परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं" | अंश 283

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई-नई प्रगति होती है, इसलिए यहां पर नया कार्य है, और इसलिए अप्रचलित और पुराना कार्य भी है। यह पुराना और नया कार्य परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है; प्रत्येक कदम पिछले के बाद आता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुष्य की लम्बे समय से स्थापित कुछ प्रथाओं और पारंपरिक लोकोक्तियों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में सभी प्रकार की धारणाएं बना दी हैं। फिर भी मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार की धारणाएं बनाने के और भी अधिक अनुकूल बात यह है कि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है, और साथ ही प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का, बहुत सालों से, विस्तार हुआ है। इस प्रकार से कहना सही होगा कि परमेश्वर में मनुष्यों के विश्वास में, विभिन्न धारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण मनुष्य के ज्ञान में निरंतर उत्पत्ति और विकास हुआ है जिसमें उसके पास परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की धारणाएं हैं—इस परिणाम के साथ कि परमेश्वर की सेवा करने वाले कई धार्मिक लोग उसके शत्रु बन बैठे हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक धारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनाता, इसके बजाय, निरंतर बदलता रहता है और अधिक या कम हद तक परिवर्तित होता रहता है। यह कार्य स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह भी परमेश्वर के कार्य का एक निहित सिद्धांत और अनेक उपायों में से एक है जिससे परमेश्वर अपने प्रबंधन को पूर्ण करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में ये समय-समय पर होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर पर विश्वास करता है, वह बहुत भिन्न है: वह पुराने, परिचित सिद्धांतों और तंत्रों से चिपका रहता है, और जितने अधिक वे पुराने होते हैं उतने ही अधिक उसे प्रिय होते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, एक ऐसा दिमाग जो पत्थर के समान दुराग्रही है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नए रहने और कभी भी पुराने न होने वाले परमेश्वर से घृणा करता है; वह हमेशा ही प्राचीन सफेद बाल वाले और स्थिर परमेश्वर को पसंद करता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य प्रत्येक की अपनी ही पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छः हजार सालों से नए कार्य कर रहा है। तब, वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य की हठ के कारण या किसी मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के प्रबंधन के नियमों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परन्तु वे पुरोहित और महिलाएँ अभी भी पुरानी फटी हुई किताबों और कागजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को ऐसे आगे बढ़ाता जाता है मानो उसके साथ कोई है ही नहीं। हालांकि ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्यों के शत्रु बनाते हैं, और इनमें कभी मेल भी नहीं हो सकता है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, जैसे कि वे होकर भी नहीं हैं। फिर भी मनुष्य, अभी भी अपने विश्वासों और धारणाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी भी छोड़ता नहीं है। फिर भी एक चीज स्पष्ट है: हालांकि मनुष्य अपने रूख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर का पैर हमेशा आगे बढ़ता रहता है और वह अपना रूख परिस्थितियों के अनुसार हमेशा बदलता रहता है, और अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने हरा दिए गए दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और मानवजाति में जो हार गए हैं और वे जो अभी भी हारने के लिए बचे हैं, उनके मध्य विजेता भी है। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की धारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्यों के द्वारा ही उत्पन्न हुई हैं। फिर भी परमेश्वर इस कारण से मनुष्यों को नहीं क्षमा करता है, इसके अलावा, न ही वह परमेश्वर के कार्य के बाहर खेप दर खेप "परमेश्वर के लिए" ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा करता है। इसके बजाय, वह मनुष्यों की धारणाओं और पुराने, पवित्र आस्थाओं के कारण बहुत ही ज्यादा चिढ़ा हुआ है और यहां तक कि उन तिथियों की भी उपेक्षा करता है जिसमे ये धारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये धारणाएँ उसके कार्य के कारण बनी हैं, क्योंकि मनुष्य की धारणाएं मनुष्यों के द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनके स्रोत मनुष्यों के विचार और दिमाग हैं, परमेश्वर नहीं है, बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिसके लिए वह मनुष्यों को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वह युगों और समयों में विभाजित है न कि अनन्त और स्थिर है। यह इसलिए क्योंकि वह परमेश्वर है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के लिए योग्य बनाता है, बजाय शैतान के जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम सब अभी भी यह नहीं समझते हो? तुम में परमेश्वर के प्रति धारणाएं हैं और उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नहीं हो क्योंकि तुम बंद-दिमाग वाले हो। यह इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य में बहुत कम बोध है, या इसलिए कि परमेश्वर का कार्य बहुत ही अमानवीय है—इसके अलावा, न ही यह इसलिए है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी धारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ सकते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है और क्योंकि तुममें परमेश्वर की सृष्टि की थोड़ी सी भी समानता नहीं है, और इसलिए नहीं कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य केवल मनुष्य के ही द्वारा हुआ है। परमेश्वर के इरादे हमेशा अच्छे होते हैं: वह तुम्हें धारणा बनाने का कारण देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम फ़र्क नहीं कर सकते हो और हमेशा या तो अध्ययन या फिर विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ें कठिन कर रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अनाज्ञाकारिता भी बहुत ज्यादा है। एक छोटा सा प्राणी जो पहले परमेश्वर के द्वारा दिया गया था उसका बहुत ही नगण्य भाग लेने का साहस करता है, और परमेश्वर पर आक्रमण करने के लिए उसे पलट देता है—क्या यह मनुष्यों के द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित है कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और अपनी इच्छानुसार बेकार, बदबूदार, सड़े हुए सिद्धांतों को, साथ ही साथ उन खोटी धारणाओं को व्यक्त करने में तो और भी अयोग्य है। क्या ये और भी बेकार नहीं हैं?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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