परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 15" | अंश 367

मनुष्य एक आत्मज्ञान रहित प्राणी है। फिर भी, स्वयं को जानने में असमर्थ वह इसके बावजूद अपनी हथेली के समान अन्य हर किसी को जानता है, मानो कि कुछ भी कहने या करने से पूर्व अन्य सभी उसके "निरीक्षण" से गुजरते हों या उसका अनुमोदन प्राप्त करते हों, इस प्रकार से मानो कि, उसने अन्य सभी की उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्था तक पूर्ण रूप से माप ले ली हो। सभी मनुष्य इसी प्रकार के हैं। आज मनुष्य परमेश्वर के राज्य के युग में प्रवेश कर चुका है, परंतु उसका स्वभाव अपरिवर्तित रहा है। वह अब भी मेरे सामने वैसा ही करता है जैसा मैं करता हूँ, परंतु मेरी पीठ पीछे वह अपने विशिष्ट "व्यापार" में लगना आरंभ कर देता है। एक बार यह समाप्त हो जाने पर जब वह मेरे सम्मुख फिर से आता है, तो वह एक भिन्न व्यक्ति के समान होता है, ढीठता से शांत प्रतीत होता हुआ, शांत, मुखावृति, संतुलित धड़कन वाला। क्या यही वास्तव में नहीं जो मनुष्य को हेय बनाता है? कितने लोग दो पूर्णतः भिन्न चेहरे रखते हैं, एक मेरे सामने और दूसरा मेरी पीठ पीछे? उनमें कितने मेरे सामने नवजात मेमने के समान हैं किन्तु मेरे पीछे भूखे शेरों के समान हैं, और फिर पहाड़ी पर आनंद से मँडराती छोटी सी चिड़िया के समान बन जाते हैं? कितने मेरे सामने उद्देश्य और संकल्प प्रदर्शित करते हैं? कितने प्यास और लालसा के साथ मेरे वचनों की तलाश करते हुए मेरे सामने आते हैं किन्तु मेरी पीठ पीछे, उनसे उकता जाते हैं और उन्हें त्याग देते हैं, मानो कि मेरे वचन कोई बोझ हों? कई बार मेरे शत्रु द्वारा भ्रष्ट की गई मनुष्यजाति को देखकर, मैंने मनुष्यजाति पर आशा करना छोड़ दिया है। कई बार, मनुष्य को रोते हुए क्षमा के लिये विनती करने के लिए अपने सामने आता देख कर, किन्तु उनमें आत्मसम्मान के अभाव, उसकी हठी असंशोधनीयता के कारण, मैंने क्रोधवश उसके कार्यों के प्रति अपनी आँखें बंद कर ली हैं, यहाँ तक कि उस समय भी जब उसका हृदय सच्चा और अभिप्राय ईमानदार होता है। कई बार, मैं देखता हूँ कि मनुष्य में मेरा सहयोग करने के लिए विश्वास होता है, और कैसे, मेरे सामने, मेरे आलिंगन की गर्माहट का स्वाद लेते हुए, मेरे आलिंगन में, झूठ बोलता हुआ प्रतीत होता है। कई बार, अपने चुने हुए लोगों का भोलापन, उनकी जीवंतता और प्रेम देख कर, मैंने अपने हृदय में इन बातों के कारण सदैव आनंद लिया है। मानवजाति मेरे हाथों से पूर्व नियत आशीषों का आनंद लेना नहीं जानती है, क्योंकि वह नहीं जानती है कि आशीषों या पीड़ाओं से अंततः क्या तात्पर्य है। इसी कारण, मानवजाति मेरी खोज में ईमानदारी से बहुत दूर है। यदि आने वाले कल के जैसी कोई चीज़ नहीं होती तो मेरे सामने खड़े, तुम लोगों में से कौन, शुद्ध बर्फ के जैसा गोरा, शुद्ध हरिताश्म के जैसा बेदाग़ होता? निश्चित रूप से मेरे प्रति तुम लोगों का प्रेम कुछ ऐसा नहीं है जिसे स्वादिष्ट भोजन या कपड़े के किसी उत्कृष्ट सूट, या किसी उत्तम परिलब्धियों वाले उच्च पद के साथ से अदला-बदला जा सके? अथवा क्या इसकी उस प्रेम से अदला-बदली की जा सकती है जो दूसरे तुम्हारे लिए रखते हैं? निश्चित रूप से परीक्षण से गुजरने से मनुष्य मेरे प्रति अपने प्रेम को नहीं त्यागेगा? निश्चित रूप से कष्ट और क्लेश उसे मेरी व्यवस्था के विरूद्ध शिकायत करने का कारण नहीं बनेंगे? किसी भी मनुष्य ने कभी भी वास्तव में मेरे मुख की तलवार की प्रशंसा नहीं की हैः वह वास्तव में अभ्यंतर को समझे बिना केवल इसके सतही अर्थ को जानता है। यदि मानवजाति वास्तव में मेरी तलवार की धार को देखने में सक्षम होती, तो वह चूहों की तरह तेजी से दौड़ कर अपने बिलों में घुस जाती। उनकी संवेदनशून्यता के कारण, मनुष्य जाति मेरे वचनों के सच्चे अर्थ को नहीं जानती है, और इसलिए उन्हें कोई भनक नहीं है कि मेरे वचन कितने विकट हैं, या उन वचनों के अंतर्गत, उनकी केवल कितनी प्रकृति प्रकट होती है, और उनकी भ्रष्टता को कितना न्याय प्राप्त हुआ है। इस कारण, मेरे वचनों के बारे में उनकी अपरिपक्व अवधारणाओं के आधार पर, अधिकांश लोगों ने उदासीन और वचनबद्ध न होने वाला दृष्टीकोण अपना लिया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों का सच्चा अर्थ कभी समझा नहीं गया है

