परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" | अंश 301

मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव शैतान के द्वारा उसे जहर देने और रौंदे जाने के कारण उपजा है, उस प्रबल नुकसान से जिसे शैतान ने उसकी सोच नैतिकता, अंतर्दृष्टि, और समझ पर पहुँचाया है। यह ठीक है क्योंकि मनुष्य की मौलिक चीजें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दी गईं हैं, और पूरी तरह से उसके विपरीत है जैसे परमेश्वर ने उन्हें मूल रूप से बनाया था, कि मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं समझता। इस प्रकार, मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और समझ में बदलाव के साथ शुरू होना चाहिए जो परमेश्वर के बारे में उसके ज्ञान को और सत्य के बारे में उसके ज्ञान को बदलेगा। वे जो अधिकतर गहरे भ्रष्ट स्थानों में जन्मे थे वे इस बारे में और अधिक अज्ञानी हैं कि परमेश्वर क्या है, या परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है। जितने अधिक लोग भ्रष्ट होते हैं, उतना ही कम वे परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जानते हैं, और उनकी समझ और अंतर्दृष्टि अत्यन्त कम होती है। परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, मनुष्य का सद्विवेक सुन्न हो गया है, वह अनैतिक है, उसके विचार पतित हैं, और उसके पास एक पिछड़ा मानसिक दृष्टिकोण है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों का आज्ञापालन करता था। वह स्वभाविक रूप से सही समझ और सद्विवेक का था, और सामान्य मानवता का था। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, सद्विवेक, और मानवता मंदी हो गईं और शैतान के द्वारा खराब हो गईं। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक लगातार और गंभीर हो गई है। अभी तक मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और सद्विवेक का प्रकटीकरण है, और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका सद्विवेक अत्यंत मंदा हो गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, कि वह परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "सामान्य समझ" आज्ञापालन और परमेश्वर के प्रति विश्वास योग्य बने रहने को, परमेश्वर के प्रति तड़प, परमेश्वर के प्रति स्पष्ट, और परमेश्वर के प्रति सद्सद्विवेक होने को संदर्भित करती है। यह परमेश्वर के प्रति एक हृदय और मन होने को संदर्भित करती है, और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। वे जो धर्मपथ से हटनेवाली समझ के हैं वे ऐसे नहीं हैं। मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया था इसिलिए, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाओं का उत्पादन किया है, और परमेश्वर के लिए उसके पास निष्ठा या चाहत नहीं है, और परमेश्वर के प्रति कुछ भी कहने के लिए सद्विवेक नहीं है। मनुष्य जानबूझकर विरोध करता और परमेश्वर पर दोष लगाता है, और, इसके अलावा, उसकी पीठ-पीछे उस पर जोर से अपशब्द फेंक कर मारता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ-पीछे उस पर दोष लगाता है, उसकी आज्ञाकारिता करने का कोई भी इरादा नहीं है, और सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—वे लोग जो अनैतिक समझ के हैं—वे अपने खुद के घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता का पछतावा करने के अयोग्य हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; जितने अधिक लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं लेकिन अपने आप को नहीं जानते, उतने अधिक वे सही समझ के नहीं हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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