परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" | अंश 302

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद सद्विवेक, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और कुछ भी नहीं है; यदि मनुष्य का सद्विवेक और समझ सामान्य होने के योग्य हैं, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि मनुष्य का सद्विवेक हमेशा सुन्न रहा है, मनुष्य की समझ कभी भी सही नहीं रही, और लगातार मंद होती गई है कि मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना रहा, यहाँ तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अपने घर में प्रवेश के अंतिम दिनों में परमेश्वर के देहधारी होने का इंकार कर दिया, और परमेश्वर की देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर की देह उसको घृणित और नीच देखती है। यदि मनुष्य में थोड़ी सी भी मानवता होती, वह परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता। यदि उसे थोड़ी सी भी समझ होती, वह परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसके पास एक थोड़ा सा सद्विवेक होता, वह देहधारी परमेश्वर के साथ इस ढंग से इतना "आभारी" न होता। मनुष्य परमेश्वर के देह बनने के युग में जीता है, फिर भी वह एक अच्छा अवसर देने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने में अयोग्य है, और इसके बजाय परमेश्वर के आने को कोसता है, या सम्पूर्ण रूप से परमेश्वर के देह धारण के तथ्य को अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में और इसके बारे में ऊबा हुआ है। इसकी परवाह किये बिना कि मनुष्य परमेश्वर के आने के प्रति कैसा व्यवहार करता है, परमेश्वर ने, संक्षेप में, बिना इसकी परवाह किये अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा सा भी स्वागत नहीं किया है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंदी हो गई है, और उसका सद्विवेक दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और बहुत पहले से ही मनुष्य का मूल सद्विवेक होने से बंद हो गया है। मनुष्य सिर्फ मानवजाति पर देहधारी परमेश्वर के बहुत अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान के लिए अधन्यवादी ही नहीं, परन्तु परमेश्वर के द्वारा उसे सत्य दिए जाने पर बुरा मान गया है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ा सी भी रूचि नहीं है इसलिए वह परमेश्वर के प्रति बुरा मान गया है। मनुष्य सिर्फ देहधारी परमेश्वर के लिए अपनी जान देने के अयोग्य ही नहीं है, परन्तु वह उससे एहसान निकालने की कोशिश भी करता रहता है, और परमेश्वर से ऐसी माँगें करता है जो दर्जनों गुना बड़ी हैं उससे जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। ऐसे सद्विवेक और समझ के लोग इसे दिया हुआ मानते हैं, और फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत अधिक खर्च किया है, और परमेश्वर ने उन्हें बहुत थोड़ा दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे सिर्फ एक कटोरा पानी ही दिया है फिर भी अपने हाथ पसार कर माँग दो कटोरे दूध के बराबर की करते हैं, या मुझे एक रात के लिए कमरा दिया है परन्तु मुझ से निवास-स्थान के शुल्क के रूप में कई गुना दाम वसुलते हैं। ऐसी मानवता, और ऐसे सद्विवेक के साथ, कैसे तू अब भी जीवन पाने की कामना करता है? तू कितना घृणित अभागा है! यह ऐसा इस मानवता और मनुष्य के सद्विवेक के कारण ही है कि देहधारी परमेश्वर पूरी धरती पर भटकता है, किसी भी स्थान पर आश्रय नहीं पाता। वे जो सचमुच में सद्विवेक और मानवता को धारण किये हुए हैं उन्हें देहधारी परमेश्वर की आराधना और सच्चे दिल से सेवा इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उसने कितना कार्य किया है, परन्तु तब भी चाहे वह कुछ भी कार्य नहीं करता। यह उनके द्वारा किया जाना चाहिए जो सही समझ के हैं, और यह मनुष्य का कर्तव्य है। अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों के बारे में बोलते हैं: वे परवाह नहीं करते कि वह एक परमेश्वर है या एक मनुष्य है, और वे सिर्फ अपनी ही शर्तों के बारे में बातचीत करते हैं, और सिर्फ अपनी ही इच्छाओं की उपलब्धि का पीछा करते हैं। जब तुम सब मेरे लिए खाना पकाते हो, तुम सब बावर्ची का शुल्क माँगते हो, जब तुम सब मेरे लिए दौड़ते हो, तुम सब मुझ से दौड़ने का शुल्क माँगते हो, जब तुम सब मेरे लिए काम करते हो तो तुम सब काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम सब मेरे कपड़े धोते हो तुम सब कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम सब कलीसिया के लिए प्रदान करते हो तुम सब स्वस्थ हो जाने की लागत माँगते हो, जब तुम सब बोलते हो तो तुम सब वक्ता का शुल्क माँगते हो, जब तुम सब पुस्तकें बाँटते हो तो तुम सब वितरण शुल्क माँगते हो, और जब तुम सब लिखते हो तो तुम सब लिखने का शुल्क माँगते हो। जिनके साथ मैं निपट चुका हूँ वे भी मुझ से मुआवजा माँगते हैं, जबकि वे जो घर भेजे जा चुके हैं अपने नाम के नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति की माँग करते हैं; वे जो अविवाहित हैं दहेज की माँग करते हैं, या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, वे जो मुर्गे को काटते हैं कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, वे जो खाने को तलते हैं तलने का शुल्क माँगते तलते हैं, और वे जो सूप बनाते हैं उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम सबकी ऊँची और शक्तिशाली मानवता है और ये तुम सबके स्नेही सद्विवेक के द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम सबकी समझ कहाँ है? तुम सबकी मानवता कहाँ है? मुझे बताने दो! यदि तुम सब ऐसे ही करते रहोगे, मैं तुम सबके मध्य में कार्य करना बंद कर दूँगा। मैं मनुष्य के रूप में जानवरों के झुंड में कार्य नहीं करूँगा, मैं ऐसे समूह के लोगों के लिए दुःख नहीं सहूँगा जिनका निष्पक्ष चेहरा जंगली हृदय को छुपाये हुए है, मैं ऐसे जानवरों के झुंड के लिए सहन नहीं करूँगा जिनके पास उद्धार के लिए थोड़ी सी भी संभावना नहीं है। जिस दिन मैं तुम सबकी ओर पीठ कर लूँगा उसी दिन तुम सब मर जाओगे, उस दिन अंधकार तुम सब पर आ जायेगा, और उस दिन तुम सब प्रकाश के द्वारा त्याग दिए जाओगे! मुझे बताने दो! मैं कभी भी तुम लोग जैसे समूह पर दयालु नहीं बनूँगा, एक ऐसा झुंड जो जानवरों से भी बदतर है! मेरे वचनों और कार्रवाई की कुछ सीमायें हैं, और तुम सबकी मानवता और सद्विवेक के साथ जैसे कि वे हैं, मैं और अधिक कार्य नहीं करूँगा, क्योंकि तुम सबमें सद्विवेक में बहुत कमी है, तुम सबने मुझे बहुत अधिक पीड़ा दी है, और तुम सबका घृणित व्यवहार मुझे बहुत अधिक घिन दिलाता है! वे लोग जो मानवता और सद्विवेक में बहुत कम हैं उन्हें उद्धार का अवसर नहीं मिलेगा; मैं ऐसे बेरहम और एहसान फरामोश लोगों को कभी भी नहीं बचाऊँगा। जब मेरा दिन आएगा, मैं अनंत काल के लिए अनाज्ञाकारी संतान पर अपनी झुलसाने वाली आग की लपटों को बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे प्रचण्ड कोप को उकसाया था, मैं ऐसे जानवरों पर अपने अनंत काल की सजा को थोप दूंगा जिन्होंने एक बार मुझ पर अपशब्द उछाले और मुझे त्याग दिया, मैं अनाज्ञाकारिता के पुत्रों को अपने क्रोध की आग में हमेशा के लिए जलाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे साथ खाया और मेरे साथ रहे परन्तु मुझ पर विश्वास नहीं किया, और मेरा अपमान किया और मुझे धोखा दिया। मैं उन सब को आधीन करूँगा जिन्होंने मेरे कोप को सजा के लिए उकसाया, मैं उन सभी जानवरों पर अपने कोप की सम्पूर्णता को बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने की कामना की फिर भी मेरी आराधना या मेरा आज्ञापालन नहीं किया, मेरी छड़ी जिससे मैं मनुष्य को मारता हूँ वह उन जानवरों पर टूट पड़ेगी जिन्होंने एक बार मेरी देखभाल और रहस्य जो मैंने बोले उनका आनंद लिया, और जिन्होंने मुझसे भौतिक आनंद लेने की कोशिश की। मैं किसी एक भी व्यक्ति को क्षमा नहीं करूँगा जो मेरा स्थान लेने की कोशिश करता है; मैं उन में से एक को भी नहीं छोड़ूँगा जो मुझ से खाना और कपड़े हथियाने की कोशिश करते हैं। अब तो, तुम सब नुकसान से बचे हुए हो और मुझसे माँगें माँगने में अपने को धोखा देना जारी रखते हो। जब कोप का दिन आ जायेगा तू मुझ से और अधिक माँगें नहीं माँगेगा; उस समय, मैं तुम लोगों के हृदय की चीजों का "आनंद" लेने दूँगा, मैं तुम सबके चेहरे को मिट्टी में घुसा दूँगा, और तुम सब फिर दोबारा कभी भी उठ नहीं पाओगे! शीघ्र या विलंब से, मैं तुम सबको यह कर्ज "चुकाने" जा रहा हूँ—और मैं आशा करता हूँ कि तुम सब धीरज से इस दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहे हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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