परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" | अंश 505

तुम आज परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और आज तुम उसके बारे में कितना जानते हो जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है? ये वे बातें हैं जो तुम्हें सीखनी चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर पहुँचा, तो जो कुछ उसने मनुष्य में किया और जो कुछ उसने मनुष्य को देखने की अनुमति दी, वह इसलिए था कि मनुष्य उससे प्रेम करे और सच्चाई के साथ उसे जाने। मनुष्य यदि परमेश्वर के लिए कष्ट सहने के योग्य है और वह यहाँ तक आ पाया है, यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है, और दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण है; इससे बढ़कर, यह न्याय और ताड़ना के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य पर डाले हैं। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, और परीक्षाओं के बिना हो, और यदि परमेश्वर ने तुम्हें कष्ट सहने नहीं दिया है, तो सच कहूँ तो तुम लोग परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम नहीं करते। मनुष्य में परमेश्वर का काम जितना बड़ा होता है, और जितने अधिक मनुष्य के कष्ट होते हैं, उतना ही अधिक यह इस बात को दिखा सकता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है, और उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम कर सकता है। तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षाओं के बिना, और यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम को प्राप्त कर सकते थे? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाले परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी त्रुटियों को जान पाता है, और देख लेता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निम्न है, और कि उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, अपने परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक है, और कभी-कभी तो असहनीय है—और यह कुचलने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के केवल अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया के साथ वह स्वयं को पूरी तरह से जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के तत्व को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, केवल ऐसे शोधन के द्वारा एक व्यक्ति अपनी कमियों को जान सकता है, और जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। अतः, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है। शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को सफल नहीं माना जा सकता। परमेश्वर ने शरीर में अनुग्रह के कार्य के एक चरण को पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य अपने अनुभवों में परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को सिद्ध बनाने में असमर्थ हैं, और उसे प्रकट करने में भी असमर्थ हैं जो मनुष्य में भ्रष्ट है, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, या उसके प्रेम और विश्वास को सिद्ध बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

मुश्किलों और परीक्षणों के ज़रिए ही तुम ईश्वर को सचमुच प्रेम कर सकते हो

आज तुम ईश्वर को कितना चाहते हो? तुम पर जो किया उसने, कितना जानते हो? इन चीज़ों को जानो। ईश्वर ने धरती पर आकर, इंसान पर जो कुछ किया, उसे जो कुछ दिखाया, इसलिए कि इंसान उसे प्रेम करे, उसे सचमुच जाने। ईश्वर के प्यार की वजह से, उसके उद्धार की वजह से ही, इंसान उसके लिए दुख उठा पाया, यहाँ तक आ पाया। इंसान पर ईश्वर के न्याय और ताड़ना के काम की वजह से भी, इंसान ऐसा कर पाया। अगर तुम उसके न्याय, परीक्षण, ताड़ना से रहित हो, अगर उसने कष्टों से नहीं गुज़ारा तुम्हें, तो सच में नहीं चाहते तुम ईश्वर को। इंसान के कष्ट और उसमें ईश-कार्य जितने अधिक होंगे, तो तुम ईश-कार्य की सार्थकता उतनी ही ज़्यादा जानोगे, इंसान ईश्वर से उतना ही ज़्यादा प्रेम करेगा। बिना शुद्धिकरण और परीक्षणों के ईश्वर से प्रेम करना कैसे सीखोगे? अगर ईश्वर दे इंसान को अनुग्रह, दया, प्रेम, तो क्या तुम ईश्वर को सच्चा प्रेम कर पाओगे?

एक तरफ ईश्वर के परीक्षणों से, इंसान अपनी कमियों को जाने; जाने कि वो कितना घृणित है, तुच्छ और नीच है, उसके पास कुछ नहीं, और वो कुछ नहीं है। दूसरी तरफ, जब ईश्वर ये इम्तहान लाए, वो इंसान के लिए परिवेश बनाए ताकि इंसान उसकी मनोहरता का अनुभव कर पाए।

भयंकर पीड़ा आए, कभी बर्दाश्त से बाहर हो जाए, इस हद तक कि इंसान को तोड़ दे, तो जाने इंसान उस पर कितना सुंदर ईश-कार्य हुआ है। इसी बुनियाद पर ईश्वर के लिए इंसान में सच्चा प्रेम जागे। अगर तुम उसके न्याय, परीक्षण, ताड़ना से रहित हो, अगर उसने कष्टों से नहीं गुज़ारा तुम्हें, तो सच में नहीं चाहते तुम ईश्वर को। इंसान के कष्ट और उसमें ईश-कार्य जितने अधिक होंगे, तो तुम ईश-कार्य की सार्थकता उतनी ही ज़्यादा जानोगे, इंसान ईश्वर से उतना ही ज़्यादा प्रेम करेगा। बिना शुद्धिकरण और परीक्षणों के ईश्वर से प्रेम करना कैसे सीखोगे? अगर ईश्वर दे इंसान को अनुग्रह, दया, प्रेम, तो क्या तुम ईश्वर को सच्चा प्रेम कर पाओगे?

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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