परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" | अंश 409

परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने वाले हृदय के साथ पूर्णतया संभव है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना, स्वयं के बारे में योजनाएँ न बनाना, और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; इसका अर्थ है परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर की इच्छा तुम पर प्रकट हो जाती है, तो फिर इस पर अमल करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। सब-कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर निर्मित होता है। परमेश्वर के वचनों को खाओ-पियो, फिर परमेश्वर की आवश्यकताओं को अभ्यास में लाओ, अपने विचार सही करो, और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला या कलीसिया में विघ्न डालने वाला कोई काम मत करो। ऐसा कोई काम मत करो, जो तुम्हारे भाई-बहनों के जीवन को लाभ न पहुँचाए; ऐसी कोई बात मत कहो, जो दूसरों के लिए सहायक न हो, और कोई निंदनीय कार्य न करो। अपने हर कार्य में न्यायसंगत और सम्माननीय रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर कार्य परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित पहले रखने और न्यायपूर्वक कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अपने इरादों पर ग़ौर करो, और अगर तुम यह पाओ कि गलत इरादे पैदा हो गए हैं, तो उनसे मुँह मोड़ लो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करो; इस तरह तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, जो बदले में दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही रखने और अपने कार्यों में नेक होने में सक्षम बनो, और अपनी भावनाओं से संचालित मत हो, न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करो। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को आचरण करना चाहिए। छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के इरादे और आध्यात्मिक कद प्रकट कर सकती हैं, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना वांछित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ नहीं खोजते या अपनी संभावनाओं पर विचार नहीं करते (देह-सुख के अर्थ में), बल्कि जीवन में प्रवेश करने का बोझ उठाने के बजाय सत्य का अनुसरण करने की पूरी कोशिश करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम कहा जा सकता है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, फिर भी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या अवज्ञाकारी हों—परंतु जब तक तुम्हारे विचार और तुम्हारे इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार सही हैं : तुम किस पर विश्वास करते हो, किसके लिए विश्वास करते हो, और क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अच्छी तरह से अपने विचारों के साथ अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार विकृत हैं, तो बाकी सब-कुछ बेकार है; तुम कितना भी दृढ़ विश्वास क्यों न करो, तुम कुछ प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद ही तुम परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करोगे, जब तुम देह-सुख का त्याग कर दोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, इत्यादि। तुम्हारे कुछ करने की कोई कीमत या महत्त्व है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारे इरादे ठीक और विचार सही हैं? आजकल बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास इस तरह करते हैं, जैसे घड़ी देखने के लिए सिर उठा रहे हों—उनके दृष्टिकोण विकृत होते हैं और उन्हें सफलतापूर्वक सुधारा जाना चाहिए। अगर यह समस्या हल हो गई, तो सब-कुछ सही हो जाएगा; और अगर नहीं हुई, तो सब-कुछ नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग मेरी उपस्थिति में अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु मेरी पीठ पीछे वे केवल मेरा विरोध ही करते हैं। यह छल-कपट और धोखे का प्रदर्शन है, और इस तरह के व्यक्ति शैतान के सेवक हैं; वे परमेश्वर के परीक्षण के लिए आए शैतान के विशिष्ट रूप हैं। तुम केवल तभी एक सही व्यक्ति हो, जब तुम मेरे कार्य और मेरे वचनों के प्रति समर्पित रह सको। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकते हो; जब तक तुम जो करते हो वह परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है और अपने समस्त कार्यों में तुम न्यायसंगत और सम्मानजनक व्यवहार करते हो; जब तुम निंदनीय अथवा दूसरों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य नहीं करते; और जब तुम प्रकाश में रहते हो और शैतान को अपना शोषण नहीं करने देते, तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित होता है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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