परमेश्वर के दैनिक वचन | "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" | अंश 480

कुछ लोग कहते हैं, "पौलुस ने अत्यधिक मात्रा में काम किया था, और उसने कलीसियाओं के लिए बड़े बोझ को अपने कंधों पर उठाया था और उनके लिए इतना अधिक योगदान दिया था। पौलुस की तेरह पत्रियों ने दो हज़ार वर्षों के अनुग्रह के युग को बनाए रखा था, और वे मात्र चारों सुसमाचारों के बाद दूसरे नम्बर पर आते हैं। कौन उसके साथ तुलना कर सकता है? कोई भी यूहन्ना के प्रकाशित वाक्य के गूढ़ अर्थ को समझ नहीं सकता है, जबकि पौलुस की पत्रियां जीवन प्रदान करती हैं, और वह कार्य जो उसने किया था वह कलीसियाओं के हित के लिए था। और कौन ऐसी चीज़ों को हासिल कर सकता था? और पतरस ने क्या काम किया था?" जब मनुष्य अन्य लोगों को मापता है, तो यह उनके योगदान के अनुसार होता है। जब परमेश्वर मनुष्य को मापता है, तो यह मनुष्य के स्वभाव के अनुसार होता है। उन लोगों के मध्य जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो अपने स्वयं के सार को नहीं जानता था, जो परमेश्वर के विरूद्ध था। और इस प्रकार, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से होकर गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस अलग था। वह परमेश्वर के एक जीव के रूप में अपनी अपूर्णताओं, कमज़ोरियों, एवं अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानता था, और इस प्रकार उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था कि उसके माध्यम से अपने स्वभाव को बदल दे; वह उन में से एक नहीं था जिसके पास केवल सिद्धान्त ही था किन्तु जो कोई वास्तविकता धारण नहीं करता था। ऐसे लोग जो परिवर्तित होते हैं वे नए लोग हैं जिन्हें बचाया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने के योग्य थे। ऐसे लोग जो नहीं बदलते हैं वे उनसे सम्बन्धित हैं जो स्वभाविक रूप से गुज़रे ज़माने की बेकार चीज़ें हैं; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनसे परमेश्वर के द्वारा घृणा की गई है और जिन्हें ठुकरा दिया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनका कार्य कितना महान है क्योंकि परमेश्वर के द्वारा उनका स्मरणोत्सव नहीं मनाया जाएगा। जब तू इसकी तुलना अपने स्वयं के अनुसरण से करता है, तो तू अन्ततः पतरस या पौलुस के समान उसी किस्म का व्यक्ति है या नहीं यह स्वतः ही प्रमाणित होना चाहिए। यदि जो कुछ तू खोजता है उसमें अभी भी कोई सच्चाई नहीं है, और यदि तू आज भी पौलुस के समान अभिमानी एवं गुस्ताख है, और अभी भी उसके समान चतुराई से बोलते हुए स्वयं की ख्याति को बढ़ाने वाला व्यक्ति है, तो तू बिना किसी सन्देह के एक पतित व्यक्ति है जो असफल हो जाता है। यदि तू पतरस के समान ही कोशिश करता है, यदि तू अभ्यास एवं सच्चे बदलावों की कोशिश करता है, और अभिमानी या हठी नहीं है, किन्तु अपने कर्तव्य को निभाने का प्रयास करता है, तो तू परमेश्वर के ऐसा प्राणी होगा जो विजय हासिल कर सकता है। पौलुस अपने स्वयं के सार एवं भ्रष्टता को नहीं जानता था, और वह अपने स्वयं की अनाज्ञाकारिता को तो बिलकुल भी नहीं जानता था। उसने कभी मसीह के विषय में अपनी निन्दनीय अवज्ञा का उल्लेख नहीं किया था, न ही वह बहुत अधिक खेदपूर्ण था। उसने केवल एक संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत की थी, और, अपने हृदय की गहराई में, वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नहीं था। हालाँकि वह दमिश्क के मार्ग में गिर गया था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झांक कर नहीं देखा था। वह महज लगातार काम करके संतुष्ट था, और उसने अपने आप को जानने और अपने पुराने स्वभाव को बदलने को महत्वपूर्ण विषय नहीं माना था। वह महज सत्य बोल कर, एवं अपने स्वयं के विवेक के एक दास के रूप में दूसरों की आपूर्ति