परमेश्वर के दैनिक वचन | "अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना" | अंश 569

लोगों की अपनी प्रकृति के बारे में जो समझ है वह बहुत ही सतही है, और इसके तथा परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या ठोस समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग स्वयं को इस तरह से समझते हैं वे सत्य को अभ्यास में नहीं लाते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप में नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, वे मानकों के आसपास भी नहीं हैं, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

किसी व्यक्ति के व्यवहार या आचरण में बदलाव का अर्थ उसकी प्रकृति में बदलाव नहीं है। इसका कारण यह है कि किसी का आचरण उसके मूल स्वरूप को नहीं बदल सकता, न ही यह उसकी प्रकृति को बदल सकता है। केवल जब कोई अपने स्वयं के स्वभाव को जान लेता है, तभी उसका अभ्यास गहरा, और नियमों के एक समूह के पालन से भिन्न, हो सकता है। मनुष्य द्वारा किया जाने वाला सत्य का वर्तमान अभ्यास अभी भी पर्याप्त नहीं है, और वह सत्य की अपेक्षाओं पर पूरी तरह से खरा नहीं उतर सकता। लोग केवल सत्य के एक अंश का अभ्यास करते हैं, और केवल तभी करते हैं, जब वे कुछ अवस्थाओं और परिस्थितियों में होते हैं; वे सभी अवस्थाओं और परिस्थितियों में सत्य को व्यवहार में नहीं ला पाते। जब किसी अवसर पर व्यक्ति खुश होता है और उसकी अवस्था अच्छी होती है, या जब वह अपने समूह से सहभागिता कर रहा होता है और सामान्य से अधिक मुक्त महसूस करता है, तो वह अस्थायी रूप से कुछ ऐसी चीज़ें कर सकता है जो सत्य के अनुसार होती हैं; किंतु जब नकारात्मक लोगों और ऐसे लोगों की संगति में होता है, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो उसका अभ्यास बदतर और उसके कार्य कुछ हद तक अनुचित होते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग सत्य का अभ्यास दृढ़ता की मनोवृत्ति से करने के बजाय भावना या परिस्थिति के क्षणिक प्रभावों से निर्देशित होकर करते हैं। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि तुमने अपनी अवस्था को नहीं समझा है, न ही तुम अपनी प्रकृति को समझ पाए हो, इसलिए कई बार तुम फिर भी उन चीज़ों को करने में सक्षम होते हो, जिन्हें करने की तुम खुद कल्पना भी नहीं कर सकते। तुम अपनी कुछ ही अवस्थाओं को जानते हो, लेकिन, चूँकि तुमने अपनी प्रकृति को नहीं समझा है, इसलिए तुम इसे नियंत्रित नहीं कर सकते कि तुम भविष्य में क्या कर सकते हो—यानी तुम्हारे पास इसकी पूर्ण निश्चितता नहीं है कि तुम दृढ़ बने रहोगे। कई बार तुम ऐसी अवस्था में होते हो कि तुम सत्य को व्यवहार में ला सकते हो और तुम कुछ बदलाव प्रकट करते प्रतीत होते हो, लेकिन एक भिन्न परिवेश में तुम उसे व्यवहार में लाने में असमर्थ होते हो। यह तुम्हारे नियंत्रण के बाहर होता है। कभी तुम सत्य का अभ्यास कर पाते हो, और कभी तुम नहीं कर पाते। किसी क्षण, तुम समझते हो, और अगले ही क्षण तुम भ्रमित होते हो। वर्तमान में तुम कुछ बुरा नहीं कर रहे, लेकिन शायद कुछ ही देर में करोगे। इससे साबित होता है कि भ्रष्ट चीज़ें अभी भी तुम्हारे भीतर मौजूद हैं, और यदि तुम सच्चा आत्म-बोध पाने में असमर्थ हो, तो उन्हें दूर करना आसान नहीं होगा। यदि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव की पूरी समझ हासिल नहीं कर पाते, और अंततः उन चीज़ों को करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, तो तुम खतरे में हो। यदि तुम अपनी प्रकृति में एक तीक्ष्ण अंतर्दृष्टि हासिल कर सकते हो और उससे नफरत कर सकते हो, तो तुम अपने आपको नियंत्रित करने, अपने आपको त्यागने, और सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम होगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के अनुसार स्वयं को समझो

इंसान अपनी प्रकृति अच्छे से जानता नहीं, जो न्याय और प्रकाशन के ईश-वचनों से बहुत दूर है। गहरी और सारभूत नहीं है। बाहरी कामों पर ध्यान वो देता है। वो कहे वो जाने खुद को, तो भी, ये ज्ञान गहरा नहीं। लोगों ने न सोचा कि वे ऐसे ही हैं, कि यही उनकी प्रकृति है, क्योंकि उन्होंने ऐसा काम किया या कुछ प्रकट किया। परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की, लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है उनके काम करने और बोलने का तरीका, इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे।

लोगों को लगे कि उनकी गलतियाँ हैं कुछ पलों की लापरवाह अभिव्यक्तियाँ, वे उनकी प्रकृति का सच नहीं। जो अपनी प्रकृति को ऐसे देखते वो सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें सत्य की प्यास नहीं, न वे सत्य को सत्य मानते हैं। लापरवाही से बस नियम का पालन करते। लोगों ने न सोचा कि वे ऐसे ही हैं, कि यही उनकी प्रकृति है, क्योंकि उन्होंने ऐसा काम किया या कुछ प्रकट किया। परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की, लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है उनके काम करने और बोलने का तरीका, इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे। लोगों को अपनी प्रकृति बहुत भ्रष्ट नहीं लगती, वे खुद को इतना बुरा नहीं मानते कि हों काबिल सज़ा पाने या तबाही के, उन्हें लगे कि कभी-कभी झूठ बोलना ठीक है, कि वे पहले से ज़्यादा बेहतर हैं। लेकिन वे तो मानकों के पास भी नहीं हैं। सत्य को अभ्यास में न लाने से, लोगों के कुछ ही काम ऐसे हैं जो सत्य का विरोध न करेें। परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की, लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है उनके काम करने और बोलने का तरीका, इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे।

— 'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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