परमेश्वर के दैनिक वचन : इंसान की भ्रष्टता का खुलासा | अंश 342

मैं तुम लोगों के बीच में रहा हूँ, कई वसंत और पतझड़ तुम्हारे साथ जुड़ा रहा हूँ; मैं लंबे समय तक तुम लोगों के बीच जीया हूँ, और तुम लोगों के साथ जीया हूँ। तुम लोगों का कितना घृणित व्यवहार मेरी आँखों के सामने से फिसला है? तुम्हारे वे हृदयस्पर्शी शब्द लगातार मेरे कानों में गूँजते हैं; तुम लोगों की हज़ारों-करोड़ों आकांक्षाएँ मेरी वेदी पर रखी गई हैं—इतनी ज्यादा कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता। लेकिन तुम लोगों का जो समर्पण है और जितना तुम अपने आपको खपाते हो, वह रंचमात्र भी नहीं है। मेरी वेदी पर तुम लोग ईमानदारी की एक नन्ही बूँद भी नहीं रखते। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहाँ हैं? तुम लोगों ने मुझसे अनंत अनुग्रह प्राप्त किया है और तुमने स्वर्ग के अनंत रहस्य देखे हैं; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन तुम लोगों को जला देने को मेरा दिल नहीं माना। फिर भी, बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? जो भोजन मैंने तुम्हारे हाथ में दिया है, पलटकर उसी को तुम मुझे पेश कर देते हो, बल्कि यह कहते हो कि वह तुम्हें अपनी कड़ी मेहनत के पसीने के बदले मिला है और तुम अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर रहे हो। तुम यह कैसे नहीं जानते कि मेरे लिए तुम्हारा "योगदान" बस वे सभी चीज़ें हैं, जो मेरी ही वेदी से चुराई गई हैं? इतना ही नहीं, अब तुम वे चीज़ें मुझे चढ़ा रहे हो, क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे? तुम यह कैसे नहीं जान पाते कि आज जिन भेंटों का आनंद मैं उठा रहा हूँ, वे मेरी वेदी पर चढ़ाई गई सभी भेंटें हैं, न कि जो तुमने अपनी कड़ी मेहनत से कमाई हैं और फिर मुझे प्रदान की हैं। तुम लोग वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत करते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? तुम लोग मुझसे इसे और सहने की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को सब-कुछ दे दिया है। मैंने तुम लोगों के लिए सब-कुछ खोलकर रख दिया है, तुम्हारी ज़रूरतें पूरी की हैं, और तुम लोगों की आँखें खोली हैं, फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा की अनदेखी कर इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने नि:स्वार्थ भाव से अपना सब-कुछ तुम लोगों पर न्योछावर कर दिया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी तुम लोगों को मुझसे वह सब मिल जाए, जो मैं स्वर्ग से लाया हूँ। इसके बावजूद तुम लोगों में बिलकुल भी समर्पण नहीं है, और अगर तुमने कोई छोटा-मोटा योगदान किया भी हो, तो बाद में तुम मुझसे उसका "हिसाब बराबर" करने की कोशिश करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं माना जाएगा? तुमने मुझे मात्र रेत का एक कण दिया है, जबकि माँगा एक टन सोना है। क्या तुम सर्वथा विवेकहीन नहीं बन रहे हो? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूँ। बदले में जो कुछ मुझे मिलना चाहिए, उसके दस प्रतिशत का भी कोई नामोनिशान नहीं है, अतिरिक्त बलिदानों की तो बात ही छोड़ दो। इसके अलावा, धर्मपरायण लोगों द्वारा दिए जाने वाले उस दस प्रतिशत को भी दुष्टों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम लोग मुझसे तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो? क्या तुम सब मेरी वेदी को नष्ट नहीं कर रहे हो? ऐसे लोगों को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम लोगों के दुष्कर्मों को खज़ाना कैसे कह सकता हूँ? मेरा कार्य वास्तव में किसके लिए किया जाता है? क्या इसका प्रयोजन केवल मेरे द्वारा तुम लोगों को मार गिराकर अपना अधिकार प्रकट करना हो सकता है? क्या तुम लोगों के जीवन मेरे एक ही वचन पर नहीं टिके हैं? ऐसा क्यों है कि मैं तुम लोगों को निर्देश देने के लिए केवल वचनों का प्रयोग कर रहा हूँ, और मैंने जितनी जल्दी हो सके, तुम लोगों को मार गिराने के लिए अपने वचनों को तथ्यों में नहीं बदला है? क्या मेरे वचनों और कार्य का उद्देश्य केवल मानवजाति को समाप्त करना ही है? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ, जो अंधाधुंध निर्दोषों को मार डालता है? इस समय तुम लोगों में से कितने मानव-जीवन का सही मार्ग खोजने के लिए अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ मेरे सामने आ रहे हैं? मेरे सामने केवल तुम लोगों के शरीर हैं, तुम्हारे दिल अभी भी स्वतंत्र और मुझसे बहुत, बहुत दूर हैं। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि मेरा कार्य वास्तव में क्या है, इसलिए तुम लोगों में से कई ऐसे हैं, जो मुझे छोड़ जाना और मुझसे दूरी बनाना चाहते हैं, और इसके बजाय ऐसे स्वर्ग में रहने की आशा करते हैं, जहाँ कोई ताड़ना या न्याय नहीं है। क्या लोग अपने दिलों में इसी की कामना नहीं करते? मैं निश्चित रूप से तुम्हें बाध्य करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। तुम जो भी मार्ग अपनाते हो, वह तुम्हारी अपनी पसंद है। आज का मार्ग न्याय और शाप से युक्त है, लेकिन तुम सबको पता होना चाहिए कि जो कुछ भी मैंने तुम लोगों को दिया है—चाहे वह न्याय हो या ताड़ना—वे सर्वोत्तम उपहार हैं जो मैं तुम लोगों को दे सकता हूँ, और वे सब वे चीज़ें हैं जिनकी तुम लोगों को तत्काल आवश्यकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

