परमेश्वर के दैनिक वचन : जीवन में प्रवेश | अंश 383

स्वभाव में रूपांतरण, व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता, न ही यह झूठा बाह्य परिवर्तन होता है, यह एक अस्थायी जोशीला परिवर्तन भी नहीं होता; बल्कि यह स्वभाव का एक सच्चा रूपांतरण है जो व्यवहार में बदलाव लाता है। व्यवहार में आया ऐसा परिवर्तन बाहरी व्यवहार में और कार्यों में परिवर्तन के समान नहीं होता। स्वभाव के रूपांतरण का अर्थ है कि तुमने सत्य को समझा और अनुभव किया है, और सत्य तुम्हारा जीवन बन गया है। अतीत में, तुमने इस मामले के सत्य को समझा तो था, लेकिन तुम इस पर अमल नहीं कर पाए थे; सत्य तुम्हारे लिए मात्र एक ऐसे सिद्धांत की तरह था जो टिकता ही नहीं था। अब चूँकि तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित हो गया है, तुम न केवल सत्य को समझते हो, बल्कि तुम सत्य के अनुसार कार्य भी करते हो। अब तुम उन चीज़ों से जिनके तुम पहले शौकीन थे; जो तुम पहले करना चाहते थे, साथ ही अपनी कल्पनाओं और धारणाओं से छुटकारा पाने में सक्षम हो। अब तुम उन चीज़ों को छोड़ देने में सक्षम हो जिन्हें तुम अतीत में नहीं छोड़ पाते थे। यह स्वभाव का रूपांतरण है और यह तुम्हारे स्वभाव के रूपांतरित होने की प्रक्रिया भी है। सुनने में यह बहुत सरल लगता है, लेकिन वास्तव में, जो व्यक्ति इस प्रक्रिया से गुजर रहा होता है, उसे बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, शरीर पर काबू पाना होता है और शरीर के उन पहलुओं का त्याग करना पड़ता है जो उसकी प्रकृति का अंग हैं। ऐसे व्यक्ति को व्यवहार, काट-छाँट, ताड़ना, न्याय, परीक्षणों और शुद्धिकरण से भी गुज़रना पड़ता है। इन सबका अनुभव करने के बाद ही कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति को समझ सकता है। हालाँकि कुछ समझ होने का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति तुरंत बदल सकता है; इस प्रक्रिया में उसे कठिनाइयाँ भी सहनी होंगी। इसी तरह, क्या किसी चीज़ को समझते ही, तुम उस पर अमल कर सकते हो? तुम उस पर तुरंत अमल नहीं कर सकते। तुम्हारी समझ के बावजूद, लोग तुम्हारी काट-छाँट और निपटारा करते हैं, और परिवेश तुम्हें सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी, लोग इसे झेलने को तैयार नहीं होते और कहते हैं, "मैं इसे उस तरह से क्यों नहीं कर सकता? क्या मुझे इसको इसी तरह से करना होगा?" दूसरों का कहना है, "यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें इसे इसी तरह करना चाहिए। इसे इस तरह से करना सत्य के अनुसार है।" जब लोग एक निश्चित बिंदु तक पहुंचकर कुछ परीक्षणों का अनुभव कर लेते हैं और परमेश्वर की इच्छा और कुछ सत्यों को समझ जाते हैं, तब वे थोड़े खुश होकर सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। शुरू में लोग सत्य पर अमल करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, पूरे समर्पण भाव से कर्तव्यों के निर्वहन को ही लो। तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के प्रति वफादार होने की कुछ समझ है, और तुम उससे जुड़े सत्यों को समझते भी हो, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित कब होगे? नाम और कर्म में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कब करोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है; शायद कुछ लोग तुम्हारे साथ निपटें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी आँखें तुम पर टिकी होंगी, तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम्हीं ने अच्छा काम नहीं किया, कर्तव्यों के निर्वहन में समर्पण की कमी को बर्दाश्त नहीं किया जाता, तुम लापरवाह या अन्यमनस्क नहीं हो सकते। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम अपने बारे में कुछ बातें समझोगे और जानोगे कि तुम बहुत अपवित्र हो, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी अनियंत्रित इच्छाएँ हैं। जब तुम इन चीज़ों के सार को समझ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के समक्ष आकर, उससे प्रार्थना करके सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो; इस तरह तुम अशुद्धियों से मुक्त हो सकते हो। यदि इस तरह अपनी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम बढ़ा सकोगे। किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव जितना शुद्ध किया जाएगा, उसका जीवन स्वभाव उतना ही रूपांतरित होगा।

