परमेश्वर के दैनिक वचन | "कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श" | अंश 436

एक सामान्य व्यक्ति की समानता को पुनर्स्थापित करने के लिए, अर्थात् सामान्य मनुष्यत्व को प्राप्त करने के लिए लोग केवल अपने शब्दों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। ऐसा करके वे स्वयं को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, और इससे उनके प्रवेश या परिवर्तन को कोई लाभ नहीं पहुँचता। अतः परिवर्तन लाने के लिए लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके अभ्यास करना चाहिए। उन्हें धीरे-धीरे प्रवेश करना चाहिए, थोड़ा-थोड़ा करके खोजना और जांचना चाहिए, सकारात्मकता से प्रवेश करना चाहिए, और सत्य का व्यवहारिक जीवन जीना चाहिए; अर्थात एक संत का जीवन जीना चाहिए। उसके बाद, वास्तविक विषय, वास्तविक घटनाएँ और वास्तविक वातावरण से लोगों को व्यवहारिक प्रशिक्षण मिलता है। लोगों से झूठे दिखावे की अपेक्षा नहीं की जाती; उन्हें वास्तविक वातावरण में प्रशिक्षण पाना है। पहले लोगों को यह पता चलता है कि उनमें क्षमता की कमी है, और फिर वे सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, प्रवेश करते हैं और सामान्य रूप से अभ्यास भी करते हैं; केवल इसी तरीके से वे वास्तविकता को प्राप्त कर सकते हैं, और इसी प्रकार से प्रवेश और भी अधिक तेजी से हो सकता है। लोगों को परिवर्तित करने के लिए, कुछ व्यवहारिकता होनी ही चाहिए; उन्हें वास्तविक विषयों के साथ, वास्तविक घटनाओं के साथ और वास्तविक वातावरण में अभ्यास करना चाहिए। क्या कोई केवल कलीसियाई जीवन पर निर्भर रहकर सच्चा प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है? क्या लोग इस तरह वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? नहीं! यदि लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करने में असमर्थ हैं, तो वह कार्य करने और जीवन जीने के पुराने तरीकों को बदलने में भी असमर्थ हैं। यह पूरी तरह से लोगों के आलस्य या उनकी अत्यधिक निर्भरता के कारण ही नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य में जीवन जीने की क्षमता नहीं है, और इससे भी बढ़कर, उनमें परमेश्वर के सामान्य मनुष्य की समानता के स्तर की समझ नहीं है। अतीत में, लोग हमेशा बात करते थे, बोलते थे, संवाद करते थे, यहाँ तक की वे "वक्ता" भी बन गए थे; लेकिन फिर भी उनमें से किसी ने भी जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश नहीं की; इसके बजाय, वे आँख मूंदकर गहन सिद्धांतों को खोजते रहे। अतः, आज के लोगों को अपने जीवन में परमेश्वर में विश्वास रखने के इस धार्मिक तरीके को बदलना चाहिए। उन्हें एक घटना, एक चीज़, एक व्यक्ति पर ध्यान देते हुए अभ्यास करना चाहिए। उन्हें यह काम पूरे ध्यान से करना चाहिए—तभी वे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में बदलाव उनके सार में बदलाव से आरंभ होता है। कार्य का लक्ष्य लोगों का सार, उनका जीवन, उनका आलस्य, निर्भरता, और दासत्व होना चाहिए, केवल इस तरीके से वे परिवर्तित हो सकते हैं।

यद्यपि कलीसियाई जीवन कुछ क्षेत्रों में परिणाम ला सकता है, परंतु कुंजी अभी भी यही है कि वास्तविक जीवन लोगों को परिवर्तित कर सकता है। इंसान की पुरानी प्रकृति वास्तविक जीवन के बिना परिवर्तित नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में यीशु के कार्य को लो। जब यीशु ने पुराने नियमों को हटाकर नए युग की आज्ञाएँ स्थापित कीं, तो उसने वास्तविक जीवन के असल उदाहरणों का इस्तेमाल किया। जब यीशु अपने चेलों को सब्त के दिन गेहूँ के खेत से होते हुए ले जा रहा था, तो उसके चेलों ने भूख लगने पर गेहूं की बालें तोड़कर खाईं। फरीसियों ने यह देखा तो वे बोले कि उन्होंने सब्त का पालन नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को सब्त के दिन गड्ढे में गिरे बछड़ों को बचाने की अनुमति भी नहीं है, उनका कहना था कि सब्त के दिन कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए। यीशु ने नए युग की आज्ञाओं को धीरे-धीरे लागू करने के लिए इन घटनाओं का प्रयोग किया। उस समय, लोगों को समझाने और परिवर्तित करने के लिए उसने बहुत से व्यवहारिक विषयों का प्रयोग किया। पवित्र आत्मा इसी सिद्धांत से कार्य करता है, और केवल यही तरीका है जो लोगों को बदल सकता है। व्यवहारिक विषयों के ज्ञान के बिना, लोग केवल सैद्धांतिक और बौद्धिक समझ ही प्राप्त कर सकते हैं—यह परिवर्तन का प्रभावी तरीका नहीं है। तो इंसान प्रशिक्षण से बुद्धि और अंतर्दृष्टि कैसे प्राप्त कर सकता है? क्या लोग केवल सुनकर, पढ़कर और अपने ज्ञान को बढ़ाकर बुद्धि और अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है? लोगों को वास्तविक जीवन में समझना और अनुभव करना चाहिए! अतः इंसान को प्रशिक्षण लेना चाहिए और उसे वास्तविक जीवन से हटना नहीं चाहिए। लोगों को विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और भिन्न पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए : शैक्षणिक स्तर, अभिव्यक्ति, चीजों को देखने की योग्यता, विवेक, परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता, व्यवहारिक ज्ञान, मनुष्यजाति के नियम, और मनुष्यजाति से संबंधित अन्य बातें वो चीज़ें हैं जिनसे लोगों को परिपूर्ण होना चाहिए। समझ प्राप्त करने के बाद लोगों को प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए, तभी परिवर्तन किया जा सकता है। यदि किसी ने समझ प्राप्त कर ली है परंतु फिर भी वह अभ्यास की उपेक्षा करता है, तो परिवर्तन कैसे हो सकता है? लोग बहुत कुछ समझते हैं, परंतु वह वास्तविकता को नहीं जीते; इसलिए उनके पास परमेश्वर के वचनों की केवल थोड़ी-सी मूलभूत समझ होती है। तुम केवल आंशिक रूप से प्रबुद्ध हुए हो; तुमने पवित्र आत्मा से केवल थोड़ा-सा प्रकाशन पाया है, फिर भी वास्तविक जीवन में तुम्हारा प्रवेश नहीं हुआ है, या शायद तुम प्रवेश की परवाह भी नहीं करते इस प्रकार, तुम्हारा परिवर्तन कम हो गया है। इतने लंबे समय के बाद, लोग बहुत कुछ समझते हैं। वे सिद्धांतों के अपने ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, परंतु उनका बाहरी स्वभाव वैसा ही रहता है, और उनकी मूल क्षमता पहले जैसी ही बनी रहती है, थोड़ी सी भी आगे नहीं बढ़ती। यदि ऐसा है तो तुम अंततः कब प्रवेश करोगे?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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