परमेश्वर के दैनिक वचन | "अनुभव पर" | अंश 450

अगर तुम्हें परमेश्वर के काम का ज्ञान नहीं है, तो तुम्हें यह नहीं पता होगा कि परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करना है। अगर तुम परमेश्वर के काम के सिद्धांतों को नहीं जानते और इस बात से अनजान हो कि शैतान मनुष्य पर कैसे काम करता है, तो तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। मात्र उत्साह भरा अनुसरण तुम्हें वे परिणाम नहीं पाने देगा, जिनकी माँग परमेश्वर करता है। अनुभव करने का यह तरीका लॉरेंस के तरीके के समान है : किसी तरह का कोई फर्क न करना और केवल अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना, इन बातों से पूरी तरह से अनजान रहना कि शैतान का क्या काम है, पवित्र आत्मा का क्या काम है, परमेश्वर की उपस्थिति के बिना मनुष्य किस स्थिति में होता है, और किस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाना चाहता है। विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हुए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए, वर्तमान में परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें, परमेश्वर के स्वभाव को कैसे जानें, और परमेश्वर की दया, उसकी महिमा और धार्मिकता किन लोगों, परिस्थितियों और युग पर निर्देशित की जाती हैं—वह इनमें से किसी में अंतर नहीं करता। अगर लोगों के पास अपने अनुभवों के लिए नींव के रूप में अनेक दर्शन नहीं हैं, तो जीवन नामुमकिन है, और अनुभव उससे भी ज्यादा नामुमकिन; वे मूर्खतापूर्ण ढंग से किसी के भी प्रति समर्पित होते रहते हैं और सब-कुछ सहते रहते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाया जाना बहुत मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि अगर तुम्हारे पास उपर्युक्त में से कोई दर्शन नहीं है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि तुम महामूर्ख हो, नमक के खंभे के समान, जो हमेशा इजराइल में खड़ा रहता है। ऐसे लोग बेकार और निकम्मे हैं! कुछ लोग केवल आँख मूँदकर समर्पण कर देते हैं, वे हमेशा अपने आपको जानते हैं और नए मामलों से निपटने के लिए हमेशा आचार-व्यवहार के अपने ही तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या उल्लेख के भी योग्य न होने वाले तुच्छ मामलों से निपटने के लिए "बुद्धि" का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग विवेकहीन होते हैं, मानो उनका स्वभाव ही चुने जाने से इनकार कर देने वाला हो, और वे हमेशा एक जैसे रहते हैं, कभी नहीं बदलते। ऐसे लोग मूर्ख होते हैं, जिनके पास थोड़ा भी विवेक नहीं होता। वे कभी भी परिस्थितियों या विभिन्न लोगों के लिए उपयुक्त उपाय करने की कोशिश नहीं करते। ऐसे लोगों के पास अनुभव नहीं है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो स्वयं के ज्ञान से इतने बँधे हुए हैं कि जब उनका बुरी आत्माओं के काम से जुड़े लोगों से सामना होता है, तो वे अपना सिर झुका लेते हैं और पाप स्वीकार कर लेते हैं, खड़े होकर उनकी निंदा करने का साहस नहीं करते। और जब उनका ज़ाहिर तौर पर पवित्र आत्मा के कार्य से सामना होता है, तो वे उसका पालन करने की हिम्मत नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर के हाथों में हैं, और उनमें खड़े होकर उनका विरोध करने का ज़रा-सा भी साहस नहीं होता। ऐसे लोग परमेश्वर पर अपमान लाते हैं, और वे उसके लिए भारी बोझ सहन कर पाने में बिलकुल असमर्थ हैं। ऐसे मूर्ख किसी प्रकार का भेद नहीं करते। अनुभव करने के इस तरह के तरीके को इसलिए त्याग दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की दृष्टि में असमर्थनीय है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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