परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" | अंश 157

जब परमेश्वर का कार्य किसी निश्चित बिन्दु पर पहुंच जाता है, और उसका प्रबंधन किसी निश्चित बिन्दु पर पहुंच जाता है, तो जो लोग उसके हृदय के अनुसार हैं वे उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर अपने स्वयं के मापदंडों के अनुसार मनुष्य से अपेक्षाएं करता है, और उसके अनुसार मनुष्य से अपेक्षाएं करता है जिसे हासिल करने के लिए मनुष्य सक्षम है। अपने प्रबंधन के विषय में बात करते समय, वह मनुष्य के लिए मार्ग की ओर संकेत करता है, और मनुष्य को जीवित बचे रहने के लिए एक मार्ग प्रदान करता है। परमेश्वर का प्रबंधन और मनुष्य का रीति व्यवहार दोनों एक ही चरण के कार्य हैं, और उन्हें एक साथ ही क्रियान्वित किया जाता है। परमेश्वर के प्रबंधन की बातचीत मनुष्य के स्वभाव में हुए परिवर्तन को स्पर्श करती है, और उस विषय में मनुष्य द्वारा बात की जानी चाहिए, व मनुष्य के स्वभाव में हुआ परिवर्तन, परमेश्वर के कार्य को स्पर्श करता है; ऐसा कोई समय नहीं है जिसके तहत इन दोनों को अलग किया जा सके। मनुष्य का रीति व्यवहार कदम दर कदम बदल रहा है। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के प्रति परमेश्वर की अपेक्षाएं भी बदल रही हैं, और क्योंकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदल रहा है और प्रगति कर रहा है। यदि मनुष्य का रीति व्यवहार सिद्धान्तों के जाल में उलझा रहता है, तो इससे साबित होता है कि वह परमेश्वर के कार्य एवं मार्गदर्शन से वंचित है; यदि मनुष्य का रीति व्यवहार कभी नहीं बदलता है या गहराई में नहीं जाता है, तो इससे साबित होता है कि मनुष्य के रीति व्यवहार को मनुष्य की इच्छानुसार क्रियान्वित किया गया है, और यह सत्य का अभ्यास नहीं है; यदि मनुष्य के पास कोई मार्ग नहीं है जिस पर वह कदम रखे, तो वह पहले ही से शैतान के हाथों में पड़ चुका है, और उसे शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया गया है, जिसका अर्थ है कि उसे दुष्ट आत्मा के द्वारा नियन्त्रित किया गया है। यदि मनुष्य का रीति व्यवहार अधिक गहराई में नहीं जाता है, तो परमेश्वर का कार्य विकास नहीं करेगा, और यदि परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव नहीं होता है, तो मनुष्य का प्रवेश एक ठहराव की ओर आ जाएगा; ये अपरिहार्य है। परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य के दौरान, यदि मनुष्य को सदैव यहोवा की व्यवस्था में बने रहना पड़ता, तो परमेश्वर का कार्य उन्नति नहीं कर सकता था, और सम्पूर्ण युग को एक अंत तक पहुंचाना बिलकुल भी संभव नहीं होता। यदि मनुष्य हमेशा क्रूस को पकड़े रहता और धीरज एवं विनम्रता का अभ्यास करता रहता, तो परमेश्वर के कार्य के लिए निरन्तर प्रगति करना असंभव होता। छः हजार वर्षों के प्रबंधन को साधारण रूप से ऐसे लोगों के बीच से समाप्त नहीं किया जा सकता है जो सिर्फ व्यवस्था में बने रहते हैं, या सिर्फ क्रूस को थामे रहते हैं और धीरज एवं विनम्रता का अभ्यास करते हैं। इसके बजाए, परमेश्वर के प्रबंधन का सम्पूर्ण कार्य अंतिम दिनों के उन लोगों के बीच में समाप्त होता है, जो परमेश्वर को जानते हैं, और जिन्हें शैतान के चंगुल से छुड़ाकर वापस लाया गया है, और जिन्होंने शैतान के प्रभाव को अपने आपसे पूरी तरह से उतार दिया है। ये परमेश्वर के कार्य की अनिवार्य दिशा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के उन लोगों के रीति व्यवहार प्रचलन से बाहर हो गए हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे वे अभ्यास में लाते हैं वह आज के कार्य से अलग हो गया है। अनुग्रह के युग में, जिसे वे अभ्यास में लाते थे वह सही था, किन्तु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, तो उनका रीति व्यवहार धीरे धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। इसे नए कार्य एवं नए प्रकाश के द्वारा पीछे छोड़ दिया गया है। इसके मूल बुनियाद के आधार पर, पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहराई में बढ़ चुका है। फिर भी वे लोग परमेश्वर के कार्य की मूल अवस्था से अभी भी चिपके हुए हैं, और पुराने रीति व्यवहारों एवं पुराने प्रकाश पर अभी भी अटके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में परमेश्वर का कार्य बड़े रूप में बदल सकता है, अतः क्या 2000 वर्षों के समयक्रम में और अधिक महान रूपान्तरण भी नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या रीति व्यवहार नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ साथ बना नहीं रहा। यह मनुष्य की असफलता है; परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि, आज, ऐसे लोग जिनके पास पवित्र आत्मा का मूल कार्य है वे अभी भी प्रचलन से बाहर हो चुके रीति व्यवहारों में बने रहते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और वे सभी जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं उन्हें भी और अधिक गहराई में बढ़ना और कदम दर कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रूकना नहीं चाहिए। