परमेश्वर के दैनिक वचन | "वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं" | अंश 293

परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, मनुष्यों में कैसा प्रभाव प्राप्त किया जाना है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा क्या है, को समझना यही सब बातें हर उस व्यक्ति को उपार्जित करनी चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अभी सभी मनुष्यों में जिस चीज का अभाव है, वह है परमेश्वर के कार्य का ज्ञान। मनुष्य न बूझता है और न ही समझता है कि वास्तव में कौन सी चीज मनुष्य में परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर के समस्त कार्य को, और सृष्टि की रचना के बाद से परमेश्वर की इच्छा को निर्मित करती है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है, बल्कि इसके अलावा परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है। जब वह दिन आता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर को देखते हो और उसकी बुद्धि को समझते हो; जब तुम परमेश्वर के सब कर्मों को देखते हो, और पहचानते हो कि परमेश्वर क्या है और उसके पास क्या है; जब तुम उसकी विपुलता, बुद्धि, चमत्कार, और मनुष्य में उसके समस्त कार्य को निहारते हो, तब उस दिन होगा कि तुमने परमेश्वर में सफल विश्वास को प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर को सर्वव्यापी और अत्यधिक विपुल कहा जाता है, तब सर्वव्यापी से क्या अभिप्राय है? और विपुलता से क्या अभिप्राय है? यदि तुम इस बात को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासी नहीं माने जा सकते हो। मैं क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं और कुकर्मी हैं, जो उसी प्रकार के हैं जैसा शैतान है? जब मैं कहता हूँ कि वे कुकर्मी हैं, तो ऐसा इसलिये कहता हूँ क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं अथवा उसकी बुद्धि को नही देखते हैं। परमेश्वर उन पर कभी भी अपने काम को प्रकट नहीं करता है; वे अंधे व्यक्ति हैं, वे परमेश्वर के कर्मों को नहीं देखते हैं। वे परमेश्वर द्वारा परित्यक्त हैं और उन्हें परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं है, और पवित्र आत्मा का काम तो और भी कम प्राप्त है। वे जो परमेश्वर के काम के बिना हैं, वे कुकर्मी हैं और परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। जिन्हें मैं कहता हूँ कि वे परमेश्वर के विरोध में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे लोग हैं जो निरर्थक वचनों से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं मगर परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं मगर उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, और वे लोग हैं जो परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद करते हैं मगर उनकी गवाही नहीं दे सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, और मनुष्य में उसके काम को समझे बिना मनुष्य परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं हो सकता है, और परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता है। मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने का कारण, एक ओर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से, और दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता और परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों की और मनुष्य के प्रति उनकी इच्छा की समझ की कमी से उत्पन्न होता है। इन दोनों पहलुओं का, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास में विलय होता है। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है। परमेश्वर के देहधारी बनने से पहले के समय में क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है इसका मापन इस बात से होता था कि क्या उसने स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में, जो कोई भी यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं करते थे, वे ही थे जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था; जो कोई भी यहोवा के प्रसाद की चोरी करते थे, और जो कोई भी यहोवा के कृपापात्र लोगों के विरुद्ध खड़े हुए थे, वे ही थे जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था और वे ही होंगे जिन्हें पत्थरों से मार डाला जाएगा; जो कोई भी अपने पिता और माता का आदर नहीं करते थे, और जो कोई भी दूसरों को चोट पहुँचाते या शाप देते थे, उन लोगों ने ही व्यवस्था का पालन नहीं किया था। और वे सब जो यहोवा की व्यवस्था को नहीं मानते थे, वे ही थे जो उसके विरुद्ध खड़े होते थे। अनुग्रह के युग में अब और ऐसा नहीं था, तब जो कोई भी यीशु के विरुद्ध खड़े हुए थे ये वे थे जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े