परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" | अंश 393

सभी मनुष्यों के साथ एक आम समस्या यह है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला पाते। ऐसा इसलिए है कि एक तरफ वे इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो दूसरी तरफ, उनकी सूझ-बूझ बहुत अपर्याप्त है; वे दैनिक जीवन की बहुत सारी कठिनाइयों के असली स्वरूप को देख नहीं पाते और नहीं जानते कि समुचित अभ्यास कैसे करें। चूँकि लोगों के अनुभव बहुत सतही हैं, उनकी क्षमता बेहद कमज़ोर है, सत्य की उनकी समझ सीमित है और वे दैनिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल करने में असमर्थ हैं। वे सिर्फ़ दिखावटी आस्था रखते हैं, और परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में अंगीकार करने में असमर्थ हैं। तात्पर्य यह कि परमेश्वर परमेश्वर है, जीवन जीवन है, और मानो उनके जीवन के साथ परमेश्वर का कोई संबंध ही नहीं। ऐसा ही सभी सोचते हैं। इस तरह, यथार्थ में परमेश्वर में केवल विश्वास करने से ही वे परमेश्वर की पहुंच में नहीं आ जाते, और न ही उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर के वचन को पूरी अभिव्यक्ति नहीं मिली है, बल्कि उसके वचन को ग्रहण करने की लोगों की क्षमता ही बेहद सीमित है। कहा जा सकता है कि प्रायः कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल इरादों के अनुरूप नहीं चलता, बल्कि परमेश्वर में उनका विश्वास उनके अपने इरादों, पूर्व से चली आ रही उनकी अपनी धार्मिक अवधारणाओं, और कार्य करने के उनके अपने तरीकों पर आधारित होता है। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो परमेश्वर के वचन को स्वीकार कर स्वयं में बदलाव लाते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे अपनी ग़लत धारणाओं के साथ डटे रहते हैं। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, तो वे धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर ऐसा करते हैं, और उनका जीवन तथा दूसरों के साथ उनका व्यवहार पूरी तरह उनके अपने जीवन-दर्शन से संचालित होता है। कहा जा सकता है कि दस लोगों में से नौ के साथ ऐसा ही है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद कोई अलग योजना बनाते हैं और एक नई शुरुआत करते हैं। मानवजाति परमेश्वर के वचन को सत्य मानने में असफल रही है, या उसे सत्य के रूप में स्वीकार कर अभ्यास में नहीं ला सकी है।

उदाहरण के लिए, यीशु में विश्वास को ही लें। चाहे किसी ने अभी-अभी विश्वास करना शुरू किया हो या एक लम्बे समय से विश्वास करता आ रहा हो, इन सभी ने बस अपने भीतर मौजूद गुणों का उपयोग और प्राप्त क्षमताओं का प्रदर्शन किया। लोगों ने ये तीन शब्द "परमेश्वर में विश्वास" बस अपने जीवन में जोड़ लिए, लेकिन अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया, और परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा भी नहीं बढ़ा। उनकी तलाश न उत्साह से परिपूर्ण थी और न उदासीन। लोगों ने यह नहीं कहा कि वे अपने विश्वास को छोड़ देंगे, मगर उन्होंने अपना सब कुछ परमेश्वर को समर्पित भी नहीं किया। उन्होंने कभी परमेश्वर से सचुमच प्रेम किया ही नहीं, न ही कभी उसकी आज्ञा का पालन किया। परमेश्वर में उनका विश्वास असली और नकली का सम्मिश्रण था। अपने विश्वास के प्रति उनकी एक आंख खुली रही तो दूसरी बंद। वे अपने विश्वास को अभ्यास में लाने के प्रति गंभीर नहीं रहे। वे असमंजस की ऐसी ही स्थिति में बने रहे, और अंत में उन्हें एक संभ्रमित मौत का सामना करना पड़ा। इन सबके क्या मायने हैं? आज, व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम्हें सही रास्ते पर कदम रखना होगा। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो तो तुम्हें सिर्फ़ परमेश्वर के आशीष की ही कामना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश भी करनी चाहिए। परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता प्राप्त कर और अपनी व्यक्तिगत खोज के माध्यम से, तुम उसके वचनों को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में सच्ची समझ विकसित कर सकते हो, और तुम परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्रेम अपने हृदयतल से आता महसूस कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम बेहद सच्चा हो, और इसे कोई नष्ट नहीं कर सके या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सके, तब तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सही रास्ते पर हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और अब कोई भी दूसरी चीज तुम पर कब्जा नहीं कर सकती है। तुम अपने अनुभव, चुकाए गए मूल्य, और परमेश्वर के कार्य के माध्यम से, परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीने लग जाते हो। तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर जब मुक्त हो जाते हो, केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य की खोज की कोशिश करनी चाहिए। यह हर एक व्यक्ति का कर्तव्य है। किसी को भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दुविधा में नहीं रह सकते, और न ही इसे हल्के में ले सकते हो। तुम्हें हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके लिए सब कुछ करना चाहिए। जब तुम कुछ बोलते या करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। ऐसा करने से ही तुम परमेश्वर के हृदय को पा सकते हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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