परमेश्वर के दैनिक वचन | "वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?" | अंश 284

परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता, लेकिन जिन तरीकों से वह कार्य करता है, वे निरंतर बदलते रहते हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे भी निरंतर बदलते रहते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, मनुष्य का परमेश्वर का ज्ञान उतना ही अधिक होता है। परमेश्वर के कार्य के कारण मनुष्य के स्वभाव में तदनुरूप बदलाव आता है। लेकिन चूँकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है, इसलिए पवित्र आत्मा के कार्य को न समझने वाले और सत्य को न जानने वाले बेतुके लोग परमेश्वर का विरोध करने लग जाते हैं। परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता, न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है, बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ता जाता है। चूँकि परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर ही उसके आज के कार्य का आकलन करता है, इस कारण परमेश्वर के लिए नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना लगातार अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्य के सामने बहुत अधिक मुश्किलें हैं! मनुष्य की सोच बहुत ही रूढ़िवादी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता, फिर भी हर कोई उसे सीमा में बांध देता है। जब मनुष्य परमेश्वर से दूर जाता है, तो वह जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले अधिक बड़े आशीषों को तो बिल्कुल ग्रहण नहीं करता। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, फिर भी परमेश्वर के कार्य में किसी भी बदलाव को सहन नहीं कर पाते। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा ठहरा रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, वह है व्यवस्था का पालन करना, अगर वे पश्चाताप करेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, तो परमेश्वर की इच्छा हमेशा संतुष्ट रहेगी। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर न तो बाइबल से बढ़कर होना चाहिए और न ही वो हो सकता है। उनके इन्हीं विचारों ने उन्हें पुरानी व्यवस्था से दृढ़ता से बाँध रखा है और मृत नियमों में जकड़ कर रखा है। ऐसे लोग तो और भी हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर का नया कार्य जो भी हो, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया जाना ही चाहिए और कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी "सच्चे" मन से उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए; अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। मनुष्य के बेतुके हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं दंभी विद्रोही स्वभाव को देखते हुए, परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य पर ध्यान से विचार करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का रवैया अपनाता है। क्या यह ऐसे मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोधी और उससे विद्रोह करने वाला है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

यीशु ने कहा था कि यहोवा का कार्य अनुग्रह के युग में ही समाप्त हो गया, वैसे ही जैसे मैं आज कहता हूँ कि यीशु का कार्य भी पीछे छूट गया है। यदि केवल व्यवस्था का युग होता और अनुग्रह का युग न होता, तो यीशु को सलीब पर नहीं चढ़ाया गया होता और वह पूरी मानवजाति का उद्धार नहीं कर पाता; यदि केवल व्यवस्था का युग होता, तो क्या मानवजाति कभी आज तक पहुँच पाती? इतिहास आगे बढ़ता है, क्या इतिहास परमेश्वर के कार्य की प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है? क्या यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भर में मनुष्य के लिए उसके प्रबंधन का चित्रण नहीं है? इतिहास आगे प्रगति करता है, वैसे ही परमेश्वर का कार्य भी आगे बढ़ता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर बदलती रहती है। वह कार्य के एक ही चरण में छः हज़ार साल तक नहीं रह सकता था, क्योंकि हर कोई जानता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है, और वह हमेशा सलीब पर चढ़ने जैसा काम नहीं कर सकता, सलीब पर एक बार, दो बार, तीन बार नहीं चढ़ सकता...। ऐसा सोचना हास्यास्पद होगा। परमेश्वर वही कार्य करता नहीं रह सकता; उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और हमेशा नया रहता है, बहुत कुछ वैसा ही जैसे कि मैं प्रतिदिन तुम लोगों से नए वचन कहता और नया कार्य करता हूँ। यही वह कार्य है जो मैं करता हूँ, और मुख्य शब्द हैं "नया" और "अद्भुत"। "परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा" : यह कहावत वास्तव में सही है। परमेश्वर का सार कभी भी नहीं बदलता, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर, और वह कभी शैतान नहीं बन सकता, परन्तु इनसे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसका कार्य उसके सार की तरह ही अचर और अचल है। तुम कहते हो कि परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, परन्तु फिर तुम किस प्रकार से यह समझा सकते हो कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी भी पुराना नहीं होता? परमेश्वर का कार्य हमेशा फैलता और निरंतर बदलता रहता है, उसकी इच्छा निरंतर व्यक्त होती रहती है और मनुष्य को ज्ञात करवाई जाती है। जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, मनुष्य का स्वभाव बिना रुके बदलता जाता है, और उसका ज्ञान भी बदलता जाता है। तो फिर, यह परिवर्तन कहाँ से उत्पन्न होता है? क्या यह परमेश्वर के चिर-परिवर्तनशील कार्य से नहीं होता? यदि मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य मेरे कार्य और मेरे वचनों को निरंतर बदलने क्यों नहीं दे सकता? क्या मेरा मनुष्यों के प्रतिबंधों के अधीन होना आवश्यक है? इसमें, तुम क्या केवल ज़बर्दस्ती की बहस और कुतर्क का इस्तेमाल नहीं ले रहे हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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