, विभिन्न लोगों से मेल-जोल में रणनीतियाँ कैसे इस्तेमाल करें, और साथ ही यह भी कि लोगों के दिल कैसे होते हैं, और मानवजाति कैसी होती है। अपने माता-पिता से आए इन विचारों और नजरियों की शिक्षा के असर से तुम्हारा अंतरतम और भी डरावना होता जाता है और तुम लोगों के प्रति द्वेष की भावना विकसित कर लेते हो। तुम्हारे नाजुक दिल में दुनिया से निपटने की रणनीतियाँ तैयार होने से पहले ही मानवता की एक अल्पविकसित और बुनियादी परिभाषा, और साथ ही दुनिया से निपटने का एक अल्पविकसित और बुनियादी सिद्धांत होता है। तो तुम्हारे दुनिया से निपटने में तुम्हारे माता-पिता क्या भूमिका निभाते हैं? वे बेशक तुम्हें गलत रास्ते पर आगे बढ़ाने की भूमिका निभाते हैं; वे अच्छे पथ पर चलने में तुम्हारी अगुआई नहीं करते या तुम्हें सकारात्मक और सक्रिय रूप से मानव जीवन के सही पथ की ओर नहीं ले जाते, बल्कि तुम्हें भटकाव की ओर ले जाते हैं।
फुटनोट :
क. हान शिन हान वंश का एक प्रसिद्ध जनरल था, जिसे एक बार एक कसाई की टाँगों के बीच से सरकने पर मजबूर किया गया था जिसने उसके प्रसिद्ध होने से पहले उसकी कायरता का मजाक उड़ाया था।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?