परमेश्वर के दैनिक वचन | "वास्तविकता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करो" | अंश 432

परमेश्वर की लोगों से अपेक्षाएं बहुत ज़्यादा नहीं हैं। यदि लोग थोड़ा-भी प्रयास करते हैं तो वे “उत्तीर्ण होने योग्य श्रेणी” प्राप्त कर सकेंगे। असल में, सत्य का अभ्यास करने के मुकाबले सत्य को समझना, जानना और स्वीकार करना अधिक जटिल है। सत्य को जानना और स्वीकार करना, सत्य का अभ्यास करने के बाद आता है; यह वो चरण और तरीका है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। तुम इसका पालन कैसे नहीं कर सकते हो? क्या तुम अपने तरीके से चीजें कर के पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकोगे? पवित्र आत्मा तुम्हारी इच्छा के आधार पर कार्य करता है, या परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हारी कमियों के आधार पर? यह व्यर्थ है अगर तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है लेकिन उनके पास केवल ज्ञान है और बाद में किसी वास्तविक पथ के बारे में कुछ नहीं कह पाते हैं? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान होने का अर्थ सत्य का होना है? क्या यह एक उलझा हुआ दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना ज्ञान बोलने में सक्षम है जितना कि समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक पथ से युक्त नहीं होता है। इस में, क्या तू लोगों को मूर्ख नहीं बना रहा है? क्या तू निरर्थक दिखावा नहीं कर रहा है, जिसका समर्थन करने के लिए कोई सार नहीं है? इस तरह का समस्त व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही यह वास्तविकता से रहित होता है, और उतना ही अधिक लोगों को वास्तविकता में ले जाने में असमर्थ होता है; जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही अधिक तुझसे परमेश्वर की उपेक्षा और उसका विरोध करवाता है। उत्कृष्टतम सिद्धांतों को अनमोल खजाना न समझ; वे घातक हैं, और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग उत्कृष्टतम सिद्धांतों की बात करने में सक्षम हों—लेकिन इनमें वास्तविकता का कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ होते हैं, और वे केवल लोगों को पथभ्रष्ट करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे उनकी वर्तमान परेशानियों को हल करने और उन्हें प्रवेश हासिल करने देने में सक्षम अवश्य होना चाहिए; केवल यही समर्पण के रूप में गिना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्दों में बात मत कर, और लोगों को तेरी आज्ञापालन करने पर बाध्य करने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और यह केवल उनके भ्रम को बढ़ा सकता है। इस तरह कार्य करते रहने के परिणामस्वरूप कई तरह के नियम सिद्धान्त हो जायेंगे, जिससे लोग तुझसे घृणा करेंगे। मनुष्य की कमी ऐसी है, और यह वास्तव में लज्जाजनक है। इसलिए, अब मौजूद समस्याओं के बारे में अधिक बात करो। अन्य लोगों के अनुभवों को निजी संपत्ति न समझो और दूसरों को इसकी सराहना करवाने के लिए इसे ऊँचा न उठाओ। तुम्हें निकलने का अपना, व्यक्तिगत मार्ग खोजना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

यदि तुम्हारी संगति लोगों को चलने का पथ दे सकती है, तो यह तुम्हारे पास वास्तविकता होने के बराबर है। तुम चाहे जो भी कहो, तुमको लोगों को अभ्यास में लाना होगा और उन सभी को मार्ग देना होगा जिसका वे अनुसरण कर सकें। ऐसा न करो कि उनके पास बस ज्ञान ही हो, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, उनके पास चलने के लिए मार्ग हो। लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, उन्हें उस मार्ग पर चलना होगा जो परमेश्वर अपने कार्य में दिखाता है। अर्थात्, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया, उस पथ पर चलने की प्रक्रिया है जिस पर पवित्र आत्मा ले जाता है। तदनुसार, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए, जिस पर तुम चल सको चाहे कुछ भी हो, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किये जाने के मार्ग पर चलना होगा। बहुत पीछे ना रह जाओ, और बहुत अधिक चीज़ों की चिंता न करो। यदि तुम बिना रुकावट पैदा किए उस मार्ग पर चलते हो जिस पर परमेश्वर ले जाता है, तभी तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग प्राप्त कर सकते हो। केवल यह परमेश्वर के प्रयोजनों के अनुसार होना है और मनुष्य के कर्तव्य को पूरा करना माना जाएगा। इस धारा का व्यक्ति होने के नाते, प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य ठीक से पूरा करना चाहिए, वह अधिक करना चाहिए जो लोगों को करना चाहिए, और मनमाने ढंग से कार्य नहीं करना चाहिए। कार्य करने वाले लोगों को अपने शब्दों को स्पष्ट करना चाहिए, अनुसरण करने वाले लोगों को कठिनाइयों का सामना करने और आज्ञापालन करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए, और प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्थान पर रहना चाहिए और सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कैसे अभ्यास करना चाहिए और किस कार्य को पूरा करना चाहिए। उस मार्ग पर चलो जिस पर पवित्र आत्मा ले जाता है; पथभ्रष्ट न हो या गलत न करने लगो। तुम लोगों को आज के कार्य को स्पष्ट रूप से देखना होगा। आज की कार्य पद्धति में प्रवेश करने का तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए। यह पहली चीज़ है जहाँ तुम लोगों को प्रवेश करना होगा। अन्य बातों पर और अधिक शब्दों को बर्बाद ना करो। आज परमेश्वर के घर का कार्य करना तुम लोगों की ज़िम्मेदारी है, आज की कार्यप्रणाली में प्रवेश करना तुम लोगों का कर्तव्य है, और आज के सत्य का अभ्यास करना तुम लोगों का भार है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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