परमेश्वर के दैनिक वचन | "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" | अंश 476

पतरस ऐसा मनुष्य था जिसे सिद्ध किया गया था। केवल न्याय एवं ताड़ना का अनुभव करने, और इस प्रकार परमेश्वर के शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के बाद ही, उसे पूर्ण रूप से सिद्ध बनाया गया था; वह पथ जिस पर वह चलता था वह सिद्ध किए जाने का पथ था। कहने का तात्पर्य है कि, बिलकुल शुरूआत से ही, वह पथ जिस पर पतरस चलता था वह सही पथ था, और परमेश्वर में विश्वास करने की उसकी प्रेरणा सही थी, और इस प्रकार वह ऐसा इंसान बन गया जिसे सिद्ध बनाया गया था। उसने एक नए पथ पर कदम रखा था जिस पर मनुष्य पहले कभी नहीं चला था, जबकि वह पथ जिस पर पौलुस शुरुआत के समय से ही चला था वह मसीह के विरोध का पथ था, और यह सिर्फ इसलिए था क्योंकि पवित्र आत्मा उसे उपयोग करना चाहता था, और अपने कार्य के लिए उसके सभी वरदानों एवं उसके सभी गुणों का लाभ उठाना चाहता था, इसलिए उसने कई दशकों तक मसीह के लिए कार्य किया था। वह महज ऐसा व्यक्ति था जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था, और उसे इसलिए उपयोग नहीं किया गया था क्योंकि यीशु ने कृपापूर्वक उसकी मानवता पर दृष्टि डाली थी, किन्तु उसके वरदानों के कारण उसे उपयोग किया था। वह प्रभु के लिए कार्य करने में समर्थ था क्योंकि उसे मारकर नीचे गिराया गया था, इसलिए नहीं क्योंकि वह ऐसा करने हेतु प्रसन्न था। वह पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन एवं मार्गदर्शन के कारण ऐसा कार्य करने में समर्थ था, और वह कार्य जिसे उसने किया था वह किसी भी मायने में उसके अनुसरण, या उसकी मानवता को नहीं दर्शाता है। पौलुस का कार्य एक सेवक के कार्य को दर्शाता है, कहने का तात्पर्य है कि उसने एक प्रेरित का कार्य किया था। हालाँकि पतरस अलग था: उसने भी कुछ कार्य किया था, फिर भी यह पौलुस के कार्य के समान महान नहीं था; उसने अपने स्वयं के प्रवेश के अनुसरण (उद्यम) के मध्य कार्य किया था, और उसका कार्य पौलुस के कार्य से भिन्न था। पतरस का कार्य परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित के किरदार होकर में कार्य नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रेम के उसके अनुसरण के पथक्रम के दौरान कार्य किया था। पौलुस के कार्य के पथक्रम में उसका व्यक्तिगत अनुसरण भी शामिल थाः उसका अनुसरण भविष्य के लिए उसकी आशाओं, और एक अच्छी नियति के लिए उसकी इच्छा से बढ़कर और किसी चीज़ के लिए नहीं था। उसने अपने कार्य के दौरान शुद्धीकरण को स्वीकार नहीं किया था, और न ही उसने काँट-छाँट एवं व्यवहार को स्वीकार किया था। उसका मानना था कि जब तक वह कार्य जिसे उसने किया था वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करता था, और वह सब जिसे उसने किया था वह परमेश्वर को प्रसन्न करता था, तब तक अन्ततः एक प्रतिफल उसकी प्रतीक्षा में था। उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे—यह सब उसके स्वयं के लिए था, और उसे परिवर्तन के अनुसरण (खोज) के मध्य सम्पन्न नहीं किया गया था। उसके कार्य में हर एक चीज़ एक सौदा था, यह परमेश्वर के प्राणी के किसी भी कर्तव्य या समर्पण को शामिल नहीं करता था। अपने कार्य के पथक्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य महज दूसरों की सेवा के लिए था, और उसके स्वभाव में बदलावों को लाने में असमर्थ था। पौलुस ने सिद्ध बनाए जाने या व्यवहार किए जाने के बगैर ही सीधे तौर पर अपने कार्य को सम्पन्न किया था, और उसे प्रतिफल के द्वारा प्रेरित किया गया था। पतरस अलग था: वह ऐसा व्यक्ति था जो काँट-छाँट से होकर गुज़रा था, और व्यवहार एवं शुद्धीकरण से होकर गुज़रा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य एवं प्रेरणा मूलभूत रुप से पौलुस से अलग थे। हालाँकि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, फिर भी उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुज़रा था, और जिसकी उसने खोज की वह सत्य, एवं वास्तविक बदलाव था। उसके कार्य को सिर्फ काम के लिहाज से ही सम्पन्न नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, फिर भी वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और हालाँकि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, फिर भी उसने इसका अनुभव नहीं किया था। यह कि पतरस ने बहुत कम कार्य किया था जो केवल इसलिए था क्योंकि पवित्र आत्मा ने उसके माध्यम से अत्यधिक कार्य नहीं किया था। उनके कार्य की मात्रा यह निर्धारित नहीं करती थी कि उन्हें सिद्ध किया गया था या नहीं; एक का अनुसरण (निरन्तर खोज) ईनामों को प्राप्त करने के लिए था, और दूसरे का परमेश्वर के