कर, और अपने बीते पापों के लिए स्वयं को सांत्वना देने और स्वयं को माफ करने के लिए आगे से यीशु के चेलों को न सता कर संतुष्ट था। वह लक्ष्य जिसका उसने अनुसरण किया था वह भविष्य के मुकुट एवं क्षणिक कार्य से अधिक और कुछ नहीं था, वह लक्ष्य जिसका उसने अनुसरण किया था वह प्रचुर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सच्चाई की कोशिश नहीं की थी, न ही उसने यह कोशिश की थी कि उस सत्य की और अधिक गहराई में प्रगति करे जिसे उसने पहले नहीं समझा था। और इस प्रकार स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठा कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना एवं न्याय को स्वीकार नहीं किया था। यह कि वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने खुद के स्वभाव या सार के ज्ञान को धारण किया था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यास पर था। इसके अतिरिक्त, जिसके लिए उसने कठिन परिश्रम किया था वह नहीं बदला था, बल्कि ज्ञान बदला था। उसका कार्य पूरी तरह से दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटीकरण का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का दृढ़ निश्चय किया था, न ही यह ऐसा कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव के काँट छाँट को स्वीकार करने के बाद घटित हुआ था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने किस प्रकार कार्य किया था, क्योंकि उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इस प्रकार उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया था परन्तु मात्र उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका निभाई थी। क्योंकि ऐसा ही कोई व्यक्ति, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य है, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक विहीन था—वह उन लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था जिन्हें प्रभु यीशु के द्वारा स्वीकार किया गया था। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यीशु मसीह के लिए प्रेम एवं आदर से भरा हुआ था, न ही वह ऐसा व्यक्ति था जो सत्य की खोज करने में कुशल था, और वह ऐसा व्यक्ति तो बिलकुल भी नहीं था जो देहधारण के रहस्य की खोज करता था। वह महज ऐसा व्यक्ति था जो मिथ्या वाद-विवाद में कुशल था, और जो किसी ऐसे व्यक्ति से राजी नहीं होता था जो उससे अधिक ऊँचे होते थे या जो सत्य को धारण किए हुए थे। वह ऐसे लोगों या सच्चाइयों से ईर्ष्या करता था जो उसके विपरीत होती थीं, या उसके प्रति शत्रुता में होती थीं, वह उन प्रतिभावान लोगों को प्राथमिकता देता था जो शानदार छवि को प्रस्तुत करते थे और गंभीर ज्ञान धारण करते थे। वह गरीब लोगों से परस्पर बातचीत करना पसंद नहीं करता था जो सही राह की खोज करते थे तथा किसी और चीज़ की नहीं सिर्फ सत्य की परवाह करते थे, और इसके बजाय धार्मिक संगठनों के वरिष्ठ सुप्रसिद्ध व्यक्तियों से सम्बन्ध रखते थे जो केवल सिद्धान्तों की ही बात करते थे, और जो प्रचुर ज्ञान धारण किए हुए थे। उसके पास पवित्र आत्मा के नए कार्य का कोई प्रेम नहीं था, और उसने पवित्र आत्मा के नए कार्य की गतिशीलता की परवाह नहीं की थी। इसके बजाय, उसने उन रीति विधियों एवं सिद्धान्तों की तरफदारी की थी जो सामान्य सच्चाइयों से कहीं ऊँचे थे। अपने सहज सार और उसकी सम्पूर्णता में जिसकी उसने खोज की थी, वह इस योग्य नहीं है कि उसे एक मसीही कहा जाए जो सत्य का अनुसरण करता है, और वह परमेश्वर के घराने में एक वफादार सेवक तो बिलकुल भी नहीं था, क्योंकि उसका पाखंड बहुत अधिक था, और उसकी अनाज्ञाकारिता बहुत ही बड़ी थी। हालाँकि वह प्रभु यीशु के एक सेवक के रूप में जाना जाता है, फिर भी वह स्वर्ग के राज्य के फाटक में प्रवेश करने लायक बिलकुल भी नहीं था, क्योंकि शुरूआत से लेकर