परमेश्वर के दैनिक वचन | "कार्य और प्रवेश (3)" | अंश 308

मनुष्य के प्रवेश करने के समय के दौरान जीवन सदा उबाऊ होता है, आध्यात्मिक जीवन के नीरस तत्त्वों से भरा, जैसे कि प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना या सभाएँ आयोजित करना, इसलिए लोगों को हमेशा यह लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने में कोई आनंद नहीं आता। ऐसी आध्यात्मिक क्रियाएँ हमेशा मनुष्यजाति के मूल स्वभाव के आधार पर की जाती हैं, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यद्यपि कभी-कभी लोगों को पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त हो सकता है, परंतु उनकी मूल सोच, स्वभाव, जीवन-शैली और आदतें अभी भी उनके भीतर जड़ पकड़े हुए हैं, और इसलिए उनका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है। जिन अंधविश्वासी गतिविधियों में लोग संलग्न रहते हैं, परमेश्वर उनसे सबसे ज्यादा घृणा करता है, परंतु बहुत-से लोग अभी भी यह सोचकर उन्हें त्यागने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास की इन गतिविधियों की आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई है, और आज भी उन्हें पूरी तरह से त्यागा जाना बाकी है। ऐसी चीज़ें, जैसे कि युवा लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और ऐसे ही अन्य तरीके, जिनसे आनंद के अवसर मनाए जाते हैं; प्राचीन फार्मूले, जो पूर्वजों से मिले हैं; अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ, जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं : ये परमेश्वर के लिए और भी ज्यादा घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (धार्मिक जगत द्वारा मनाए जाने वाले सब्त समेत) भी उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्यों के बीच के सामाजिक संबंध और सांसारिक अंत:क्रियाएँ, सब परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक कि वसंतोत्सव और क्रिसमस भी, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञा से नहीं मनाए जाते, इन त्योहारों की छुट्टियों के लिए खिलौनों और सजावट, जैसे कि गीत, पटाखे, लालटेनें, पवित्र समागम, क्रिसमस के उपहार और क्रिसमस के उत्सव, और परम समागम की तो बात ही छोड़ो—क्या वे मनुष्यों के मन की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी तोड़ना, शराब और बढ़िया लिनन और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सभी पारंपरिक पर्व-दिवस, जैसे ड्रैगन के सिर उठाने का दिन, ड्रैगन नौका महोत्सव, मध्य-शरद महोत्सव, लाबा महोत्सव और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्योहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस और क्रिसमस, ये सभी अनुचित त्योहार प्राचीन काल से बहुत लोगों द्वारा मनाए जा रहे हैं और आगे सौंपे जाते रहे हैं। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है, जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ये निर्दोष प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये शैतान द्वारा मनुष्यजाति के साथ खेली जाने वाली चालें हैं। जो स्थान शैतानों से जितना ज्यादा भरा होगा, और जितना वह पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ होगा, उतनी ही गहराई से वह सामंती रीति-रिवाजों से घिरा होगा। ये चीज़ें लोगों को कसकर बाँध देती हैं और उनके हिलने-डुलने की भी गुंजाइश नहीं छोड़तीं। धार्मिक जगत के कई त्योहार बड़ी मौलिकता प्रदर्शित करते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किंतु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे वह लोगों को बाँध देता है और परमेश्वर को जानने से रोक देता है—वे सब शैतान की धूर्त चालें हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह उस समय के साधन और शैली नष्ट कर चुका होता है और उनका कोई निशान नहीं छोड़ता। परंतु "सच्चे विश्वासी" उन मूर्त भौतिक वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस बीच वे परमेश्वर की सत्ता को अपने मस्तिष्क के पिछले हिस्से में खिसका देते हैं और उसके बारे में आगे कोई अध्ययन नहीं करते, और यह समझते हैं कि वे परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हुए हैं, जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके होते हैं और शैतान को आराधना के लिए मेज पर रख चुके होते हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्र—लोग इन्हें स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं, जबकि पूरे समय बार-बार "प्रभु, स्वर्गिक पिता" पुकारते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? आज तक पूर्वजों द्वारा मनुष्यजाति को सौंपी गई ऐसी कई बातों और प्रथाओं से परमेश्वर को घृणा है; वे गंभीरता से परमेश्वर के लिए आगे के मार्ग में बाधा डालती हैं और, इतना ही नहीं, वे मनुष्यजाति के प्रवेश में भारी अड़चन पैदा करती हैं। यह बात तो रही एक तरफ कि शैतान ने मनुष्यजाति को किस सीमा तक भ्रष्ट किया है, लोगों के अंतर्मन विटनेस ली के नियम, लॉरेंस के अनुभवों, वॉचमैन नी के सर्वेक्षणों और पौलुस के कार्य जैसी चीज़ों से पूर्णतः भरे हुए हैं। परमेश्वर के पास मनुष्यों पर कार्य करने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है, क्योंकि उनके भीतर व्यक्तिवाद, विधियाँ, नियम, विनियम, प्रणालियाँ और ऐसी ही अनेक चीज़ें बहुत ज्यादा भरी पड़ी हैं; लोगों के सामंती अंधविश्वास की प्रवृत्तियों के अतिरिक्त इन चीज़ों ने मनुष्यजाति को बंदी बनाकर उसे निगल लिया है। यह ऐसा है, मानो लोगों के विचार एक रोचक चलचित्र हों, जो बादलों की सवारी करने वाले विलक्षण प्राणियों के साथ पूरे रंग में एक परि-कथा का वर्णन कर रहा है, जो इतना कल्पनाशील है कि लोगों को विस्मित कर देता है और उन्हें चकित और अवाक छोड़ देता है। सच कहा जाए, तो आज परमेश्वर जो काम करने के लिए आया है, वह मुख्यतः मनुष्यों के अंधविश्वासी लक्षणों से निपटना और उन्हें दूर करना तथा उनके मानसिक दृष्टिकोण पूर्ण रूप से रूपांतरित करना है। परमेश्वर का कार्य उस विरासत के कारण आज तक पूरा नहीं हुआ है, जो मनुष्यजाति द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे सौंपा गया है; यह वह कार्य है, जो किसी महान आध्यात्मिक व्यक्ति की धरोहर को आगे बढ़ाने, या परमेश्वर द्वारा किसी अन्य युग में किए गए किसी प्रतिनिधि प्रकृति के कार्य को विरासत में प्राप्त करने की आवश्यकता के बिना उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से आरंभ और पूर्ण किया गया है। मनुष्यों को इनमें से किसी चीज़ की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आज परमेश्वर के बोलने और कार्य करने की भिन्न शैली है, फिर मनुष्यों को कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है? यदि मनुष्य अपने "पूर्वजों" की विरासत को जारी रखते हुए वर्तमान धारा के अंतर्गत आज के मार्ग पर चलते हैं, तो वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएँगे। परमेश्वर मानव-व्यवहार के इस विशेष ढंग से बहुत घृणा करता है, वैसे ही जैसे वह मानव-जगत के वर्षों, महीनों और दिनों से घृणा करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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