चरम प्रेम को हासिल करने के लिए, और परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए था, उस हद तक कि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए एक सुन्दर प्रतिबिम्ब को जी सकता था। बाहरी रूप से वे अलग थे, और उनके सार भी अलग थे। इस आधार पर कि उन्होंने कितना अधिक कार्य किया था तू यह निर्धारित नहीं कर सकता है कि उनमें से किसे सिद्ध बनाया गया था। पतरस ने ऐसे व्यक्ति के प्रतिबिम्ब को जीने का प्रयास किया जो परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जो परमेश्वर की आज्ञा मानता था, ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जिसने व्यवहार एवं काँट-छाँट को स्वीकार किया था, और ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास किया जिसने परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाया था। वह परमेश्वर के प्रति स्वयं को समर्पित करने, स्वयं की सम्पूर्णता को परमेश्वर के हाथों में रखने, और मृत्यु तक आज्ञा मानने में सक्षम था। यह वह था जिसे उसने करने का दृढ़ निश्चय किया था, इसके अतिरिक्त, यह वह था जिसे उसने हासिल किया था। यह वह मूलभूत कारण है कि क्यों उसका अन्त पौलुस से भिन्न था। वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा ने पतरस में किया था वह उसे सिद्ध बनाने के लिए था, और वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा ने पौलुस में किया था वह उसे उपयोग करने के लिए था। यह इसलिए था क्योंकि अनुसरण के प्रति उनके स्वभाव एवं उनके दृष्टिकोण एक समान नहीं थे। दोनों के पास पवित्र आत्मा का कार्य था। पतरस ने इस कार्य को स्वयं पर लागू किया था, और साथ ही इसे दूसरों को भी प्रदान किया था; इस बीच पौलुस ने केवल पवित्र आत्मा के कार्य की सम्पूर्णता को ही दूसरों को प्रदान किया था, और स्वयं इससे कुछ भी अर्जित नहीं किया था। इस रीति से, उसने इतने वर्षों तक पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव किया उसके पश्चात्, पौलुस में हुए बदलाव अस्तित्वहीन होने के करीब थे। वह अब भी लगभग अपनी स्वाभाविक दशा में ही था, और अब भी पहले का ही पौलुस था। यह महज ऐसा है कि अनेक वर्षों के क्लेश को सहने के बाद, उसने सीखा था कि कैसे काम करें, और सहनशीलता सीखी थी, किन्तु उसका पुराना स्वभाव—उसका अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक एवं धन लोलुपता का स्वभाव—अभी भी बना हुआ था। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपने भ्रष्ट स्वभाव को नहीं जान पाया था, न ही वह अपने पुराने स्वभाव से स्वयं को छुड़ा पाया था, और यह अभी भी उसके कार्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसमें महज कार्य का अधिक अनुभव था, लेकिन सिर्फ ऐसा छोटा सा अनुभव उसे बदलने में असमर्थ था, और उसके अनुसरण के अस्तित्व एवं महत्व के विषय उसके दृष्टिकोण को पलट नहीं सकता था। हालाँकि उसने मसीह के लिए कई सालों तक कार्य किया था, और फिर कभी यीशु मसीह को सताया नहीं था, फिर भी उसके हृदय में परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। जिसका अर्थ यह है कि उसने स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए कार्य नहीं किया था, किन्तु इसके बजाय भविष्य की अपनी नियति के लिए कार्य करने हेतु बाध्य हुआ था। क्योंकि, शुरूआत में, उसने मसीह को सताया था, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं हुआ था; वह स्वाभाविक रूप से एक विद्रोही था जो जानबूझकर मसीह का विरोध करता था, और ऐसा व्यक्ति था जिसके पास पवित्र आत्मा के कार्य का कोई ज्ञान नहीं था। अपने कार्य के समापन पर, वह अब भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानता था, और पवित्र आत्मा की इच्छा पर जरा सा भी ध्यान न देते हुए मात्र अपने स्वभाव के अनुरूप अपनी इच्छानुसार काम करता था। और इस प्रकार उसका स्वभाव मसीह का बैरी था और उसने सत्य का पालन नहीं किया था। इसके समान कोई व्यक्ति, जिसे पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा छोड़ दिया गया था, जो पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानता था, और जिसने मसीह का विरोध भी किया था—ऐसे व्यक्ति का उद्धार कैसे किया जा सकता था? मनुष्य का उद्धार किया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर नहीं होता है कि उसने कितना अधिक कार्य किया है, या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इस बात से निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अमल में ला सकता है या नहीं, अनुसरण (निरन्तर खोज) के प्रति उसके दृष्टिकोण सत्य की अनुरूपता में हैं या नहीं।

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