परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 20" | अंश 368

युगों से, बहुत से लोग निराशा, और अनिच्छा के साथ इस संसार से चले गए हैं, और बहुत से लोग आशा और विश्वास के साथ इसमें आ गए हैं। मैंने बहुतों के आने का प्रबन्ध किया है, और बहुतों को दूर भेज दिया है। अनगिनित लोग मेरे हाथों से होकर गुज़रें हैं। बहुत सी आत्माओं को अधोलोक में फेंक दिया गया है, बहुतों ने देह में जीवन बिताया है, और बहुत से लोग मर चुके हैं और उन्होंने पृथ्वी पर दुबारा जन्म ले लिया है। परन्तु उनमें से किसी के पास राज्य के आशीषों का आनन्द उठाने का अवसर नहीं था। मैंने मानवजाति को इतना कुछ दिया, फिर भी उसने थोड़ा-सा ही प्राप्त किया है, क्योंकि शैतान के आक्रमणों ने उन्हें मेरी सारी समृद्धि का आनन्द उठाने में असमर्थ कर दिया है। उसके पास केवल देखने के लिए एक अच्छा भविष्य है, परन्तु उसने उसका कभी भरपूर आनन्द नहीं उठाया है। मनुष्य ने कभी भी स्वर्ग की धन-समृद्धि को पाने के लिए अपने शरीर में ख़ज़ाने से भरे घर की खोज नहीं की है, और इस प्रकार उसने उन आशीषों को खो दिया है जो मैंने उसे दिया था। क्या मनुष्य का आत्मा वह आन्तरिक शक्ति नहीं है जो उसे मेरे आत्मा से जोड़ता है? क्यों मनुष्य ने मुझे कभी भी अपनी आत्मा से नहीं जोड़ा है? वह देह में मेरे निकट क्यों आता है, फिर भी वह आत्मा में ऐसा नहीं कर पाता है? क्या मेरा असली चेहरा हड्डी और माँस का है? मनुष्य मेरे सार-तत्व को क्यों नहीं जानता? क्या वास्तव में मनुष्य की आत्मा में मेरा कोई पदचिन्ह कभी नहीं रहा है? क्या मैं मनुष्य की आत्मा से पूरी तरह ग़ायब हो चुका हूँ? यदि मनुष्य आत्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, तो वह मेरी इच्छाओं का आभास कैसे कर पाएगा? क्या मनुष्य की आँखों में वह बात है जो सीधे आत्मिक क्षेत्र को भेद सकती है? कई बार ऐसा हुआ है जब मैंने अपने आत्मा के द्वारा मनुष्य को आवाज़ दी है, फिर भी मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है मानो मैंने उसे छुरा भोंक दिया है, और वह अति भय के साथ दूर से मेरे बारे में विचार करता है कि मैं उसे किसी और दुनिया में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ जब मैंने मनुष्य की आत्मा से पूछताछ कि, फिर भी वह भुलक्कड़ बना रहता है, और बहुत ज़्यादा डर जाता है कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और उस अवसर का लाभ उठा कर उसकी सारी सम्पति को छीन लूँगा। अत:, वह मुझे बाहर निकाल देता है और मैं सर्द, कसकर बन्द किए दरवाज़े के सामने खड़ा रह जाता हूं। कई बार ऐसा हुआ जब मनुष्य गिर गया और मैंने उसे बचाया, फिर भी जागने के बाद वह तुरंत ही मुझे छोड़ देता है और, मेरे प्रेम का एहसास किए बगैर, मुझे चौकन्नी निगाहों से देखता है; मानो मैंने उसके हृदय को कभी उत्साहित नहीं किया है। मनुष्य भावना-शून्य है, और नृशंस पशु है। यद्यपि वह मेरे आलिंगन से उत्साहित होता है, फिर भी वह कभी इस से भावविभोर नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी जंगली जीव के समान है। उसने कभी भी मानवजाति के प्रति ताड़ना को संजो कर नहीं रखा है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों पर रहना पसंद करता है, जहाँ उसे जंगली जानवरों से खतरा रहता है फिर भी वह मेरे आश्रय में आना नहीं चाहता है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ: मैं महज अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य सामर्थी महासागर के बीच में से तैर कर मेरे पास आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सभी समृद्धि का आनन्द उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने के भय को पीछे छोड़ दे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर हमेशा इंसान के लौट आने का इंतज़ार करता है

अक्सर ईश्वर ने इंसान को अपने आत्मा से बुलाया फिर भी वो दिखाये जैसे ईश्वर ने किए हों वार। दूर-दूर से देखे उसे वो, इस डर से कि ले जाएगा ईश्वर उसे दूसरी दुनिया में। उसने अक्सर इंसान की आत्मा से पूछताछ की, लेकिन वो बेख़बर रहता है, डरता है कि ईश्वर ले लेगा उसका सब-कुछ। इसलिए वो उस पर दरवाज़ा बंद कर देता है। ईश्वर इंसान को मजबूर नहीं करता, बस करता है अपना काम। एक दिन समंदर पार कर आएगा वो उसके पास, ताकि ले सके आनंद संसार की संपदा का, छोड़ कर पीछे खतरा समंदर में डूबने का।

जब-जब गिरा है इंसान, ईश्वर ने बचाया है उसे, पर होश संभालते ही वो छोड़ जाता उसे; ईश्वर प्रेम से अछूता, सतर्क नज़रों से देखता उसे। तभी उसके दिल में गर्मी नहीं दी ईश्वर ने। ईश्वर इंसान को मजबूर नहीं करता, बस करता है अपना काम। एक दिन समंदर पार कर आएगा वो उसके पास, ताकि ले सके आनंद संसार की संपदा का, छोड़ कर पीछे खतरा समंदर में डूबने का।

इंसान में कोई भावना नहीं, वो है एक नृशंस जानवर। परमेश्वर के आगोश की गर्मी से भी, उसका दिल कभी नहीं पिघला। किसी जंगली राक्षस-सा है वो, उसने कभी उसके प्यार की परवाह नहीं की। वो पहाड़ों में रह लेता, जंगली जानवरों को सह लेता, पर वो ईश्वर की शरण नहीं लेना चाहता। ईश्वर इंसान को मजबूर नहीं करता, बस करता है अपना काम। एक दिन समंदर पार कर आएगा वो उसके पास, ताकि ले सके आनंद संसार की संपदा का, छोड़ कर पीछे खतरा समंदर में डूबने का।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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