परमेश्वर के दैनिक वचन | "सर्वशक्तिमान की आह" | अंश 356

तुम्हारे हृदय में एक बहुत बड़ा रहस्य है। तुम कभी नहीं जान पाते कि वो वहाँ है क्योंकि तुम एक ऐसे संसार में जीवन बिता रहे हो जहां चमकती रोशनी नहीं है। तुम्हारा हृदय और तुम्हारी आत्मा दुष्ट शक्ति द्वारा दबोच ली गई है। तुम्हारी आंखों को अंधकार ने ढक लिया है, तुम सूर्य को आकाश में नहीं देख सकते, न ही रात में टिमटिमाते तारों को। तुम्हारे कान धोखा देने वाले शब्दों से जाम हो गए हैं और तुम यहोवा की गर्जन वाली आवाज को सुन नहीं पाते हो, न ही सिंहासन से तेज बहते जल की आवाज को। जो जो तुम्हारा था और सर्वशक्तिमान ने जो तुम्हें दिया था सब कुछ तुमने खो दिया है। तुम कड़वाहट के एक अथाह सागर में प्रवेश कर चुके हो, जहां बच पाने का सामर्थ नहीं है, जीवित बचने की आशा नहीं है, बस संघर्ष और हलचल मचाने के लिये बचे हुए हो...। उस घड़ी से लेकर तुम शैतान द्वारा यातना सहने के लिए विनाश की नियति में हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आशीषों से बहुत दूरी पर रखे गए हो, सर्वशक्तिमान के प्रावधानों की पहुँच से दूर, और तुम लौट न पाने वाली सड़क पर भटक रहे हो। लाखों पुकारें शायद ही तुम्हारे दिल और आत्मा को उकसा पाएँ। तुम दुष्ट के हाथों में गहरी नींद लेते हो, जिसने तुम्हें काल्पनिक संसार में बिना किसी दिशा, बिना किसी सड़क चिन्ह के। ललचाकर खींच लिया है। अब यहीं से तुमने अपनी मूल पवित्रता को, मासूमियत को खो दिया है, और सर्वशक्तिमान की देखभाल से छिपने लगे हो। वह दुष्ट तुम्हारे हृदय को चलाता है और तुम्हारा जीवन बन जाता है। अब तुम उससे डरते नहीं हो, उसे नजरअंदाज नहीं करते, उस पर संदेह नहीं करते। बल्कि उसे तो तुम अपने हृदय का ईश्वर समझने लगते हो। वह तुम्हारे मन की मूरत बन जाता है, उसकी आराधना करते हो, उसकी परछाई समान सदैव साथ रहते हो, और पारस्परिक रूप से जीवन और मृत्यु में एक दूसरे के लिए वचनबद्ध हो जाते हो। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं कि तुम्हारा अस्तित्व कहां से प्राप्त हुआ, तुम अस्तित्व में क्यों हो, या तुम क्यों मरते हो? तुम्हारे लिए सर्वशक्तिमान एक अजनबी सा हो गया है, तुम उसके मूल अमर व्यक्तित्व को नहीं जानते हो, उसका कार्य जो तुम्हारे लिए उसने किया है, उसको भी भुला बैठे हो। उसका प्रत्येक कार्य तुम्हें घृणित लगने लगा है। न तुम उनसे प्रसन्न हो और न उनकी कीमत जानते हो। उसी दिन से जबसे तुमने सर्वशक्तिमान से प्रावधान प्राप्त करना शुरू कर दिया था। तुम उस दुष्ट शक्ति के साथ चलते आ रहे हो। हजारों वर्षों से तुम उस दुष्ट शक्ति के साथ आंधी तूफान में से होकर चलते रहे हो। उससे मिलकर तुमने परमेश्वर का विरोध किया, जो तुम्हारे जीवन का स्त्रोत था। तुम पश्चताप नहीं करते, अब तुम जान लो कि तुम नाश के चरम बिंदु पर जा पहुंचे हो। तुम भूल बैठे कि दुष्ट शक्ति ने तुम्हें प्रलोभित किया, तुम्हें सताया; तुम अपने मूल को भूल गए। ठीक इसी तरह दुष्ट शक्ति तुम्हें प्रत्येक कदम पर अभी भी हानि पहुंचा रही है। तुम्हारा हृदय और तुम्हारी आत्मा ज्ञानहीन और रद्दी हो गये हैं। तुम अब संसार की व्याकुलता को लेकर शिकायत नहीं करते, ऐसा विश्वास ही नहीं करते कि संसार अधर्म से भरा है। तुम तो सर्वशक्तिमान के अस्तित्व की परवाह तक नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि तुमने दुष्ट शक्ति को अपना सच्चा पिता मान लिया है, और तुम अब उससे अलग नहीं हो सकते। यह तुम्हारे हृदय का एक राज़ है।

