परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" | अंश 108

यद्यपि पृथ्वी पर मसीह परमेश्वर स्वयं के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह सब लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता है। वह सब लोगों को स्वयं का दर्शन कराने नहीं आता है; वह मनुष्य को अनुमति देने आता है कि वह उसका हाथ पकड़कर उसकी अगुवाई में चलें, इस प्रकार नवीन युग में प्रवेश करें। मसीह के देह का कार्य स्वयं परमेश्वर के कार्य, अर्थात्, देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और मनुष्य को समर्थ करने के लिए नहीं है कि वह उसकी देह के सार को पूर्णतः समझे। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह उससे अधिक नहीं करता है जो देह के लिए प्राप्य से अधिक हो। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है, तथा वह मनुष्य पर परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति को प्रकट नहीं करता है। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय नहीं है जैसा कि मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यक्तिगत रूप में वह कार्य करता है जिसे परमेश्वर स्वयं को करना चाहिए, किन्तु वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता है, ना ही वह उत्तेजनापूर्वक अपने स्वयं के कर्मों की घोषणा करता है। बल्कि, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं उनके पास उसकी विशेषताएँ नहीं होती हैं। अभिमानी तथा आत्म-प्रशंसा करने के स्वभाव वाले झूठे मसीहों से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार की देह में वास्तव में मसीह है। जितने अधिक वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीहे स्वयं का दिखावा करते हैं, तथा लोगों को धोखा देने के लिये वे और अधिक संकेतों और चमत्कारों को करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों के पास परमेश्वर के गुण नहीं होते हैं; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग नही लगता है। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिये देहधारी होता है, मात्र सब मनुष्यों को उसे देखने देने की अनुमति देने के लिए नहीं। बल्कि, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है, तथा जो वह प्रकट करता है उसे अपने सार को प्रमाणित करने की अनुमति देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ द्वारा जब्त नहीं की गई है; यह उसके कार्य तथा उसके सार द्वारा निर्धारित की जाती है। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर का सार है, तथा वह स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह अभी भी, आखिरकार, पवित्रात्मा से भिन्न देह है। वह पवित्रात्मा की विशेषताओं वाला परमेश्वर नहीं है; वह देह के आवरण वाला परमेश्वर है। इसलिए, इस बात की परवाह किए बिना कि वह कितना सामान्य तथा कितना निर्बल है, तथा कैसे भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा को खोजता है, उसकी दिव्यता अखण्डनीय है। देहधारी परमेश्वर में न केवल सामान्य मानवता तथा उसकी निर्बलताएँ विद्यमान रहती हैं; बल्कि उसकी दिव्यता की अद्भुतता तथा अपरिमेयता और साथ ही उसकी देह के सभी कर्म और भी अधिक विद्यमान रहते हैं। इसलिए, वास्तव में तथा व्यवहारिक रूप से मानवता तथा दिव्यता दोनों मसीह में विद्यमान हैं। यह जरा सा भी निस्सार या अलौकिक नहीं है। वह पृथ्वी पर कार्य करने के मुख्य उद्देश्य के साथ आता है; पृथ्वी पर कार्य करने के लिए सामान्य मानवता से सम्पन्न होना अनिवार्य है; अन्यथा, उसकी दिव्यता की शक्ति चाहे कितनी भी महान हो, उसके मूल कार्य का अच्छा सदुपयोग नहीं किया जा सकता है। यद्यपि उसकी मानवता अत्यंत महत्वपूर्ण है, किन्तु यह उसका सार नहीं है। उसका सार दिव्यता है; इसलिए जिस क्षण वह पृथ्वी पर अपनी सेवकाई करना आरंभ करता है उसी क्षण वह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करना आरंभ कर देता है। उसकी मानवता केवल अपनी देह के सामान्य जीवन को बनाए रखने के लिए है ताकि उसकी दिव्यता देह में सामान्य रूप से कार्य कर सके; यह दिव्यता ही है जो पूरी तरह से उसके कार्य को निर्देशित करती है। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो वह अपनी सेवकाई को पूर्ण कर चुका होगा। जिस बात को मनुष्य को जानना चाहिए वह है परमेश्वर के कार्य की सम्पूर्णता, तथा यह उसके कार्य के माध्यम से है कि वह मनुष्य को उसे जानने में सक्षम बनाता है। अपने कार्य के दौरान वह सर्वथा पूर्णतः अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करता है, जो कि एक ऐसा स्वभाव नहीं है जिसे मानवता द्वारा दूषित किया गया हो, या एक ऐसा प्राणी नहीं है जो विचार एवं मानव व्यवहार द्वारा दूषित किया गया हो। जब समय आता है कि उसकी संपूर्ण सेवकाई का अंत आ जाता है, तब तक वह पहले ही उस स्वभाव को उत्तमता से तथा पूर्णतः अभिव्यक्त कर चुका होगा जिसे उसे अभिव्यक्त करना चाहिए। उसका कार्य किसी मनुष्य के द्वारा निर्देशित नहीं होता है; उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति भी बिलकुल स्वतंत्र है, मन के द्वारा नियंत्रित या विचार के द्वारा प्रक्रिया नहीं की जाती है, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट होती है। इसे किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि यदि परिस्थितियाँ कठोर हों या स्थितियाँ आज्ञा नहीं देतीं हों, तब भी वह उचित समय पर अपने स्वभाव को व्यक्त करने में सक्षम है। वह जो मसीह है मसीह के अस्तित्व को व्यक्त करता है, जबकि जो नहीं हैं, उनके पास मसीह का स्वभाव नहीं है। इसलिए, भले ही सभी उसका विरोध करें या उसके प्रति अवधारणाएँ रखें, मनुष्य की अवधारणाओं के आधार पर कोई भी इस बात से इनकार नहीं सकता है कि जिस स्वभाव को मसीह ने अभिव्यक्त किया वह परमेश्वर का है। वे सब जो सच्चे हृदय से मसीह का अनुसरण करते हैं या आशयपूर्वक मसीह को खोजते हैं यह स्वीकार करेंगे कि अपनी दिव्यता की अभिव्यक्ति के आधार पर वह मसीह है। वे कभी भी उसके ऐसे किसी पहलू के आधार पर मसीह का इनकार नहीं करेंगे जो मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है। यद्यपि मनुष्य अत्यंत मूर्ख है, किन्तु सभी जानते हैं कि यथार्थतः मनुष्य की इच्छा क्या है तथा परमेश्वर की ओर से क्या उत्पन्न होता है। यह मात्र इतना ही है कि बहुत से लोग अपनी स्वयं की अभिलाषाओं के कारण जानबूझकर मसीह का विरोध करते हैं। यदि इस कारण न हो, तो किसी एक भी मनुष्य के पास मसीह के अस्तित्व से इनकार करने का कारण नहीं होगा, क्योंकि मसीह द्वारा व्यक्त दिव्यता वास्तव में अस्तित्व में है, तथा उसके कार्य सबकी नंगी आँखों द्वारा देखा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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