बदले में क्या दिया है तुमने परमेश्वर को

कितने ही पतझड़ और वसंत के मौसम में, संग रहा है तुम्हारे परमेश्वर। अरसे तक साथ रहा है तुम्हारे परमेश्वर। गुज़रे कितने दुष्कर्म तुम्हारे, उसकी आँखों के आगे से? दिल को छू लेने वाले शब्द तुम्हारे, गूँजें कानों में परमेश्वर के। गिनी नहीं जा सकती, उसकी वेदी पर रखी लाखों ख़्वाहिशें तुम्हारी। फिर भी उसकी वेदी पर न समर्पण, न सच्चाई रखते हो तुम लेशमात्र भी। हैं कहाँ पर फल तुम्हारी आस्था के? हैं कहाँ पर फल तुम्हारी आस्था के?

वही आहार अर्पित करते तुम उसको, जो दिया परमेश्वर ने तुमको, कहते हो अर्पित किया तुमने जो कुछ है पास तुम्हारे, इनाम अपनी मेहनत का बताते हो इसे। कैसे ख़बर नहीं है तुमको, जो कुछ अर्पित करते हो तुम परमेश्वर को, सारा योगदान तुम्हारा, वही तो है जो चुराया तुमने उसकी वेदी से। अब वो अर्पित करते हो तुम परमेश्वर को। क्या दग़ा नहीं है ये परमेश्वर से? लेता वो आनंद उसका जो है उसकी वेदी पर, न कि मेहनत के प्रतिफल का, जो तुम देते हो उसको।

परमेश्वर से दग़ा की तुम सचमुच जुर्रत करते हो, तो फिर कैसे माफ़ी दे वो तुमको? कैसे अब वो सहन कर सकता इसको? दे दी है हर चीज़ तुमको उसने। खोल दी हर चीज़ तुम्हारी ख़ातिर उसने। ज़रूरत की हर चीज़ मुहैया करा दी उसने, और आँख भी खोल दी तुम्हारी उसने। मगर अनदेखा कर अपने ज़मीर को, दग़ा देते हो तुम परमेश्वर को, परमेश्वर को।

पाया है तुमने अनंत अनुग्रह परमेश्वर का, देखें हैं तुमने स्वर्गिक रहस्य परमेश्वर के। दिखाई है ज्वाला स्वर्ग की तुम्हें परमेश्वर ने, मगर नहीं है दिल उसका ऐसा कि जला दे तुमको। कितना लौटाया तुमने परमेश्वर को? कितना दिया तुमने ख़ुशी से परमेश्वर को?

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 157

जब परमेश्वर का कार्य किसी निश्चित बिन्दु पर पहुंच जाता है, और उसका प्रबंधन किसी निश्चित बिन्दु पर पहुंच जाता है, तो जो लोग उसके हृदय के...

परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 229

देशों में बड़ी अराजकता है, क्योंकि परमेश्वर की छड़ी ने पृथ्वी पर अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी है। परमेश्वर का कार्य पृथ्वी की स्थिति में...

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें