परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" | अंश 408

यदि तुम परमेश्वर के साथ उचित संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी उचित संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ उसके संबंध कभी उचित नहीं होंगे; इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। अपने स्वभाव को बदलना अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को अर्पित करने और परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने की प्रक्रिया है। परमेश्वर का कार्य व्यक्ति को सक्रियता से प्रवेश करा सकता है, और साथ ही उसे अपने नकारात्मक पहलुओं के बारे में जानने के बाद उनका परिमार्जन करने में सक्षम भी बना सकता है। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करने के बिंदु पर पहुँचोगे, तो तुम अपनी आत्मा के भीतर हर सूक्ष्म हलचल को महसूस कर पाओगे, और तुम परमेश्वर से प्राप्त हर प्रबुद्धता और रोशनी को जान जाओगे। इस सूत्र को पकड़कर रखोगे, तो तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करोगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष जितना शांत रह पाएगा, तुम्हारी आत्मा उतनी अधिक संवेदनशील और नाज़ुक रहेगी, और उतनी ही अधिक तुम्हारी आत्मा यह महसूस कर पाएगी कि पवित्र आत्मा किस तरह उसे प्रेरित करती है, और तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध और भी अधिक उचित हो जाएगा। लोगों के बीच उचित संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी उचित नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो। तुम्हारे बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में उचित हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर कितने जीवन-दर्शन हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर के नहीं हो—तुम शैतान से आते हो, और अंत में शैतान के पास ही लौट जाओगे। तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो। इन सभी बातों पर तुम्हें ध्यानपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" | अंश 597

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" | अंश 529

आदम और हव्वा जिन्हें परमेश्वर के द्वारा आदि में बनाया गया था वे पवित्र थे, दूसरे शब्दों में, जब वे अदन की वाटिका में थे तब वे पवित्र थे, और...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं" | अंश 490

कई लोग हैं जो वर्तमान में परीक्षाओं के बीच में हैं; वे परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते हैं। लेकिन मैं तुम्हें बताता हूँ—यदि तुम इसे नहीं...