परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है" | अंश 430

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन में प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? राज्य के अच्छे सैनिक उन लोगों के समूह के रूप में प्रशिक्षित नहीं होते जो मात्र वास्तविकता की बातें करते हैं या डींगें मारते हैं; बल्कि वे हर समय परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, ताकि किसी भी असफलता को सामने पाकर वे झुके बिना लगातार परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकें और वे फिर से संसार में न जाएँ। इसी वास्तविकता के विषय में परमेश्वर बात करता है; और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसके कोई वास्तविक मायने नहीं हैं। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके। वह वास्तविकता जिसे मनुष्य समझता है, बहुत ही छिछली है, इसका कोई मूल्य नहीं है, यह परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकती। यह अत्यधिक तुच्छ है और उल्लेख किए जाने के योग्य तक नहीं है। इसमें बहुत कमी है और यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से बहुत ही दूर है। तुममें से प्रत्येक व्यक्ति की यह देखने के लिए एक बड़ी जाँच होगी कि तुम में से कौन मात्र अपनी समझ के विषय में बात करना जानता है परन्तु मार्ग नहीं दिखा पाता, और यह देखने के लिए कि तुम में से कौन अनुपयोगी कूड़ा-करकट है। इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना; मात्र अभ्यास के मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारी समझ कोई मार्ग है, तो इसके अनुसार जो कहना है मुक्त रूप से कहो; यदि यह मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ और बात करना बन्द कर दो! जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है। तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को जलाने के लिए समझदारी की बातें करते हो। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? अगर अनुभव करने के बाद तुम समझदारी की बातें करोगे तो तुम्हें डींगें मारने वाला नहीं कहा जायेगा, अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे जो घमण्ड की बातें करता रहता है। तुम्हारे वास्तविक अनुभव में ऐसी अनेक बातें हैं जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते और तुम अपनी देह से विद्रोह नहीं कर सकते; तुम हमेशा वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, कभी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करते, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की हिम्मत है। तुम बेशर्म हो! तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ की बात करने की हिमाकत करते हो—तुम कितने ढीठ हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के अभ्यस्त हो चुके हो। जब कभी भी तुम बात करना चाहते हो तो तुम सरलता से ऐसा कर लेते हो और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम साज-सज्जा में डूब जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम मनुष्यों को मूर्ख बना सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्यों को पता नहीं होता और न ही उनमें पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारा समर्थन करें, तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुम में वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और तुम इसे सह नहीं पाओगे। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? “उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो; अभी से अभ्यास आरम्भ करना सर्वोत्तम है।” क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसे बिल्कुल नहीं समझते? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं है?

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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