परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं" | अंश 547

जिनके पास परमेश्वर की समझ नहीं होती वे कभी भी पूरी तरह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो सकते। ऐसे लोग अनाज्ञाकारिता के पुत्र हैं। वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं, और उनमें बहुत अधिक विद्रोह है, इसलिए वे खुद को परमेश्वर से दूर कर लेते हैं और उसकी छानबीन को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। ऐसे लोग आसानी से पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अपने ढंग के मामले में, और उनके प्रति अपनी स्वीकृति में चयनशील होते हैं। वे परमेश्वर के वचन के उन भागों को ग्रहण करते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार होते हैं जबकि उन्हें अस्वीकार कर देते हैं जो उनकी धारणा के अनुसार नहीं हैं। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ सबसे स्पष्ट विद्रोह और प्रतिरोध नहीं है? यदि कोई परमेश्वर के बारे में थोड़ी-सी भी समझ हासिल किए बगैर वर्षों से उस पर विश्वास कर रहा हो, तो वह एक अविश्वासी है। जो लोग परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करने के इच्छुक हैं वे परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करते हैं, वे उसके वचनों को ग्रहण करना चाहते हैं। ये वे हैं, जो परमेश्वर का उत्तराधिकार और आशीषें प्राप्त करेंगे, और वे सबसे धन्य हैं। परमेश्वर उन्हें श्राप देता है जिनके दिलों में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। वह ऐसे लोगों को ताड़ना देता है और उन्हें त्याग देता है। यदि तू परमेश्वर से प्यार नहीं करता, तो वो तुझे त्याग देगा और यदि मैं जो कहता हूँ तू उसे नहीं सुनता है, तो मैं वादा करता हूँ कि परमेश्वर का आत्मा तुझे त्याग देगा। यदि तुझे भरोसा नहीं है, तो कोशिश करके देख ले! आज, मैं तुझे अभ्यास के लिए एक रास्ता स्पष्ट रूप से बताता हूँ, लेकिन तू इसे अभ्यास में लाता है या नहीं यह तेरे ऊपर है। यदि तू विश्वास नहीं करता है, यदि तू इसे अभ्यास में नहीं लाता है, तो तू स्वयं देखेगा कि पवित्र आत्मा तुझमें कार्य करता है या नहीं! यदि तू परमेश्वर के बारे में समझ पाने की कोशिश नहीं करता है, तो पवित्र आत्मा तुझमें कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। परमेश्वर के सभी कार्य को संजोना, उसकी प्रबुद्धता को संजोना, परमेश्वर की उपस्थिति को संजोना, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोना, इस बात को संजोना कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह सब परमेश्वर के दिल के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, अर्थात यदि उसने तुझ पर जो सारे कार्य किए हैं, तू उसे संजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों को नहीं संजोता है, तो परमेश्वर तुझ पर कार्य नहीं करेगा, बल्कि वह केवल तेरे विश्वास के लिए ज़रा-सा अनुग्रह देगा, या तुझे कुछ धन की आशीष या तेरे परिवार के लिए थोड़ी सुरक्षा देगा। परमेश्वर के वचनों को अपनी वास्तविकता बनाने, उसे संतुष्ट करने और उसके दिल के अनुसार होने के लिए तुझे कडा प्रयास करना चाहिए; तुझे केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का ही प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्वासियों के लिए परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने, पूर्णता पाने, और परमेश्वर की इच्छा पर चलनेवालों में से एक बनने की अपेक्षा कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यह वो लक्ष्य है जिसे पूरा करने का तुझे प्रयास करना चाहिए।

अनुग्रह के युग में जिसका मनुष्य ने अनुसरण किया, वह अब अप्रचलित हो गया है क्योंकि वर्तमान में अनुसरण का एक उच्चतर मानक है, जिसका अनुसरण किया जाता है वह अधिक उत्कृष्ट भी है और अधिक व्यावहारिक भी, जिसका अनुसरण किया जाता है वो मनुष्य की भीतरी आवश्यकता को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। पिछले युगों में, परमेश्वर लोगों पर उस तरह कार्य नहीं करता था जैसे आज करता है, वह लोगों से उतनी बातें नहीं करता था जितनी आज करता है, न ही उसे उनसे उतनी अपेक्षा थी जितनी की आज के लोगों से है। आज जो परमेश्वर इन बातों को तुम लोगों को बताता है, वह दिखाता है कि परमेश्वर का अंतिम इरादा तुम लोगों पर, यानि इस समूह पर ध्यान केन्द्रित करना है। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में इसका अनुसरण कर। कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या तू भाग-दौड़ करता है, खुद को खपाता है, किसी काम में आता है, या तूने परमेश्वर द्वारा आदेश पाया है या नहीं, पूर्ण बनाया जाना और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना, इन लक्ष्यों को पाना ही हमेशा उद्देश्य होता है। यदि कोई कहता है, कि वह परमेश्वर द्वारा पूर्णता या जीवन में प्रवेश का अनुसरण नहीं करता है, बल्कि केवल शारीरिक शांति और आनंद का पीछा करता है, तो वह सभी लोगों से अधिक अंधा है। जो लोग जीवन की वास्तविकता का अनुसरण नहीं करते बल्कि केवल आने वाली दुनिया में अनन्त जीवन और इस दुनिया में सुरक्षा के लिए प्रयास करते हैं, वे सभी लोगों से अधिक अंधे हैं। इसलिए सब कुछ जो तू करता है, वह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।

परमेश्वर लोगों पर जो कार्य करता है, वह उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के आधार पर उनकी आपूर्ति करने के लिए है। जितनी बड़ी एक आदमी की जिन्दगी होती है, उसकी आवश्यकताएं उतनी ही ज्यादा होती हैं, और उतना ही ज्यादा वह अनुसरण करता है। यदि इस चरण में तेरे पास कोई लक्ष्य नहीं हैं, यह साबित करता है कि पवित्र आत्मा ने तुझे छोड़ दिया है। सभी जो जीवन की तलाश करते हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं त्यागे जाएंगे; ऐसे लोग हमेशा तलाश करते हैं, उनके दिल में हमेशा लालसा होती है। इस प्रकार के लोग चीज़ों की वर्तमान स्थिति से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। पवित्र आत्मा के कार्यों के प्रत्येक चरण का उदेश्य तुम में एक प्रभाव प्राप्त करना है, लेकिन यदि तुम आत्मसंतुष्टि विकसित कर लेते हो, यदि तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हो, तो वह तुम्हें छोड़ देगा। लोगों को हर दिन परमेश्वर की छानबीन की आवश्यकता होती है; उन्हें परमेश्वर से हर दिन भरपूर मात्रा में प्रावधान की आवश्यकता होती है। क्या लोग प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को खाए और पीए बिना रह सकते हैं? यदि कोई ऐसा हमेशा महसूस करता है कि वह परमेश्वर के वचनों को जितना भी खा-पी ले, यह कम ही रहेगा, यदि वह इसे हमेशा खोजता है, और हमेशा इसके लिए भूखा और प्यासा होता है, तो पवित्र आत्मा हमेशा उसमें कार्य करेगा। जितना ज्यादा कोई लालसा करता है, उतना ही ज्यादा व्यवहारिक चीजें सहभागिता से मिल सकती हैं। जितनी गहनता से कोई सत्य को खोजता है, उतनी ही तेजी से उसका जीवन बढ़ता है, जिससे वो अनुभव से भरपूर हो जाता है और परमेश्वर के भवन का समृद्ध बाशिंदा हो जाता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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