परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 308

लोगों के जीवन के अनुभवों में, वे अकसर अपने आपमें सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और सुनहरे भविष्य को छोड़ दिया, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे इसमें कुछ जोड़ना होगा, और इसे निश्चित करना होगा—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त की है? मैंने इस समय के दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं बड़ी दौड़ से दौड़ा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कुछ दिया है? क्या उसने मेरे भले कार्यों को स्मरण किया है? मेरा अन्त क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त कर सकता हूँ? प्रत्येक व्यक्ति लगातार, और अकसर अपने हृदय में इस प्रकार का गुणा भाग करता है, और वे परमेश्वर से मांग करते हैं जिनमें उनकी मंशा, महत्वाकांक्षा, एवं सौदे होते हैं। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर को परखता है, परमेश्वर के बारे में निरन्तर युक्तियों को ईजाद करता है, और लगातार परमेश्वर के साथ अपने अंत के बारे में बहस करता है, और परमेश्वर से एक कथन निकलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह सब कुछ देता है या नहीं जो वह चाहता है। ठीक इसी समय परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान व्यवहार नहीं करता है। वह हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करता है, बिना रूके लगातार उससे मांग करता है, और यहाँ तक कि हर कदम पर उस पर दबाव डालता है, और एक इंच दिए जाने के बाद एक मील हथियाने की कोशिश करता है। ठीक उसी समय परमेश्वर के साथ सौदबाजी करते हुए, मनुष्य उसके साथ बहस भी करता है, और ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएं उन पर आती हैं या जब वे अपने आप को खतरे में पाते हैं, अकसर कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त, और परमेश्वर के विषय में शिकायतों से भर जाते हैं। जब उसने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना प्रारम्भ किया था, तब से मनुष्य ने परमेश्वर को एक सौभाग्य का सींग, एवं स्विस सेना का एक चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा लेनदार माना है, मानो परमेश्वर से आशीषें और प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार एवं कर्तव्य था, जबकि परमेश्वर की ज़िम्मेदारी थी कि वह मनुष्य की रक्षा एवं देखभाल करे और उसके लिए चीज़ों की आपूर्ति करे। वे सभी जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनके लिए "परमेश्वर में विश्वास करने" की मूल समझ, और परमेश्वर में विश्वास करने की अवधारणा की उनकी गहरी समझ ऐसी ही है। मनुष्य के स्वभाव के मूल-तत्व से लेकर उसके आत्मनिष्ठ अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से कोई सम्बन्ध रखता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य के उद्देश्य का परमेश्वर की आराधना के साथ सम्भवतः कोई लेना देना नहीं है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य ने कभी यह विचार नहीं किया और न ही यह समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने में परमेश्वर के भय और परमेश्वर की आराधना की आवश्यकता होती है। ऐसी परिस्थितियों के प्रकाश में, मनुष्य का मूल-तत्व स्पष्ट है। और यह मूल-तत्व क्या है? यह ऐसा है कि मनुष्य का हृदय मैला है, यह धोखे एवं धूर्तता को आश्रय देता है, और यह निष्पक्षता एवं धार्मिकता से प्रेम नहीं करता है, या न ही उससे प्रेम करता है जो सकारात्मक है, और यह घृणित एवं लालची है। मनुष्य का हृदय कभी भी परमेश्वर के अत्याधिक करीब नहीं आ सकता है; उसने इसे बिलकुल भी परमेश्वर को नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य के असली हृदय को कभी भी नहीं देखा है, न ही मनुष्य के द्वारा कभी उसकी आराधना की गई है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है, या उसने कितना अधिक काम किया है, या उसने मनुष्य को कितना कुछ प्रदान किया है, मनुष्य इसके प्रति अंधा बना रहता है, और पूरी तरह से उदासीन रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह केवल अपने हृदय की ही चिंता करना चाहता है, अपने स्वयं के निर्णयों को ही लेना चाहता है—इसका गुप्त अर्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण नहीं करना चाहता है, या परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों को नहीं मानना चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। आज मनुष्य की परिस्थितियां ऐसी ही हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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