परमेश्वर के दैनिक वचन | "मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वह किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?" | अंश 285

उस समय के सभी यहूदियों ने पुराने विधान से पढ़ा था और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरनी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर क्यों, इस ज्ञान के साथ, उन्होंने तब भी यीशु को सताया? क्या यह उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं है? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उससे भिन्न था जो वे भविष्यवाणी किए गए नर शिशु के बारे में जानते थे; आज का मनुष्य परमेश्वर को अस्वीकार करता है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार एक ही बात नहीं है? क्या तुम इस प्रकार के हो सकते हो कि तुम पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को बिना कोई प्रश्न किए स्वीकार करो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह सही "स्रोत" है। तुम्हें इसे बिना किसी आशंका के स्वीकार कर लेना चाहिये, बजाय इसके कि किसे चुनें और स्वीकार करें। यदि तुम्हें परमेश्वर से कुछ ज्ञान प्राप्त होता है और उसके विरुद्ध कुछ सावधानी प्रयोग करते हो, तो क्या यह कार्य वास्तव में अनुचित नहीं है? अगर कोई कार्य पवित्रात्मा का है, तो बिना बाइबल के प्रमाण की आवश्यकता के, तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, जब तक कि यह पवित्र आत्मा का है, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, न कि उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए। मेरे यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ तुम्हें और सबूत नहीं खोजने चाहिए। इसके बजाय कि तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभ का हूँ, यही मुख्य बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में बहुत सारे अखंडनीय सबूत प्राप्त हो जाएँ; ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते हैं। तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो बाइबल के सीमा में ही रहता है, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई है कि एक नर शिशु जन्म लेगा, कोई थाह नहीं ले सकता है कि किस पर यह भविष्यवाणी घटित होगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता, और फरीसियों का यीशु के विरोध में खड़े होने का यही कारण है। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हितों में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं दो पूरी तरह से अलग-अलग प्राणी हैं जो परस्पर असंगत हैं। उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को उपदेशों की एक श्रृंखला कही, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे माँगें, दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें इत्यादि। जो कार्य उसने किया वह अनुग्रह के युग का था, और उन्होंने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण किया कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने विधान के नियमों को निर्धारित किया, उसने अनुग्रह के युग के कार्य को तब क्यों नहीं किया? उसने अग्रिम में अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों के स्वीकार करने के लिए लाभदायक नहीं हो गया होता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने अनुग्रह के युग का कार्य अग्रिम में नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और वह कभी भी कार्य का आगामी चरण अग्रिम में नहीं करता है। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने अंत के दिनों के केवल चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें और कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें और स्वीकार करें, और साथ ही सलीब को कैसे सहें, और साथ ही पीड़ाओं को कैसे सहन करें; उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस में प्रवेश करना चाहिए या परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करें। वैसे तो, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना भ्रान्ति का कार्य नहीं होगा? बाइबल को केवल अपने हाथों में पकड़कर तुम क्या विचार कर सकते हो? बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से जान सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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