परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)" | अंश 363

अब तुम सभी लोगों को अपने अंदर यथाशीघ्र पता लगाना चाहिए कि तुम लोगों के अंदर मेरे प्रति कितनी विश्वासघात बाक़ी है। मैं बेसब्री से तुम्हारी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मेरे साथ अपने व्यवहार में लापरवाह मत हो। मैं कभी भी लोगों के साथ खेल नहीं खेलता हूँ। यदि मैं ऐसा कहता हूँ कि मैं कुछ करूँगा तो मैं निश्चित रूप से ऐसा करूँगा। मुझे आशा है कि तुम सभी ऐसे लोग हो सकते हो जो मेरे वचनों को गंभीरता से लेते हो और यह नहीं सोचते हो कि वे मात्र एक विज्ञान कथा उपन्यास हैं। तुम लोगों से जो मैं चाहता हूँ वह है तुम्हारे द्वारा ठोस कार्रवाई, तुम लोगों की कल्पनाएँ नहीं। इसके बाद, तुम लोगों को मेरे ऐसे प्रश्नों के उत्तर अवश्य देने चाहिए : 1. यदि तुम वास्तव में सेवा करने वाले हो, तो क्या तुम बिना किन्हीं लापरवाह या नकारात्मक तत्वों के निष्ठापूर्वक मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो? 2. यदि तुम्हें पता चले कि मैंने कभी भी तुम्हारी सराहना नहीं की है, तो क्या तब भी तुम जीवन भर टिके रह कर मुझे सेवा प्रदान कर पाओगे? 3. यदि तुमने मेरी ख़ातिर बहुत सारे प्रयास किए हैं लेकिन मैं तब भी तुम्हारे प्रति बहुत रूखा रहूँ, तो क्या गुमनामी में तुम मेरे लिए कार्य करना जारी रख पाओगे? 4. यदि, तुम्हारे द्वारा मेरे लिए खुद को खपाने के बाद भी, अगर मैंने तुम्हारी तुच्छ माँगों को पूरा नहीं किया, तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि क्रोधित हो कर गालियाँ भी बकने लगोगे? 5. यदि तुम हमेशा मेरे प्रति बहुत निष्ठावान रहे हो, मेरे लिए तुममें बहुत प्रेम है, मगर फिर भी तुम बीमारी, दरिद्रता, और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा त्यागे जाने की पीड़ा को भुगतते हो या जीवन में किसी भी अन्य दुर्भाग्य को सहन करते हो, तो क्या तब भी मेरे लिए तुम्हारी निष्ठा और प्यार बना रहेगा? 6. यदि मैने जो किया है उसमें से कुछ भी उससे मिलान नहीं खाता है जिसकी तुमने अपने हृदय में कल्पना की है, तो तुम अपने भविष्य के मार्ग पर कैसे चलोगे? 7. यदि तुम्हें वह कुछ भी प्राप्त नहीं होता है जो तुमने प्राप्त करने की आशा की थी, तो क्या तुम मेरे अनुयायी बने रह सकते हो? 8. यदि तुम्हें मेरे कार्य का उद्देश्य और महत्व कभी भी समझ में नहीं आए हों, तो क्या तुम ऐसे आज्ञाकारी व्यक्ति हो सकते हो जो मनमाने निर्णय और निष्कर्ष नहीं निकालता हो? 9. मानवजाति के साथ रहते समय, मैंने जो वचन कहे हैं और मैंने जो कार्य किए हैं उन सभी को क्या तुम संजोए रख सकते हो? 10. यदि तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे तो भी क्या तुम मेरे निष्ठावान अनुयायी बने रहने में सक्षम हो, आजीवन मेरे लिए कष्ट भुगतने को तैयार हो? 11. क्या तुम मेरे वास्ते जीवित रहने के अपने भविष्य के मार्ग पर विचार नहीं करने, योजना नहीं बनाने या तैयारी नहीं करने में सक्षम हो? ये प्रश्न तुम लोगों से मेरी अंतिम अपेक्षाओं को दर्शाते हैं, और मुझे आशा है कि तुम सभी लोग मुझे उत्तर दे सकते हो। यदि तुम इन प्रश्नों में से एक या दो चीजों को पूरा करते हो, तो तुम्हें अभी भी कड़ी मेहनत करना जारी रखने की आवश्यकता है। यदि तुम इन अपेक्षाओं में से किसी एक को भी पूरा नहीं कर सकते हो, तो तुम निश्चित रूप से उस प्रकार के व्यक्ति हो जिसे नरक में डाला जाएगा। ऐसे लोगों के बारे में मुझे अब कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे निश्चित रूप से ऐसे लोग नहीं हैं जो मेरे अनुकूल हो सकते हों। मैं ऐसे किसी को भी अपने घर में कैसे रख सकता हूँ जो किसी भी परिस्थिति में मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है? जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो अधिकांश परिस्थितियों में मेरे साथ विश्वासघात कर सकते हैं, मैं अन्य व्यवस्थाएँ करने से पहले उनके प्रदर्शन का अवलोकन करूँगा। हालाँकि, वे सब लोग जो हर परिस्थिति में मेरे साथ विश्वासघात करने में सक्षम हैं, मैं उन्हें कभी भी नहीं भूलूँगा; मैं उन्हें अपने मन में याद रखूँगा और उनके बुरे कार्यों का बदला चुकाने के अवसर की प्रतीक्षा करूँगा। मैंने जो अपेक्षाएँ की हैं वे सभी ऐसी समस्याऐं हैं, जिनका तुम्हें स्वयं में निरीक्षण करना चाहिए। मुझे आशा है कि तुम सभी लोग उन पर गंभीरता से विचार कर सकते हो और तुम मेरे साथ लापरवाही से व्यवहार नहीं करोगे। निकट भविष्य में, मेरी अपेक्षाओं के जवाब में तुम्हारे द्वारा दिए गए उत्तरों की मैं जाँच करूँगा। उस समय तक, मैं तुम लोगों से कुछ और की अपेक्षा नहीं करूँगा तथा तुम लोगों की और गंभीर भर्त्सना नहीं करूँगा। इसके बजाय, मैं अपने अधिकार का प्रयोग करूँगा। जिन्हें रखा जाना चाहिए उन्हें रखा जाएगा, जिन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा, जिन्हें शैतान को दिया जाना चाहिए, उन्हें शैतान को दिया जाएगा, जिन्हें भारी दंड मिलना चाहिए, उन्हें भारी दंड मिलेगा, और जिनका पतन हो जाना चाहिए, वे नष्ट कर दिए जाएँगे। इस तरह, मेरे दिनों में मुझे परेशान करने वाला अब और कोई नहीं होगा। क्या तुम मेरे वचनों पर विश्वास करते हो? क्या तुम प्रतिकार में विश्वास करते हो? क्या तुम विश्वास करते हो कि मैं उन सभी बुरे लोगों को दण्ड दूँगा जो मुझे धोखा देते हैं और मेरे साथ विश्वासघात करते हैं? तुम उस दिन के जल्दी आने की आशा करते हो या उसके देर से आने की? क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो सज़ा से बहुत भयभीत है, या कोई ऐसे व्यक्ति हो जो मेरा विरोध करेगा भले ही उसे दण्ड भुगतना पड़े? जब वह दिन आयेगा, तो क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि तुम हँसी-खुशी के बीच रह रहे होगे, या रो रहे होगे और अपने दाँतों को पीस रहे होगे? तुम क्या आशा करते हो कि तुम्हारा किस तरह का अंत होगा? क्या तुमने कभी गंभीरता से विचार किया है कि तुम मुझ पर शत प्रतिशत विश्वास करते हो या मुझ पर शत प्रतिशत संदेह करते हो? क्या तुमने कभी ध्यान से विचार किया है कि तुम्हारे कार्य और व्यवहार तुम्हारे लिए किस प्रकार के परिणाम और अंत लाएँगे? क्या तुम वास्तव में आशा करते हो कि मेरे सभी वचन एक-एक करके पूरे होंगे, या तुम बहुत डरे हुए हो कि मेरे वचन एक-एक करके पूरे होंगे? यदि तुम आशा करते हो कि अपने वचनों को पूरा करने के लिए मैं शीघ्र ही प्रस्थान करूँ, तो तुम्हें अपने स्वयं के वचनों और कार्यों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? यदि तुम मेरे प्रस्थान की आशा नहीं करते हो और आशा नहीं करते हो कि मेरे सभी वचन तुरंत पूरे हो जाएँ, तो तुम मुझ पर विश्वास ही क्यों करते हो? क्या तुम वास्तव में जानते हो कि तुम मेरा अनुसरण क्यों कर रहे हो? यदि यह केवल तुम्हारे क्षितिज का विस्तार करने के लिए है, तो तुम्हें इतनी मुश्किलें उठाने की आवश्यकता नहीं है। यदि यह आशीष पाने के लिए है और भविष्य की आपदा से बच निकलने के लिए है, तो तुम अपने स्वयं के आचरण के बारे में चिंतित क्यों नहीं हो? तुम अपने आप से क्यों नहीं पूछते हो कि क्या तुम मेरी अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो? तुम अपने आप से यह भी क्यों नहीं पूछते कि तुम मेरी भविष्य की आशीषों को प्राप्त करने के योग्य भी हो या नहीं?