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य के मध्य बने रहेंगे, और वे पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे लोग जो अनाज्ञाकारी हैं केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। यदि मनुष्य का रीति व्यवहार पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलता है, तो मनुष्य के रीति व्यवहार को निश्चित रूप से आज के कार्य से हानि पहुंचता है, और यह निश्चित रूप से आज के कार्य के अनुरूप नहीं है। ऐसे पुराने लोग साधारण तौर पर परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, और वे ऐसे अन्तिम लोग तो बिलकुल भी नहीं बन सकते हैं जो परमेश्वर की गवाही देने के लिए खड़े होंगे। इसके अतिरिक्त, सम्पूर्ण प्रबंधकीय कार्य को ऐसे लोगों के समूह के बीच में समाप्त नहीं किया जा सकता है। क्योंकि वे लोग जिन्होंने एक समय यहोवा की व्यवस्था को थामा था, और वे लोग जिन्होंने क्रूस के दुःख को सहा था, यदि वे अन्तिम दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो जो कुछ भी उन्होंने किया था वह सब बेकार एवं व्यर्थ होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की अत्यंत स्पष्ट अभिव्यक्ति इस स्थान एवं इस समय को सम्मिलित करने में है, और अतीत से चिपके रहना नहीं है। ऐसे लोग जो आज के कार्य के साथ साथ बने नहीं रहते हैं, और जो आज के रीति व्यवहार से अलग हो गए हैं, ये ऐसे लोग हैं जो विरोध करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य की अवहेलना करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका इंकार करना संभव है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य नहीं जानते हैं। मनुष्य के रीति व्यवहार में परिवर्तनों के विषय में, भूतकाल एवं वर्तमान के बीच के रीति व्यवहार की भिन्नताओं के विषय में, पूर्वकालीन युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था इसके विषय में, और इसे आज किस प्रकार किया जाता है इसके विषय में यह सब बातचीत क्यों की गई है। मनुष्य के रीति व्यवहार में ऐसे विभाजन के विषय में हमेशा बात की जाती है क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, और इस प्रकार मनुष्य के रीति व्यवहार से अपेक्षा की जाती है कि वह निरन्तर बदलता रहे। यदि मनुष्य एक ही अवस्था में चिपका रहता है, तो इससे प्रमाणित होता है कि वह परमेश्वर के कार्य एवं नए प्रकाश के साथ साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि प्रबंधन की परमेश्वर की योजना परिवर्तित नहीं हुई है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के बाहर हैं वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किन्तु वास्तव में, उसके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रूक गया था, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तान्तरित हो चुका था, ऐसा समूह जिस पर उसने अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा किया है। क्योंकि ऐसे लोग जो किसी धर्म में हैं वे परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, और वे केवल भूतकाल के पुराने कार्य को ही थामे रहते हैं, इस प्रकार परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और उन लोगों पर अपना कार्य करता है जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो उसके नए कार्य में उसका सहयोग करते हैं, और केवल इसी रीति से ही उसके प्रबंधन को पूरा किया जा सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, तथा मनुष्य का रीति व्यवहार हमेशा से ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है, और मनुष्य हमेशा अभावग्रस्त होता है, कुछ इस तरह कि दोनों अपने शिरोबिन्दु पर पहुंचते हैं, परमेश्वर एवं मनुष्य सम्पूर्ण एकता में हैं। यह परमेश्वर के कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है, और यह परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन का अन्तिम परिणाम है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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