परमेश्वर के दैनिक वचन | "आरंभ में मसीह के कथन : अध्याय 19" | अंश 383

ज्यों-ज्यों पवित्र आत्मा का कार्य आगे बढ़ रहा है, परमेश्वर ने एक बार फिर हमें पवित्र आत्मा के कार्य की एक नई पद्धति में प्रवेश कराया है। परिणामस्वरूप, यह अपरिहार्य है कि कुछ लोगों ने मुझे गलत समझा और मुझसे शिकायतें की है। कुछ लोगों ने मेरा प्रतिरोध और मेरा सामना किया है, और मेरी जाँच-पड़ताल की है। हालांकि, मैं अभी भी अनुग्रहपूर्वक तुम लोगों के पश्चाताप करने और सुधरने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। पवित्र आत्मा के कार्य की पद्धति में परिवर्तन का होना परमेश्वर का खुले तौर पर प्रकट होना है। मेरा वचन अपरिवर्तित रहेगा! चूँकि यह तुम हो जिसे मैं बचा रहा हूँ, मैं तुम्‍हें बीच राह पर नहीं छोड़ दूँगा। पर तुम लोगों के अंदर संदेह हैं और तुम लोग खाली हाथ वापस जाना चाहते हो। तुम लोगों में से कुछ आगे बढ़ने से रुक गए हैं जबकि अन्य लोग देख रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ अन्य लोग स्थिति का निष्क्रियता से पालन कर रहे हैं, जबकि कुछ तो बस नकल उतार रहे हैं। तुम लोगों ने सचमुच अपने दिलों को कठोर कर लिया है! मैंने तुम लोगों से जो कुछ कहा, तुमने उसे लेकर अपने अहंकार और घमण्ड में बदल दिया है। इस बारे में और सोचो—यह और कुछ नहीं, बल्कि दया और न्याय के वचनों का तुम सभी पर आ पहुँचना है। पवित्र आत्मा यह देखकर कि तुम लोग वाकई विद्रोही हो, सीधे तौर पर बोलता और विश्लेषण करता है। तुम लोगों को भय होना चाहिए। लापरवाही से या बिना सोचे-विचारे कुछ भी काम न करो। तुम लोग निष्‍प्रभावी, अभिमानी या दुराग्रही न बनो! मेरे वचन पर अमल करने के लिए तुम्‍हें और अधिक ध्यान देना चाहिए, और जहाँ भी तुम जाओ, तुम्हें हर जगह मेरे वचन को जीना चाहिए, ताकि वे वास्तव में तुम्‍हें अंदर से बदल सके तुम मेरा स्वभाव पा सको। ये सच्चे परिणाम हैं।

कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम में एक विशेष उच्‍चता होनी चाहिए, और तुम्‍हें अपने पूरे हृदय से निरंतर खोजना चाहिए, साथ ही तुम्हें पवित्र आत्मा का ताप और शुद्धिकरण प्राप्त करना होगा और एक रूपांतरित व्यक्ति बनना होगा। ऐसी परिस्थितियों में ही कलीसिया का निर्माण किया जा सकता है। पवित्र आत्मा के कार्य ने अब कलीसिया के निर्माण का प्रारंभ करने के लिए तुम लोगों का नेतृत्व किया है। यदि तुम लोग मतिभ्रंश और ढीले-ढाले तरीके से व्यवहार करते रहे, जैसा कि पहले करते थे, तो तुम लोगों से कोई आशा नहीं की जा सकती। तुम्‍हें सभी सच्चाइयों से लैस होना होगा और आध्यात्मिक विवेक रखना होगा, और मेरी बुद्धिमत्‍ता के अनुसार तुम्‍हें उचित मार्ग पर चलना होगा। कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम्‍हें आत्मा के जीवन में जीना होगा और केवल बाहर से दिखावटी तौर पर नक़ल करने से बचना होगा। तुम्‍हारे जीवन में विकास की प्रक्रिया वही प्रक्रिया है जिससे तुम बने होते हो। हालांकि, ध्यान रखो कि जो लोग आध्यात्मिक उपहारों पर निर्भर हैं या जो आध्यात्मिक बातों को समझने में अक्षम हैं या जिनमें व्यावहारिकता की कमी है, और वे लोग भी जो हर समय मेरे साथ संपर्क बनाए रखने में और मेरे पास आने में असमर्थ होते हैं, वे कभी निर्मित नहीं हो सकते हैं। जो लोग अपने मन को अवधारणाओं में तल्लीन रखते हैं या मान्यताओं में जीते हैं, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता, और न ही उन्‍हें जो अपने आवेशों से निर्देशित होते हैं। चाहे परमेश्वर तुम्‍हारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, तुम्‍हें उनके समक्ष पूरी तरह से समर्पण करना होगा। अन्यथा, तुम्‍हारा निर्माण नहीं किया जा सकता। जो लोग अपनी आत्म-महत्ता, आत्म-तुष्टि, अपने अभिमान और संतोष में लीन रहते हैं और जो एहसान जताते या दिखावा करते हैं, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता है। जो लोग दूसरों के साथ ताल-मेल में रह कर सेवा नहीं कर सकते, उनका निर्माण नहीं किया जा सकता। जिनके पास कोई आध्यात्मिक विवेक नहीं है, और जो किसी भी अगुआ का आँखें मूँद कर अनुसरण करते हैं, उन्हें भी नहीं बनाया जा सकता है, और जो लोग मेरे इरादों को समझने में नाकाम रहते हैं और पुरानी परिस्थितियों में जी रहे हैं, उनका भी निर्माण नहीं किया जा सकता। जो लोग नई रोशनी का पालन करने में बहुत धीमे हैं और जिनके पास आधार के रूप में कोई जीवनदृष्टि नहीं है, उन्हें निर्मित नहीं किया जा सकता है।

कलीसिया को और किसी विलम्‍ब के बिना बनाया जाना चाहिए, और इसके लिए मैं अति-चिंतित हूँ। तुम्हें सकारात्मक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करके शुरू करना चाहिए, और अपनी सारी शक्ति के साथ खुद को प्रस्तुत करके, निर्माण कि धारा में स्‍वयं को शामिल करना चाहिए। अन्यथा, तुम्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। जो कुछ भी छोड़ देने के योग्‍य है, तुम्‍हें उसका पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए, और जो आत्‍मसात करने योग्‍य है मात्र उसे ही ग्रहण करना चाहिए। तुम्‍हें मेरे वचन की वास्तविकता को जीना चाहिए, और तुम्‍हें सतही और असंगत मामलों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। अपने आप से पूछो, तुमने मेरे वचन में से कितना ग्रहण किया है? तुम मेरे वचन से कितना जीते हो? तुम्‍हें अपने मन में स्पष्ट रहना चाहिए और जल्दबाजी में कुछ भी करने से बचना चाहिए। अन्यथा, यह केवल नुकसान पहुँचाएगा, और तुम्‍हें जीवन में आत्म-विकास करने में मदद नहीं करेगा। तुम्‍हें सत्य को समझना चाहिए, इस पर अमल करना जानना चाहिए, और मेरे वचन को सही मायने में तुम्‍हारा जीवन बनने देना चाहिए। यही इस मामले का मूल है!