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

अपने वचनों और कार्यों को कैसे समझना चाहिये तुम्हें

क्या परमेश्वर के वचनों में, प्रतिकार में विश्वास है तुम्हें? कि सज़ा देगा वो उन्हें जो कपट करते हैं, धोखा देते हैं उसे? तुम चाहते हो वो दिन जल्दी आए या बाद में? क्या ख़ौफ खाते हो तुम सज़ा से, या सज़ा है, ये जानकर भी परमेश्वर का विरोध करोगे? और जब आएगा वो दिन तो रोओगे या ख़ुशियाँ मनाओगे तुम? आशावान हो या भयभीत हो तुम कि पूरे होंगे परमेश्वर के सभी वचन? अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा, अपने वचनों को पूरा करने, तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें? अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें, तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?

किस तरह के अंत की कामना है तुम्हें? परमेश्वर में विश्वास है या शक है तुम्हें? क्या विचारे हैं वो नतीजे और अंत तुमने, जो लाएंगे काम और बर्ताव तुम्हारे? आशावान हो या भयभीत हो तुम कि पूरे होंगे परमेश्वर के सभी वचन। अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा, अपने वचनों को पूरा करने, तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें? अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें, तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?

क्या जानते हो क्यों करते हो अनुसरण परमेश्वर का तुम? अपने ज्ञान की सीमाओं को बढ़ाने के लिये करते हो अगर, फिर ज़रूरी नहीं सहो इन परेशानियों को तुम। लेकिन धन्य होने, आपदा से बचने के लिये करते हो अगर, तो फिर चिंतित क्यों नहीं हो तुम अपने आचरण को लेकर? क्यों नहीं पूछते हो ख़ुद से तुम, क्या पूरा कर सकते हो परमेश्वर की माँगों को तुम? या भविष्य की आशीषों को पाने के लायक हो तुम? अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा, अपने वचनों को पूरा करने, तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें? अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें, तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?

‘मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ’ से

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