सार रूप में, अब तुम सच्चे दिल से अपने कर्तव्यों को कितना पूरा कर रहे हो? अपने स्वभाव में रूपांतरण के बाद, तुम सत्य के अनुसार अपने कर्तव्यों को कितनी अच्छी तरह पूरा कर रहे हो? इसकी जाँच करके, तुम जान सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव वास्तव में कितना रूपांतरित हुआ है। स्वभाव में रूपांतरण लाना कोई आसान काम नहीं है; इसका मतलब महज़ व्यवहार में थोड-सा बदलाव लाना और सत्य का थोड़ा ज्ञान हासिल कर लेना, सत्य के हर पहलू के बारे में अपने अनुभव पर थोड़ा बात कर लेना, या थोड़ा-सा बदल जाना, अनुशासित किए जाने के बाद थोड़ा-सा आज्ञाकारी हो जाना नहीं है। ये चीज़ें जीवन स्वभाव में रूपांतरण का अंग नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? भले ही तुम कुछ चीज़ों का त्याग कर सको, लेकिन जिस चीज़ का तुम अभ्यास कर रहे हो, वह अभी सही मायने में सत्य का अभ्यास करने के स्तर तक नहीं पहुँची है। या तुम शायद इस तरह से व्यवहार इसलिए करते हो क्योंकि तुम कुछ समय के लिए उपयुक्त परिवेश में और अनुकूल स्थिति में हो या तुम्हारी वर्तमान परिस्थितियों ने तुम्हें इस तरह से व्यवहार करने के लिए मजबूर किया है। साथ ही, जब तुम्हारी मन:स्थिति स्थिर हो और पवित्र आत्मा कार्यरत हो, तो तुम अभ्यास कर पाते हो। यदि तुम अय्यूब की तरह परीक्षणों से गुज़रकर कष्ट उठा रहे होते, या पतरस की तरह जिसे परमेश्वर ने मर जाने के लिए कहा था, क्या तुम यह कह पाते, "अगर तुम्हें जानने के बाद मैं मर भी जाऊं, तो कोई बात नहीं"? स्वभाव में रूपांतरण कोई रातोंरात नहीं होता, और न ही इसका मतलब यह है कि सत्य को समझकर तुम प्रत्येक वातावरण में सत्य को अभ्यास में ला पाओगे। इससे मनुष्य की प्रकृति जुड़ी हुई है। ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे कृत्यों की प्रकृति यह नहीं दर्शाती कि तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। कई लोगों के बाहरी व्यवहार निश्चित प्रकार के होते हैं, जैसे, अपने परिवार और काम-धंधे का त्याग करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाना, इसलिए वो मानते हैं कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन परमेश्वर नहीं मानता कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर तुम्हारे हर काम के पीछे व्यक्तिगत इरादे हों और यह दूषित हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो; तुम्हारा आचरण केवल बाहरी दिखावा है। सच कहें, तो परमेश्वर तुम्हारे आचरण की निंदा करेगा; वह इसकी प्रशंसा नहीं करेगा या इसे याद नहीं रखेगा। इसका आगे विश्लेषण करें तो, तुम दुष्टता कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से देखने पर तो तुम किसी चीज़ में अवरोध या व्यवधान नहीं डाल रहे हो और तुमने वास्तविक क्षति नहीं पहुंचाई है या किसी सत्य का उल्लंघन नहीं किया है। यह न्यायसंगत और उचित लगता है, मगर तुम्हारे कृत्यों का सार दुष्टता करने और परमेश्वर का विरोध करने से संबंधित है। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने कृत्यों के पीछे के अभिप्रायों को देखकर तुम्हें निश्चित करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है, क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस इंसानी नज़रिए पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे कृत्य इंसानी कल्पनाओं और इरादों के अनुरूप हैं या नहीं या वो तुम्हारी रुचि के उपयुक्त हैं या नहीं; ऐसी चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि, यह इस बात पर आधारित है कि परमेश्वर की नज़रों में तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं, तुम्हारे कृत्यों में सत्य-वास्तविकता है या नहीं, और वे उसकी अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आपको मापना ही सही है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब समस्या के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक भागते-दौड़ते हो, तुम लोग जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित नहीं हुआ है, और तुम इस बात को समझ नहीं सकते कि इस रूपांतरण में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? भले ही तुम अधिक समय से परमेश्वर में आस्था रखते आ रहे हो, लेकिन हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में रूपांतरण हासिल करने के सार और उसकी गहराई को महसूस न कर सको। तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में ज़बर्दस्त दृढ़ता महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के घर में कोई काम कर रहे हो, या सामान्य तौर पर भी, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम्हारा आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होगा, और जब तुम्हारे पास कुछ हद तक अनुभव हो जाएगा, तो तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक अनुभव प्राप्त करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और वास्तव में तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों में कोई सत्यता नहीं थी, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोह, प्रतिरोध और मानवीय व्यवहार से भरी हुई थी।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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