परमेश्वर के दैनिक वचन | "सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में" | अंश 451

वर्तमान धारा में उन सभी के पास, जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर है। चाहे वे युवा हों या वृद्ध, जब तक वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और श्रद्धा रखते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके भिन्न-भिन्न कार्यों के अनुसार पूर्ण करता है। जब तक तुम अपनी पूरी शक्ति लगाते हो और परमेश्वर के कार्य के लिए प्रस्तुत रहते हो, तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो। वर्तमान में तुम लोगों में से कोई भी पूर्ण नहीं है। कभी तुम एक प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हो, और कभी तुम दो कार्य कर सकते हो। जब तक तुम अपने आपको परमेश्वर के लिए खपाने की पूरी कोशिश करते हो, तब तक तुम अंतत: परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे।

युवा लोगों के पास कम जीवन-दर्शन हैं, और उनमें बुद्धि और अंतर्दृष्टि की कमी है। परमेश्वर मनुष्य की बुद्धि और अंतर्दृष्टि को पूर्ण करने के लिए आता है। उसका वचन उनकी कमियाँ पूरी करता है। फिर भी, युवा लोगों का स्वभाव चंचल होता है, और उसे परमेश्वर द्वारा रूपांतरित किया जाना आवश्यक है। युवा लोगों में धार्मिक विचार और जीवन-दर्शन कम होते हैं; वे हर चीज़ के बारे में सरल ढंग से सोचते हैं, और उनके विचार जटिल नहीं होते। यह उनकी मनुष्यता का अंग है, जिसने अभी तक आकार नहीं लिया है, और यह एक सराहनीय अंग है; किंतु युवा लोग अबोध हैं और उनमें विवेक की कमी है। यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की आवश्यकता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने से तुम लोग विवेक विकसित करने में सक्षम होगे। तुम अनेक आध्यात्मिक चीज़ें स्पष्ट रूप से समझने में सक्षम होगे, और धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाओगे, जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए उपयुक्त हो। वृद्ध भाई-बहनों के पास भी करने के लिए अपने काम हैं, और परमेश्वर ने उन्हें त्यागा नहीं है। वृद्ध भाई-बहनों में भी वांछनीय और अवांछनीय दोनों पहलू हैं। उनके पास अधिक जीवन-दर्शन और अधिक धार्मिक विचार होते हैं। अपने कार्यों में वे कई कठोर परंपराओं का पालन करते हैं, वे नियमों के शौकीन होते हैं जिन्हें वे यंत्रवत् और लचीलेपन के बिना लागू करते हैं। यह एक अवांछनीय पहलू है। किंतु ये वृद्ध भाई और बहन हर परिस्थिति में शांत और दृढ़ बने रहते हैं; उनके स्वभाव स्थिर होते हैं, और वे अप्रत्याशित और अस्थिर मनोदशाओं वाले नहीं होते। वे चीज़ों को स्वीकार करने में धीमे हो सकते हैं, पर यह कोई बड़ा दोष नहीं है। जब तक तुम लोग समर्पित हो सकते हो; जब तक तुम परमेश्वर के वर्तमान वचनों को स्वीकार कर सकते हो और उनकी छानबीन नहीं करते; जब तक तुम केवल समर्पण और अनुसरण से ताल्लुक रखते हो, और परमेश्वर के वचनों पर कभी कोई निर्णय नहीं देते या उनके बारे में कोई अन्य बुरे विचार नहीं रखते; जब तक तुम उसके वचनों को स्वीकार करते हो और उन्हें अभ्यास में लाते हो—तब तक, ये शर्तें पूरी करने पर तुम पूर्ण किए जा सकते हो।

तुम युवा भाई-बहन हो या वृद्ध, तुम जानते हो कि तुम्हें क्या कार्य करना है। जो अपनी युवावस्था में हैं, वे अभिमानी नहीं हैं; जो वृद्ध हैं, वे निष्क्रिय नहीं हैं और न ही वे पीछे हटते हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे के सामर्थ्य का उपयोग करने में सक्षम हैं, और वे बिना किसी पूर्वाग्रह के एक-दूसरे की सेवा कर सकते हैं। युवा और वृद्ध भाई-बहनों के बीच मित्रता का एक पुल बन गया है, और परमेश्वर के प्रेम के कारण तुम लोग एक-दूसरे को बेहतर समझने में सक्षम हो। युवा भाई-बहन वृद्ध भाई-बहनों को हेय दृष्टि से नहीं देखते, और वृद्ध भाई-बहन दंभी नहीं हैं : क्या यह एक सामंजस्यपूर्ण साझेदारी नहीं है? यदि तुम सभी का यही संकल्प हो, तो तुम लोगों की पीढ़ी में परमेश्वर की इच्छा निश्चित रूप से पूरी होगी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

जो करें परमेश्वर से प्रेम, उनके पास अवसर है पूर्ण बनाए जाने का।

इंसान को उसके काम के अनुसार पूर्ण बनाता ईश्वर। अगर तुम अपनी शक्ति का पूरा इस्तेमाल करो, ईश्वर-कार्य के आज्ञाकारी हो जाओ, तो तुम्हें पूर्ण बनाएगा ईश्वर। तुम लोगों में से कोई पूर्ण नहीं है अभी। तुम एक काम करो या दो, ईश्वर के लिए पूरी शक्ति लगाओ, खुद को खपाओ, अंत में पूर्ण बनाएगा तुम्हें ईश्वर। बूढ़ा हो या जवान, जो भी सच्चा प्रेम करे ईश्वर से, अवसर है उसके पास पूर्ण बनाए जाने का। दिल में आज्ञाकारी रहो ईश्वर के प्रति, श्रद्धा भी रखो उसके प्रति, अंत में पूर्ण बनाएगा तुम्हें ईश्वर।

कलीसिया में तुम छोटे हो या बड़े, तुम जानते हो जो काम तुम्हें करना चाहिए। जो युवा हैं वे अभिमानी नहीं, बूढ़े निष्क्रिय नहीं, वो पीछे हटते नहीं। बिना पूर्वाग्रह के, सेवा करते एक-दूजे की, सुधारने खुद को सीखते परस्पर। इस तरह बनता दोस्ती का पुल। ईश्वर-प्रेम से समझते एक-दूजे को तुम लोग। कलीसिया के भाई-बहनों के बीच, युवा देखते नहीं नीची नज़र से बड़ों को, बड़े बर्ताव नहीं करते अभिमान से। क्या नहीं है ये समरसतापूर्ण भागीदारी? बूढ़ा हो या जवान, जो भी सच्चा प्रेम करे ईश्वर से, अवसर है उसके पास पूर्ण बनाए जाने का। दिल में आज्ञाकारी रहो ईश्वर के प्रति, श्रद्धा भी रखो उसके प्रति, अंत में पूर्ण बनाएगा तुम्हें ईश्वर। ये संकल्प होगा तुम लोगों में अगर, तो ईश-इच्छा रहेगी पूरी होकर। तुम लोगों की पीढ़ी में ही रहेगी पूरी होकर।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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