चूँकि कलीसिया का निर्माण अब एक महत्वपूर्ण क्षण पर पहुँच गया है, शैतान योजना बना रहा है और इसे ध्वस्त करने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है। तुम लोगों को लापरवाह नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने उत्साह में सावधान और विवेकशील रहना चाहिए। ऐसे विवेक के बिना, तुम लोगों को बड़ा नुकसान होगा। यह कोई तुच्छ बात नहीं है। तुम लोग इसे महत्व की बात मानो। शैतान झूठे दिखावे और नकली चीज़ों को पेश करने में सक्षम है जिनकी सामग्री की गुणवत्ता बहुत भिन्न होती है। लोग इतनी मूर्खता और लापरवाही से व्यवहार करते हैं, और उनमें विवेक की कमी है, जिसका अर्थ है कि तुम लोग हर समय समझदार और शांत नहीं रह सकते हो। तुम लोगों के दिल जाने कहाँ होते हैं। सेवा एक सम्मान और एक नुकसान भी है। यह तुम्‍हें या तो आशीष तक या दुर्भाग्य तक ले जा सकती है। मेरी उपस्थिति में मौन रहो और मेरे वचन के अनुसार जीते रहो, जिससे तुम वास्तव में जागरूक रहोगे और अपने उत्साह में विवेकशील बने रहोगे। जब भी शैतान आएगा, तुम तुरंत उसके सामने अपनी रक्षा करने में सक्षम रहोगे, और उसके आने का पूर्वाभास भी कर लोगे; तुम अपनी आत्‍मा में वाकई बेचैनी महसूस करोगे। शैतान का वर्तमान काम प्रचलित रुझानों के बदलाव के अनुसार बदलता रहता है। जब लोग मतिभ्रंश ढंग से व्यवहार करते हैं और असावधानी बरतते हैं, तो वे बंधन में रहते हैं। तुम्हें हर समय सतर्क रहना होगा और अपनी आँखें खुली रखनी होंगी। अपने स्वयं के लाभ और हानि पर विवाद न करो, या अपने स्वयं के लाभ की ही गणना न करो। बल्कि, मेरी इच्छा पूरी हो इसकी माँग करो।

वस्तुएँ समान दिख सकती हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता भिन्न हो सकती है। इस कारण, तुम्‍हें व्यक्तियों और आत्माओं को भी पहचानना होगा। तुम्‍हें विवेक का अभ्यास करना चाहिए और आध्यात्मिक रूप से स्पष्ट बने रहना चाहिए। जब शैतान का विष प्रकट होगा, तो तुम्हें इसे फ़ौरन पहचानने में समर्थ होना चाहिए। वह परमेश्वर के न्याय की रोशनी से बच नहीं सकता है। आत्‍मा में रहते हुए, तुम लोगों को अपनी आत्मा में पवित्र आत्मा की वाणी गौर से सुनने के प्रति ध्यान देना चाहिए; दूसरों का अंधा अनुकरण न करो या असत्‍य को सत्‍य मान लेने की भूल न करो। कोई भी नेतृत्व करे, उसका यूँ ही पालन न करने लगो, ऐसा न हो कि तुम्‍हें बहुत नुकसान हो जाए। उससे तुमको कैसा महसूस हो रहा है? क्या तुम लोगों ने परिणामों को महसूस किया है? तुम्‍हें बिना सोचे समझे सेवा में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या उसमें अपनी राय नहीं देनी चाहिए, नहीं तो मैं तुम्‍हें गिरा दूँगा। इससे भी बदतर, यदि तुम आज्ञा मानने से इंकार करते हो और अपनी ही बात कहते और मनमानी करते हो, तो मैं तुमको हटा दूँगा! कलीसिया को और अधिक लोगों को बटोरने की ज़रूरत नहीं है; इसे उन लोगों की आवश्यकता है जो परमेश्वर से सच्‍चाई से प्रेम करते हों और वास्तव में मेरे वचन के अनुसार जीते हों। तुम्‍हें अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में पता होना चाहिए। अगर गरीब लोग खुद को धनी समझें तो क्या यह खुद को धोखा देना नहीं है? कलीसिया के निर्माण के लिए, तुम्‍हें आत्मा का अनुपालन करना चाहिए। आँखें बंद करके कार्य न करो, लेकिन अपने स्थान पर टिके रहो और अपना स्वयं का कार्य पूरा करो। तुम्‍हें अपनी भूमिकाओं से बाहर कदम नहीं उठाना चाहिए, लेकिन अपनी पूरी ताक़त के साथ तुम जो कुछ भी कर सकते हो, उसे पूरा करना चाहिए, और तब मेरा हृदय संतुष्ट होगा। ऐसा नहीं है कि तुम सभी एक ही कार्य में सेवा का योगदान करोगे। बल्कि, तुममें से प्रत्येक को अपनी भूमिका निभानी चाहिए और कलीसिया में अन्य लोगों के साथ मिल कर अपनी-अपनी सेवा को समर्पित करना चाहिए। तुम लोगों की सेवा इधर या उधर भटकनी नहीं चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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