परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है" | अंश 494

परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम हृदय के भीतर की गहराई से आता है; यह एक ऐसा प्रेम है जो केवल मानव के परमेश्वर के ज्ञान के आधार पर ही मौजूद है। जब किसी का हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है तब उसके पास परमेश्वर के लिए प्रेम होता है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह प्रेम शुद्ध हो और जरूरी नहीं कि यह पूरा हो। यह इसलिए है कि अब भी एक व्यक्ति के हृदय का परमेश्वर की तरफ पूरी तरह से मुड़ जाने में और उस व्यक्ति में परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके लिए एक वास्तविक श्रद्धा होने के बीच एक कुछ दूरी होती है। जिस ढंग से इंसान परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम को प्राप्त करता है और परमेश्वर के स्वभाव को जानता है, यही अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ना है। जब इंसान अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर को देता है, उसके बाद, वो जीवन के अनुभव में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इस तरह से उसका स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, परमेश्वर के लिए उसका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इसलिए जीवन के अनुभव के सही मार्ग पर आने के लिए परमेश्वर की तरफ अपना हृदय मोड़ना ही एकमात्र ज़रूरी शर्त है। जब लोग परमेश्वर के सामने अपने हृदय को रख देते हैं, तो उनके पास केवल उसके लिए लालायित हृदय होता है परन्तु उसके लिए प्रेम का नहीं होता, क्योंकि उनके पास उसकी समझ नहीं होती है। हालांकि इस परिस्थिति में उनके पास उसके लिए कुछ प्रेम है, लेकिन यह स्वाभाविक और सच्चा नहीं है। यह इसलिए है कि मनुष्य की देह से आने वाली कोई भी चीज भावना की उत्पाद है और वास्तविक समझ से नहीं आती है। यह सिर्फ एक क्षणिक आवेग है और यह लंबे समय तक चलने वाली श्रद्धा नहीं बन सकती है। जब लोगों में परमेश्वर की समझ नहीं होती है, तो वे केवल अपनी पसंद और अपनी व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर उससे प्रेम कर सकते हैं; उस प्रकार के प्रेम को स्वाभाविक प्रेम नहीं कहा जा सकता है, न ही उसे विशुद्ध प्रेम कहा जा सकता है। किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है, और वो सब कुछ में परमेश्वर के हितों के बारे में सोचने में सक्षम हो सकता है, लेकिन अगर उसे परमेश्वर की कोई समझ नहीं है तो वो सच्चा स्वाभाविक प्रेम करने में सक्षम नहीं होता है। वो बस सक्षम होता है कलीसिया के लिए कुछ कार्य को पूरा करने में और अपने कर्तव्य का थोड़ा पालन करने में, लेकिन वह यह आधार के बिना करेगा। उस तरह के व्यक्ति का एक स्वभाव बदलना मुश्किल है; ऐसे लोग या तो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, या उसे समझते नहीं हैं। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति पूरी तरह से अपने हृदय को परमेश्वर की तरफ मोड़ भी लेता है तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि उसका परमेश्वर से प्रेम का हृदय पूरी तरह से शुद्ध है, क्योंकि जिन लोगों के पास हृदय में परमेश्वर है, ज़रूरी नहीं है कि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम हो। इसका संबंध परमेश्वर की समझ का अनुसरण करने वालों और न करने वालों के अंतर से है। एक बार किसी व्यक्ति को उसके बारे में समझ मिल जाती है, तो यह दर्शाता है कि उसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मुड़ गया है, इससे पता चलता है कि उसके हृदय में परमेश्वर के लिए उसका विशुद्ध प्रेम स्वाभाविक है। केवल इस तरह के व्यक्ति के हृदय में परमेश्वर है। परमेश्वर के प्रति अपना हृदय मोड़ना, सही मार्ग पर जाने के लिए, परमेश्वर को समझने के लिए और परमेश्वर के प्रति प्रेम को प्राप्त करने के लिए एक ज़रूरी शर्त है। यह परमेश्वर से प्रेम करने के अपने कर्तव्य को पूरा करने का एक चिह्नक नहीं है, न ही यह उसके लिए वास्तविक प्रेम रखने का एक चिह्नक है। किसी के लिए परमेश्वर के प्रति विशुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है उसकी तरफ अपने हृदय को मोड़ना, जो कि पहली चीज़ भी है जो एक व्यक्ति को उसकी रचना होने के नाते करनी चाहिए। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं वे सभी लोग वे हैं जो जीवन की खोज करते हैं, अर्थात्, जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं और जो लोग वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं; उन सभी को पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त हुई है और उसके द्वारा प्रेरित किये गए हैं। वे सब परमेश्वर द्वारा मार्गदर्शन पाने में सक्षम हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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