परमेश्वर के दैनिक वचन | "कार्य और प्रवेश (7)" | अंश 310

कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य की सोच और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और जैविक दृष्टि से नष्ट न होने योग्य बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ उन्हें प्रकाश कभी दिखाई नहीं दे सकता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते हैं...। कभी किसी ने धार्मिकता और न्याय के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, सूखे और पीले-भूरे रंग के। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय-से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को निरंतर अधोलोक में धकेल रहे हैं, जिससे वह अधोलोक में और अधिक गहरा गिर गया है और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता गया है, यहाँ तक कि आज परमेश्वर उसके लिए पूर्णत: अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे जल्दी से कतरा जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि वह उसे जानता ही न हो या उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर अपना अदम्य रोष उस पर प्रकट न करते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में किसी ने भी उसके अस्तित्व की खोज नहीं की। परमेश्वर स्वयं द्वारा लाया गया कार्य पूरा करते हुए मानव-जगत की दुर्दशा का कष्ट चुपचाप सहन करता रहा है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानव-जाति की ज़रूरतों की खातिर कष्ट सहना जारी रखता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानव-जाति की ज़रूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में उसने चुपचाप उसका इंतज़ार किया है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और उसे शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अन्य युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा ठकुरसुहाती करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा ख़राब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप और दुष्ट आत्मा तथा शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसे अब जरा भी स्वतंत्रता नहीं थी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी उपस्थिति में उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय और आत्मा अभी शैशवावस्था में ही थे, शैतानों के राजा ने उनमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि "विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को समझो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है।" यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, "आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने मेहनती श्रमिकों पर भरोसा करें," और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। मनुष्य को अनजाने में इसके सामने लाया गया था, और इसने बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लिया। कभी भी इसे शर्म का बोध महसूस नहीं हुआ, न ही कभी शर्मिंदगी की कोई भावना रखी। इतना ही नहीं, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लिया और उन्हें अपने घर में खींच लिया, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलता रहा और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और घिनौनी बातें कहता है : "दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण होने वाले रूपांतरणों से आती है; बारिश तब होती है, जब पानी भाप बनकर ठंडे तापमानों से मिलता है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरता है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिक विक्षोभ के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का क्या काम है?" ऐसे लोग भी हैं, जो निम्नलिखित जैसे बयान भी देते हैं, ऐसे बयान, जिन्हें स्वर नहीं दिया जाना चाहिए : "मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाजों के अनुक्रमण से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।" पृष्ठभूमि में, यह लोगों को उसे दीवार पर लटकाकर या मेज पर रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करने और भेंट चढ़ाने के लिए बाध्य करता है। जिस समय वह चिल्लाता है कि "कोई परमेश्वर नहीं है," उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा शैतानों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अविलंबित अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह आदमी को उससे गहरी घृणा करने के लिए बाध्य कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं, और दोनों सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह शैतानों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम में घालमेल नहीं कर देता और उसे पूरा खंडहर नहीं बना देता, मानो वह कड़वे अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ़ खड़ा कर लेता है और नज़दीक धँसता जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो गया है, जो अब आहत और क्षत-विक्षत है और एक खेदजनक स्थिति में है, फिर भी वह परमेश्वर से नफ़रत करने से बाज़ नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उच्छृंखल रूप से कैसे दौड़ते फिरने दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस सीमा तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग के सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और भावनाशून्य हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। इसे नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर देते, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्यों की दुनिया में आ गया है और यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान के कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को खंडित करने और उसके साथ जुआ खेलकर पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंतत: शैतानों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर का सलीब से संबंध नहीं है। वह पहले ही उसे शैतान के लिए बगल में उछाल चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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