जब भोर होती है, भोर का तारा पूर्व दिशा से निकलता है। यह वह तारा है जो पहले कभी नहीं था। यह चमकते हुए आकाश को रोशनी देता है और लोगों के हृदय में बुझी हुई ज्योति को जला देता है। लोग अब अकेले नहीं हैं, इस ज्योति के कारण, ज्योति जो तुम्हारे और दूसरों के ऊपर चमकती है, परंतु सिर्फ तुम अंधकारमय रात में गहरी नींद में सोते रहते हो। तुम आवाज सुनने में, रोशनी को निहार पाने में असमर्थ हो, यहां तक कि एक नए आकाश और एक नई पृथ्वी, नये युग के आगमन पर ध्यान देने में भी असमर्थ हो। क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हें बताता है, "मेरे बेटे, जागना मत, अभी सुबह नहीं हुई है। बाहर सर्दी है, अंदर ही रहो, नहीं तो तलवार और भाले तुम्हारी आंखे छेद डालेंगे।" तुम्हें अपने पिता के प्रोत्साहन पर बड़ा विश्वास है क्योंकि तुम्हारा मानना है पिता जो तुमसे बड़ा है एकदम सही है और वो पिता तुमसे सच्चा प्यार भी करता है। ऐसा प्रोत्साहन और ऐसा प्यार उस किंवदन्ती पर विश्वास ही नहीं दिलाता कि इस संसार में ज्योति है, और बिल्कुल परवाह नहीं करता कि संसार में सच्चाई है। तुम अब और आशा नहीं लगाते कि सर्वशक्तिमान तुम्हें बचा ले। तुमअपनी यथा-स्थिति से संतुष्ट हो, अब रोशनी की किरण के आगमन की आशा ही नहीं रखते, और अब पौराणिक सर्वशक्तिमान परमेश्वर के आगमन हेतु आंखें भी खोलकर नहीं रखते। तुम्हारी नजरों में जो सुंदर दिखता है अब कभी भी उसका पुनरुत्थान नहीं होगा, न ही अस्तित्व में रहेगा। तुम्हारी नज़र में मानवजाति का कल या भविष्य गायब और नष्ट हो जाता है। तुम अपने पिता के वस्त्रों को पूरी शक्ति से पकड़े हुए हो, साथ में कष्ट उठाने को तैयार, अपने सहयात्री और अपनी सुदूर यात्रा की दिशा खो देने के भय से पीड़ित हो। विराट और भ्रमित संसार ने तुममें से अनेक को इस दुनिया में तरह-तरह की भूमिका निभाने हेतु निर्भीकता और निडरता से भर दिया है। उसने कई "योद्धाओं" को तैयार कर दिया है जो मृत्यु से डरते ही नहीं। इससे भी बढ़कर, उसने असंवेदनशील और लकवा ग्रसित मनुष्यों के दल बनाकर रखे हैं जो अपने सृजे जाने के अभिप्राय को बिल्कुल नहीं समझते। सर्वशक्तिमान की नज़रों ने अत्याधिक पीड़ित मानवजाति के चारों ओर देखा, वे जो दुख सह रहे थे उनके विलाप को सुना, वे जो व्यथित थे उनकी निर्लज्जता को देखा, और उस मानवजाति की बेबसी एवं भय को महसूस किया जिसने अपना उद्धार खो दिया है। मनुष्यजाति उसकी देखभाल को नकारती है, अपने ही मार्ग पर चलती है, और उस की नज़र रखने वाली आंखों से दूर रहती है। वह शत्रु के संग गहरे समुद्र की सारी कड़वाहट का स्वाद चखना अधिक पसंद करेगी। सर्वशक्तिमान की आह अब सुनाई नहीं देती। सर्वशक्तिमान के हाथ दुखित मानव जाति को अब स्पर्श करने के लिए तैयार नहीं हैं। वह अपना काम दोहराता है, बार-बार खोता और फिर से पाता है। उस क्षण से वह थक जाता है, ऊब जाता है और तब वह अपने हाथ को रोक देता है, और फिर लोगों के बीच में भ्रमण करना बंद कर देता है...। लोग इन परिवर्तनों के प्रति जागरूक नहीं हैं, सर्वशक्तिमान के आने और जाने, सर्वशक्तिमान के खेदित मन और निराशा को नहीं जानते।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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