परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 18" | अंश 580

बिजली की एक चमक पर, प्रत्येक जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाता है। उसी तरह, मेरे प्रकाश से प्रकाशित मानवजाति ने उस पवित्रता को पुनः-प्राप्त कर लिया है जिससे वह कभी सम्पन्न थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार गंदे पानी में पलट गया है, और सतह के नीचे डूब कर, कीचड़ में घुल गया है! ओह, वह सम्पूर्ण मानवजाति ने, जिसे मैंने रचा था, अंततः फिर से रोशनी में जीवन को प्राप्त कर लिया है, अपने अस्तित्व की नींव को पा लिया है, और कीचड़ में संघर्ष करना बंद कर दिया है! ओह, सृष्टि की असंख्य चीजें जो मैंने अपने हाथों में थामे रखी हैं! वे कैसे मेरे वचनों के माध्यम से नई नहीं की जा सकती हैं? वे कैसे, रोशनी में, अपने कार्यों को नहीं कर सकती हैं? पृथ्वी अब स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है। स्वर्ग और पृथ्वी, अब खालीपन द्वारा पृथक नहीं हैं, पुनः कभी भी पृथक नहीं किए जाने के लिए, अब एक ही बन गए हैं। इस आनन्द के अवसर पर, इस उत्साह के अवसर पर, मेरी धार्मिकता और मेरी पवित्रता, सम्पूर्ण बह्माण्ड में फैल गई है, और सम्पूर्ण मानवजाति बिना रुके उसकी प्रशंसा करती है। स्वर्ग के शहर खुशी से हँस रहे हैं, और पृथ्वी के राज्य खुशी से नाच रहे हैं। इस क्षण कौन आनन्द नहीं ले रहा है? और इस क्षण कौन रो नहीं रहा है? पृथ्वी अपनी मौलिक स्थिति में स्वर्ग से सम्बंध रखती है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ एक हो जाता है। मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बाँधे रखने वाली डोर है, और उसकी पवित्रता के कारण, उसके नवीनीकरण के कारण, स्वर्ग अब पृथ्वी से छुपा हुआ नहीं है, और पृथ्वी स्वर्ग के प्रति अब और मूक नहीं है। मानवजाति के चेहरों पर अब संतुष्टि की मुस्कान बिखरी हुई है और उनके हृदयों में मिठास बह रही है जिसकी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य मनुष्य से झगड़ा नहीं करता है, न ही मनुष्य एक दूसरे से असहमति के साथ झगड़ता है। क्या कोई ऐसा है जो, मेरी रोशनी में, दूसरों के साथ शान्ति से नहीं रहता है? क्या ऐसा कोई है जो, मेरे दिनों में, मेरे नाम का अपमान करता है? सभी मानव श्रद्धा भरी निगाहों से मुझे निहारते हैं और अपने हृदयों में वे चुपचाप मुझे पुकारते हैं। मैंने मानवजाति के प्रत्येक कार्य को खोजा हैः मानवों में, जो शुद्ध किए गए हैं, ऐसे कोई नहीं हैं जो मेर् प्रति अवज्ञाकारी हैं, ऐसे कोई नहीं हैं जो मेरी आलोचना करते हैं। सम्पूर्ण मानवजाति में मेरा स्वभाव भर गया है। हर कोई मुझे जानने के लिए आ रहा है, मेरे और करीब आ रहा है, मेरी आराधना कर रहा है। मैं मनुष्य की आत्मा में दृढ़ खड़ा हूँ, मैं मनुष्य की दृष्टि में उच्चतम शिखर पर उठा हुआ हूँ, और उसकी नसों में रक्त के माध्यम से प्रवाहित होता हूँ। मनुष्य के हृदय में आनन्द की उमंग पृथ्वी की सतह पर हर स्थान को भर देती है, हवा तेज़ और ताज़ा हो जाती है, घना कोहरा मैदान को अब और आच्छादित नहीं करता है, और सूर्य प्रकाशमान होकर चमकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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