परमेश्वर के दैनिक वचन | "कार्य और प्रवेश (2)" | अंश 457

कार्य के संबंध में, मनुष्य का विश्वास है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना ही कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किंतु यह अत्यधिक एकतरफा है; परमेश्वर इंसान से जो माँगता है, वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर दौड़ना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और पोषण अधिक है। कई भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पित कार्य परमेश्वर द्वारा की गई माँग के साथ असंगत है। इसलिए, मनुष्य को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और ठीक इसी कारण से मनुष्य का प्रवेश भी काफ़ी एकतरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करने से अपने प्रवेश की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि तुम लोग अनुभव के हर पहलू से बेहतर ढंग से गुज़र सको। यही है वह, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और साथ ही मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और इसे सभी लोगों को समझना चाहिए। कोई कह सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और कि तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। इन लोगों ने, जो कई वर्षों से परमेश्वर की सेवा और मनुष्य की सेवकाई कर रहे हैं, कार्य करने और उपदेश देने को ही प्रवेश मान लिया है, और किसी ने भी अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव को महत्वपूर्ण प्रवेश के रूप में नहीं लिया है। इसके बजाय, उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त प्रबुद्धता को दूसरों को सिखाने के लिए पूँजी के रूप में लिया है। उपदेश देते समय उन पर बहुत जिम्मेदारी होती है और वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हैं, और इसके माध्यम से वे पवित्र आत्मा की वाणी निकालते हैं। उस समय, जो लोग कार्य करते हैं, वे आत्मतुष्टि से भर जाते हैं, मानो पवित्र आत्मा का कार्य उनका व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन गया हो; उन्हें लगता है कि उनके द्वारा बोले गए सभी वचन उनके स्वयं के हैं, लेकिन फिर मानो उनका स्वयं का अनुभव उतना स्पष्ट नहीं होता, जितना उन्होंने वर्णन किया होता है। और तो और, बोलने से पहले उन्हें आभास भी नहीं होता कि क्या बोलना है, किंतु जब पवित्र आत्मा उनमें कार्य करता है, तो उनके वचन अनवरत रूप से धाराप्रवाह बह निकलते हैं। एक बार जब तुम इस तरह उपदेश दे लेते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद उतना छोटा नहीं है, जितना तुम मानते थे, और उस स्थिति में, जब पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कई बार कार्य कर लेता है, तुम यह निश्चित कर लेते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही आध्यात्मिक कद है और ग़लती से यह मान लेते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा स्वयं का प्रवेश और तुम्हारा स्वयं का अस्तित्व है। जब तुम लगातार इस तरह अनुभव करते हो, तो तुम अपने स्वयं के प्रवेश के बारे में सुस्त हो जाते हो, अनजाने ही आलस्य में फिसल जाते हो, और अपने स्वयं के प्रवेश को महत्व देना बंद कर देते हो। इसलिए, दूसरों की सेवकाई करते समय तुम्हें अपने आध्यात्मिक कद और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करना चाहिए। यह तुम्हारे प्रवेश को बेहतर तरीके से सुगम बना सकता है और तुम्हारे अनुभव को लाभ पहुँचा सकता है। जब मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य को अपना व्यक्तिगत अनुभव मान लेता है, तो यह भ्रष्टता का स्रोत बन जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, तुम लोग जो भी कर्तव्य करो, तुम लोगों को अपने प्रवेश को एक महत्वपूर्ण सबक समझना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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