परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" | अंश 411

यदि इसे पढ़ने के बाद तुम केवल शब्दों को स्वीकार करने का दावा करते हो, और अभी भी तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता, और तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का प्रयास नहीं करते, तो यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम परमेश्वर के साथ अपने संबंध को महत्त्व नहीं देते, तुम्हारे विचार अभी तक सही नहीं हुए हैं, तुम्हारे इरादे परमेश्वर द्वारा तुम्हें प्राप्त किए जाने और उसके लिए महिमा लाने की ओर निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, बल्कि शैतान के षड्यंत्र जारी रहने और तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य पूरे करने के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। ऐसे व्यक्ति अनुचित इरादे और गलत विचार रखते हैं। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर ने क्या कहा है और कैसे कहा है, ऐसे लोग बिलकुल उदासीन रहते हैं और उनमें जरा-सा भी परिवर्तन दिखाई नहीं देता। उनके हृदय में कोई भय अनुभव नहीं होता और वे बेशर्म रहते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति आत्माविहीन मूर्ख होता है। परमेश्वर के हर कथन को पढ़ो और जैसे ही तुम उन्हें समझ जाओ, उन पर अमल करना शुरू कर दो। शायद कुछ अवसरों पर तुम्हारी देह कमज़ोर थी, या तुम विद्रोही थे, या तुमने प्रतिरोध किया; इस बात की परवाह न करो कि अतीत में तुमने किस तरह का व्यवहार किया था, यह कोई बड़ी बात नहीं है, और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकती। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी अवस्था सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी करो, उसे करते हुए बस इस बात पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, कार्य और लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो, और देखो कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर घटनाओं को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते, और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए है। सही स्थिति में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के विचारों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके, ताकि वह अपने वचन के फल तुममें प्रकट कर सके, और तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और प्रकाशित कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य के वर्तमान तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की माँगों के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर में आस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता

परमेश्वर जो करता है उसे समझने का प्रयास करो, परमेश्वर के पक्ष में खड़े रहकर, उसके वचनों के ज़रिये चीज़ों को देखो। इस तरह नज़रिया तुम्हारा सही होगा। जो कुछ भी तुम करते हो उसे, परमेश्वर के संग अपने सामान्य रिश्ते से तौलो। गर परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य हैं तुम्हारे, इरादे सही हैं तुम्हारे तो उस काम को करो। परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य बनाए रखने के लिये, तुम डर नहीं सकते इस बात से, कहीं नुकसान न हो। परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते, होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी जिसे विश्वास है परमेश्वर में। यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये, सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।

तुम शैतान को इजाज़त दे नहीं सकते, वो हावी हो तुम पर, काबू करे तुम्हें, हँसी का पात्र बनाए तुम्हें। ऐसा इरादा निशानी है कि परमेश्वर के संग रिश्ते सामान्य हैं तुम्हारे। देह के लिये नहीं, है ये आत्मा की शांति के लिये। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की ख़ातिर, है ये पवित्र आत्मा के कार्य को पाने के लिये। परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते, होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी जिसे विश्वास है परमेश्वर में। यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये, सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।

सही स्थिति में प्रवेश के लिए, परमेश्वर के संग रिश्ता तुम्हें मज़बूत बनाना होगा। परमेश्वर में विश्वास का नज़रिया अपना दुरुस्त करना होगा। ये परमेश्वर को अनुमति देना है वो प्राप्त करे तुम्हें, अपने वचनों के फल प्रकट करे तुम में। परमेश्वर को अनुमति देना कि वो और अधिक प्रबुद्ध करे तुम्हें। इस तरह सही रीति में प्रवेश करोगे तुम। परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते, होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी जिसे विश्वास है परमेश्वर में। यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये, सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।

खाते-पीते रहो परमेश्वर के मौजूदा वचनों को। पवित्र आत्मा के काम के वर्तमान मार्ग में प्रवेश करो। पुरानी प्रथाओं और तौर-तरीकों पर चलने के बजाय, परमेश्वर की आज की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करो। इस तरह, परमेश्वर के संग होंगे रिश्ते सामान्य तुम्हारे। और परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर होगे तुम। परमेश्वर के संग कायम करना अच्छे रिश्ते, होनी चाहिये सर्वोच्च प्राथमिकता उसकी जिसे विश्वास है परमेश्वर में। यही सबसे अहम काम होना चाहिये सबके लिये, सबसे अहम काम होना चाहिये ज़िंदगी में सबके लिये।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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