परमेश्वर के हाथों में अपने पूर्व-नियत आशीषों का आनंद लेना जानता नहीं इंसान, क्योंकि दुख और आशीषों में अंतर बता नहीं सकता इंसान। परमेश्वर की अपनी खोज में इसलिये सच्चा नहीं है इंसान। कल अगर न आए, तो कौन तुम में से, सम्मुख खड़ा परमेश्वर के, बर्फ़ की तरह निर्मल, शुद्ध हरिताश्म की तरह बेदाग़ होगा। परमेश्वर के प्यार को यकीनन नहीं बदला जा सकता ज़ायकेदार आहार से, या अच्छे लिबास से या ऊँचे रुतबे की मोटी तनख़्वाह से? क्या इसे बदला जा सकता है किसी और के प्यार से? क्या इसे त्यागा जा सकता है इम्तहानों से? मुश्किलें यकीनन वजह नहीं होंगी परमेश्वर की योजना के ख़िलाफ शिकायतों की?

समझा नहीं है सचमुच कोई इंसान उस तलवार को, मुख में है जो परमेश्वर के। सिर्फ़ सतही मायने जानता है इंसान, भीतर के मायने समझ नहीं सकता इंसान। परमेश्वर की तलवार की धार को अगर, सचमुच देख पाता इंसान, तो चूहों की तरह दौड़कर, अपने बिल में घुस गया होता इंसान। परमेश्वर के वचनों की सच्चाई को समझने में असमर्थ है इंसान, उसे उनकी शक्ति का ज़रा-सा भी नहीं है अनुमान, कितना न्याय होता है उसकी भ्रष्टता का उन वचनों से, या कितनी प्रकट होती है उसकी प्रकृति उन वचनों से। परमेश्वर के वचनों पर अध-पके विचारों की बुनियाद पर, उदासीन रुख़ अपनाते हैं ज़्यादातर इंसान।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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