थे, और जो कोई भी यीशु के बोले गये वचनों का पालन नहीं करता था, ये वे थे जो परमेश्वर के विरोध में खड़े थे। इस युग में, "परमेश्वर का विरोध" का निर्धारण अधिक स्पष्ट और अधिक वास्तविक रूप में परिभाषित हो गया था। उन दिनों में जब परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है इसका मापन इस बात पर आधारित था कि क्या मनुष्य ने स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना की और उनकी खोज की। "परमेश्वर के प्रति विरोध" की परिभाषा उस समय इतनी वास्तविक नहीं थी, क्योंकि तब मनुष्य परमेश्वर को समझ नहीं सकता था और न ही उसकी छवि को या इस बात को जान सकता था कि उन्होंने कैसे काम किया और बोला था। मनुष्य की परमेश्वर के बारे में कोई अवधारणा नहीं थी, और परमेश्वर पर अस्पष्ट रूप में विश्वास करता था, क्योंकि वे मनुष्यों पर प्रकट नहीं हुए थे। इस कारण, मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं में परमेश्वर पर जैसे भी विश्वास किया, परमेश्वर ने मनुष्य की निंदा नहीं की या मनुष्यों से अधिक कुछ नहीं माँगा, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं देख सकता था। जब परमेश्वर ने देहधारण किया और मनुष्यों के बीच काम करने आया, तो सभी ने उन्हें देखा और उसके वचनों को सुना, और सभी ने देह में परमेश्वर के कामों को देखा। उस समय, मनुष्य की जितनी भी अवधारणाएँ थी वे सब मानो साबुन के झाग में घुल कर बह गईं। वे जो परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखते हैं, और अपने-अपने हृदयों में आज्ञाकारी हैं, उन सभी की निंदा नहीं की जाएगी, जबकि वे जो जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग ईसा-विरोधी हैं और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से आज्ञा मानते हैं, निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की उसके आशयों और क्रियाओं के आधार पर निंदा करते हैं, कभी भी विचारों और मत के आधार पर नहीं। यदि मनुष्य की ऐसे आधार पर निंदा की जाए, तो कोई भी परमेश्वर के कुपित हाथों से बच कर नहीं भाग पाएगा। जो जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसके द्वारा की गई अवज्ञा के कारण दण्ड पाएँगे। उनका जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करना, परमेश्वर की उनकी अवधारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसका परिणाम परमेश्वर के कार्य में उनका व्यवधान है। ऐसे व्यक्ति जानते-बूझते हुए परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। उनकी न केवल परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ हैं, बल्कि वे उन कामों को करते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि ऐसे मनुष्यों के इस तरीके की निंदा की जाएगी। वे जो जानबूझकर कार्य के व्यवधान में संलग्न नहीं होते हैं, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे जानबूझ कर आज्ञापालन करेंगे और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न नहीं करेंगे। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। हालाँकि, जब मनुष्य कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेता है, यदि तब भी वह परमेश्वर के बारे में कई अवधारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के काम को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में बहुत सी अवधारणाएँ बनाए रखता है और तब भी परमेश्वर को समझने में असमर्थ बना रहता है, तब भले ही वह अपने हृदय में परमेश्वर की बहुत सी अवधारणाओं के बावजूद कोई गड़बड़ी उत्पन्न नहीं करे, और भले ही ये अवधारणाएँ दिखाई न दें, ऐसे लोग परमेश्वर के काम में किसी सेवा के योग्य नहीं हैं। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ हैं; ऐसे मनुष्य किसी काम के नहीं हैं और मंदबुद्धि हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं और वे परमेश्वर के बारे में अपनी अवधारणाओं का परित्याग करने में अक्षम हैं, इसलिए वे निंदित किए जाएँगे। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है: नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर की अवधारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना असामान्य नहीं है, परंतु जिन्होंने बहुत वर्षों तक विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उनका ऐसी अवधारणाएँ रखना, और उससे बढ़कर उनमें परमेश्वर का ज्ञान न होना, असामान्य है। यह ऐसी असामान्य अवस्था का परिणाम है कि ऐसे मनुष्यों की निंदा की जाती है। ऐसे असामान्य लोग किसी काम के नहीं है; ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है। ऐसे सभी लोग अंत में मार डाले जाएँगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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