परमेश्वर के दैनिक वचन | "अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत" | अंश 387

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे। तुम सभी जिनका अनुभव इस क्षेत्र में अभी तक सीमित है, तुम्हारे विचार तुम्हारे कार्य को और अधिक दूषित करेंगे। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम पवित्र आत्मा से आए, अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम अपने विचारों के अनुसार अपना कार्य करते हो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को एक किनारे कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम जानते हो कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारी गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि एक तरह की भावना है जो तुम्हारे भीतर से निकली है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम इस तरह से कार्य क्यों करते हो। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है, अधिकांश लोगों में आम तौर पर यह ऐसे ही घटित होता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोच और चिंतन का परिणाम होते हैं और उनमें उनकी मनमानी और उन विचारों की मिलावट होती है जो इससे जुड़े होते हैं कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आत्म-लाभ ढूँढा जा सकता है, और कौन-से निजी फायदे प्राप्त किए जा सकते हैं; हर इंसानी निर्णय में इन बातों का समावेश होता है। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ। उपयुक्त अगुआ और कर्मी पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बिना थके सत्य खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और सही ढंग से उसकी गवाही देने के लिये व्यक्ति को अपने कार्य में मिलावटी तत्वों एवं इरादों की जाँच करनी चाहिये, और फिर यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि कार्य इंसानी विचारों से कितना प्रेरित है, और कितना पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उत्पन्न हुआ है, और कितना परमेश्वर के वचन के अनुसार है। तुम्हें निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी की जाँच करते रहना चाहिये। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना तुम्हें परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर ले जाएगा। परमेश्वर के इरादों के अनुरूप उसकी सेवा करने के लिए, अनेक सत्यों का होना आवश्यक है। सत्य को समझकर ही लोग भेद करने के काबिल बनते हैं और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनके अपने विचारों से क्या उत्पन्न होता है और उन चीज़ों को भी पहचान पाते हैं जो उनकी प्रेरणा की ओर संकेत करती हैं। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह भी पहचान पाते हैं कि सत्य के अनुसार कार्य करना क्या होता है। तभी वे जान पाएंगे कि और अधिक शुद्धता से समर्पण कैसे करें। सत्य के बिना लोगों के लिए भेद कर पाना असंभव है। एक नासमझ व्यक्ति शायद आजीवन परमेश्वर पर विश्वास करे, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने का क्या अर्थ होता है या परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ होता है, क्योंकि वह सत्य नहीं समझता; उसके मन में वह विचार ही मौजूद नहीं है। सत्य बेहद निम्न क्षमता के लोगों की पहुँच से बाहर होता है; तुम उनके साथ किसी भी प्रकार से संगति करो, फिर भी वे नहीं समझते। ऐसे लोग संभ्रमित होते हैं। इस प्रकार के संभ्रमित लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; वो छोटी-मोटी सेवा ही कर सकते हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को करने के लिए, इन दो सिद्धांतों को समझना आवश्यक है। ऊपर से दिए गये कार्य के प्रबंधनों का पालन कड़ाई से करना होगा, और पवित्र आत्मा के किसी भी मार्गदर्शन का पालन करने पर ध्यान देना होगा। जब इन दोनों सिद्धांतों को समझ लिया जाएगा, तभी कार्य प्रभावशाली होगा और परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्टि मिलेगी।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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