अन्त तक उसके कार्य को धार्मिकता नहीं कहा जा सकता है। उसे महज किसी ऐसे मनुष्य के रूप में देखा जाता है जो पांखडी था, और जिसने अधर्म किया था, फिर भी जिसने मसीह के लिए भी कार्य किया था। हालाँकि उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकता है, फिर भी उसे उचित रीति से ऐसा मनुष्य कहा जा सकता है जिसने अधर्म किया था। उसने काफी कार्य किया था, फिर भी उसका न्याय उसके कार्य की मात्रा के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए जिसे उसने किया था, किन्तु केवल उसकी गुणवत्ता एवं सार के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल इसी रीति से इस मामले की तह तक पहुंचना संभव है। वह हमेशा मानता था: मैं कार्य करने में सक्षम हूँ, मैं अधिकांश लोगों से बेहतर हूँ; मैं प्रभु के बोझ को अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक समझता हूँ, और जैसा मैं गहराई से पश्चाताप करता हूँ वैसा कोई नहीं करता है, क्योंकि मुझ पर बड़ी ज्योति चमकी थी, और मैंने बड़ी ज्योति देखी है, और इस प्रकार मेरा पश्चाताप किसी अन्य की अपेक्षा अधिक गहरा है। उस समय, यह वह चीज़ है जो उसने अपने हृदय में सोचा था। अपने कार्य के अन्त में, पौलुस ने कहा: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, और मेरे लिए धर्म का मुकुट रखा हुआ है।" उसकी कुश्ती, कार्य और दौड़ पूरी तरह से धार्मिकता के मुकुट के लिए था, और वह सक्रिय रूप से आगे नहीं बढ़ा था; हालाँकि वह अपने कार्य में लापरवाह नहीं था, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उसका कार्य महज उसकी ग़लतियों की भरपाई करने के लिए, और उसके विवेक के आरोपों की भरपाई करने के लिए था। उसने केवल अपने कार्य को पूरा करने, अपनी दौड़ को समाप्त करने, और जितना जल्दी हो सके अपनी लड़ाई को लड़ने की आशा की थी, ताकि वह बहुत जल्द ही अपने बहुप्रतीक्षित धार्मिकता के मुकुट को प्राप्त कर सके। जिस चीज़ की वह लालसा करता था वह अपने अनुभवों एवं सच्चे ज्ञान के साथ प्रभु यीशु से मुलाकात करना नहीं था, बल्कि जितना जल्दी हो सके अपने कार्य को समाप्त करना था, जिससे वह उन प्रतिफलों को प्राप्त कर सके जिन्हें उसके कार्य ने उसके लिए अर्जित किया था जब वह प्रभु यीशु से मिला था। उसने स्वयं को राहत देने के लिए, एवं भविष्य के मुकुट के बदले में एक सौदा करने के लिए अपने कार्य का उपयोग किया था। जिस चीज़ की उसने खोज की थी वह सत्य या परमेश्वर नहीं था, परन्तु केवल मुकुट ही था। ऐसा अनुसरण किस प्रकार मानक स्तर का हो सकता है? उसकी प्रेरणा, कार्य, वह मूल्य जो उसने चुकाया, और उसकी समस्त कोशिशें—उसकी अद्भुत कल्पनाएं उन सब में व्याप्त थीं, और उसने अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुसार पूरी तरह से कार्य किया था। उसके कार्य की सम्पूर्णता में, उस कीमत में ज़रा सी भी स्वेच्छा नहीं थी जो उसने चुकाई थी; वह महज किसी सौदे में संलग्न हो रहा था। उसके प्रयास उसके कर्तव्य को निभाने के लिए स्वेच्छा से नहीं किए गए थे, परन्तु सौदे के उद्देश्य को हासिल करने के लिए इच्छापूर्वक किए गए थे। क्या ऐसे प्रयासों का कोई औचित्य है? कौन ऐसे अशुद्ध प्रयासों की प्रशंसा करेगा? किसके पास ऐसे प्रयासों में रुचि है? उसका कार्य भविष्य के स्वप्नों से भरा हुआ था, अद्भुत योजनाओं से भरा हुआ था, और किसी ऐसे पथ को शामिल नहीं करता था जिसके द्वारा मानव के स्वभाव को बदला जाए। उसका इतना अधिक परोपकार एक ढोंग था; उसका कार्य जीवन प्रदान नहीं करता था, परन्तु सभ्यता का झूठा दिखावा था; यह एक सौदा करना था। ऐसा कार्य किस प्रकार अपने मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति के पथ पर मनुष्य की अगुवाई कर सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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