परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" | अंश 406

लोग अपने हृदय से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते और यदि उनका हृदय उसमें नहीं है और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, जो धार्मिक व्यक्तियों का ठेठ व्यवहार है, और वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के घर में सजावट की तरह, फालतू और बेकार। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं करता। ऐसे व्यक्ति में न केवल पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति, सच में, एक चलती-फिरती लाश की तरह है। ऐसे व्यक्तियों में ऐसा कुछ नहीं है, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जा सके, बल्कि इसके विपरीत, उन सभी को शैतान द्वारा हड़पा और गहरा भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को हटा देगा। वर्तमान में, लोगों का इस्तेमाल करते हुए पवित्र आत्मा न सिर्फ़ उनके उन हिस्सों का उपयोग करता है, जो काम करने के लिए वांछित हैं, बल्कि वह उनके अवांछित हिस्सों को भी पूर्ण करता और बदलता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में उँड़ेला जा सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी, और इससे भी बढ़कर, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियाँ दूर किए जाने का अवसर होगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहन प्रवेश प्राप्त कर सकोगे और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल हासिल कर सकोगे; और नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक होगे, और तुम निष्क्रिय नहीं रहोगे, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इस प्रकार, तुम एक सही व्यक्ति बन जाओगे। यह मानते हुए कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम है, इस बात की कुंजी कि तुम पवित्र आत्मा की प्रशंसा प्राप्त करते हो या नहीं, और तुम परमेश्वर को ख़ुश कर पाते हो या नहीं, यह है कि तुम सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हो या नहीं। जब पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति को प्रबुद्ध करता है और उसका उपयोग करता है, तो वह उसे कभी भी नकारात्मक नहीं बनाता, बल्कि हमेशा उसके सक्रिय रूप से प्रगति करने की व्यवस्था करता है। भले ही इस व्यक्ति में कमज़ोरियाँ हों, वह अपना जीवन जीने का तरीका उन कमजोरियों पर आधारित करने से बच सकता है। वह अपने जीवन में विकास में देरी करने से से बच सकता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की अपनी कोशिश जारी रख पाता है। यह एक मानक है। अगर तुम इसे प्राप्त कर सकते हो, तो यह पर्याप्त सबूत है कि तुमने पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ली है। यदि कोई व्यक्ति हमेशा नकारात्मक रहता है, और प्रबुद्धता हासिल करने तथा खुद को जानने के बाद भी नकारात्मक और निष्क्रिय बना रहता है और परमेश्वर के साथ खड़े होने तथा उसके साथ मिलकर कार्य करने में अक्षम रहता है, तो इस किस्म का व्यक्ति केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करता है, लेकिन पवित्र आत्मा उसके साथ नहीं होता। जब कोई व्यक्ति नकारात्मक होता है, तो इसका मतलब है कि उसका हृदय परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाया है और उसकी आत्मा परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित नहीं की गई है। इसे सभी को समझना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

जब तुम देते हो अपना हृदय परमेश्वर को

ईश्वर से प्यार और उसमें आस्था के लिए, मानव को छूना चाहिए उसके आत्मा को दिल से, ताकि उन्हें मिले ईश्वर की संतुष्टि। मानव को लगाना चाहिए परमेश्वर के वचन को दिल से, ताकि वो प्रेरित हो जाएँ, परमेश्वर के आत्मा द्वारा। यदि लोग परमेश्वर को अपने विश्वास में नहीं देते उसे अपना दिल, अपना दिल गर उसके बोझ को वे गले नहीं लगाते, धोखा देते हैं ईश्वर को, अभ्यास करते हैं धर्म का जो भी वो करते है उसमें। ये नहीं पा सकता प्रशंसा परमेश्वर की। जब तुम देते हो अपना दिल परमेश्वर को, तुम पा सकते हो गहरा प्रवेश, रहो ऊँची अन्तर्दृष्टि की सतहों पर, और तुम पाओगे ज़्यादा समझ अपनी कमज़ोरियों की और ग़लतियों की, पूर्ण करने को अधीर ईश्वर की इच्छा, सक्रिय, नहीं निष्क्रिय, प्रवेश में। ये दिखाता है कि तुम सही व्यक्ति हो।

यदि तुम्हारा दिल ईश्वर में बहाया जाये, और खामोश रह सके सामने उसके, सामने उसके। पवित्रात्मा तुम्हें उपयोग में लाएगा, रोशनी प्राप्त करोगे तुम। पवित्र आत्मा तुम्हारी कमियों को पूर्ण करेगा। जब तुम दिल ईश्वर को देते हो, तुम समझोगे हर एक सूक्ष्म हलचल अपनी आत्मा में, और हर प्रबुद्धता ईश्वर से। इसे पकड़ कर रखो, तुम प्रवेश करोगे परमेश्वर द्वारा सम्पूर्ण किए जाने के सही पथ में।

जब वे नहीं देते हैं अपना दिल ईश्वर को, मानव की आत्मा बन जाती है मंद और सुन्न। ऐसे लोगों के पास हक़ नहीं होगा ईश्वर के वचन समझने का, या ईश्वर से एक उचित संबंध का, और उनका स्वभाव नहीं बदलेगा। अपना स्वभाव बदलने का मतलब है देना अपना दिल ईश्वर को पूरी तरह, और प्रबुद्धता को प्राप्त करना सभी वचनों से जो ईश्वर ने हैं कहे। जब तुम देते हो अपना दिल परमेश्वर को तुम पा सकते हो गहरा प्रवेश, रहो ऊँची अन्तर्दृष्टि की सतहों पर, और तुम पाओगे ज़्यादा समझ अपनी कमज़ोरियों की और ग़लतियों की, पूर्ण करने को अधीर ईश्वर की इच्छा, सक्रिय, नहीं निष्क्रिय, प्रवेश में। ये दिखाता है कि तुम सही व्यक्ति हो।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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