परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप | अंश 245

परमेश्वर का स्वभाव एक ऐसा विषय है, जो सबको बहुत अमूर्त लगता है, और इतना ही नहीं, लोगों के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं है, क्योंकि उसका स्वभाव मनुष्यों के व्यक्तित्व के समान नहीं है। परमेश्वर में भी आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी की भावनाएँ होती हैं, किंतु ये भावनाएँ मनुष्यों की भावनाओं से अलग हैं। परमेश्वर वो है जो वो है और उसके पास वो है जो उसके पास है। जो कुछ वह व्यक्त और प्रकट करता है, वह उसके सार और उसकी पहचान का निरूपण है। उसका स्वरूप, और साथ ही उसका सार और उसकी पहचान ऐसी चीजें हैं, जिन्हें किसी मनुष्य द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। उसके स्वभाव में मानवजाति के प्रति उसका प्रेम, मानवजाति के प्रति उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति उसकी नफरत, और इससे भी बढ़कर, मानवजाति के बारे में उसकी संपूर्ण समझ शामिल है। जबकि मनुष्य का व्यक्तित्व आशावादी, जीवंत या निष्ठुर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव सभी चीजों और जीवित प्राणियों के शासक का, सारी सृष्टि के प्रभु का स्वभाव है। उसका स्वभाव सम्मान, सामर्थ्य, कुलीनता, महानता, और सबसे बढ़कर, सर्वोच्चता को दर्शाता है। उसका स्वभाव अधिकार का प्रतीक है, उस सबका प्रतीक है जो धार्मिक है, उस सबका प्रतीक है जो सुंदर और अच्छा है। इसके अतिरिक्त, यह उस परमेश्वर का प्रतीक है, जिसे अंधकार और किसी शत्रु-बल द्वारा हराया या जीता नहीं जा सकता, साथ ही यह उस परमेश्वर का प्रतीक है जिसे किसी सृजित प्राणी द्वारा ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती (न ही वह ठेस पहुँचाया जाना बरदाश्त करेगा)। उसका स्वभाव सर्वोच्च सामर्थ्य का प्रतीक है। कोई एक या अधिक व्यक्ति उसके कार्य या उसके स्वभाव को बाधित नहीं कर सकते। किंतु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के प्रतीक से अधिक कुछ नहीं है। मनुष्य के पास या उसका अपना कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, अपना अतिक्रमण करने की योग्यता नहीं है, बल्कि अपने सार में वह ऐसा है जो हर प्रकार के व्यक्तियों, घटनाओं और वस्तुओं के नियंत्रण में दुबका रहता है। परमेश्वर का आनंद धार्मिकता और प्रकाश की उपस्थिति और आविर्भाव के कारण है; अंधकार और बुराई के विनाश के कारण है। उसे मानवजाति के लिए प्रकाश और अच्छा जीवन लाने में आनंद आता है; उसका आनंद धार्मिक आनंद है, वह हर सकारात्मक चीज के अस्तित्व का प्रतीक है, और इससे भी बढ़कर, वह मंगल का प्रतीक है। परमेश्वर के क्रोध का कारण उसकी मानवजाति को अन्याय के अस्तित्व और हस्तक्षेप के कारण पहुँचने वाली हानि है; बुराई और अंधकार के अस्तित्व के कारण है, और ऐसी चीजों के अस्तित्व के कारण है जो सत्य को निकाल बाहर करती हैं, और इनसे भी बढ़कर, उन चीजों के अस्तित्व के कारण है जो अच्छे और सुंदर का विरोध करती हैं। उसका क्रोध इस बात का प्रतीक है कि सभी नकारात्मक चीजें अब अस्तित्व में नहीं हैं, और इससे भी बढ़कर, यह उसकी पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है, क्योंकि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता और जिस मानवजाति से वह प्रेम करता है, वह समस्त मानवजाति प्रकाश में नहीं जी सकती। वह मासूम मानवजाति के लिए, ईमानदार किंतु अज्ञानी मनुष्य के लिए, उस मनुष्य के लिए जो अच्छा तो है लेकिन जिसमें अपने विचारों की कमी है, दुःख अनुभव करता है। उसका दुःख उसकी अच्छाई और करुणा का प्रतीक है, सुंदरता और दया का प्रतीक है। उसकी प्रसन्नता बेशक अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों का सच्चा विश्वास प्राप्त करने से आती है। इससे भी बढ़कर, वह सभी शत्रु ताकतों के निष्कासन और विनाश से और मनुष्यों द्वारा अच्छा और शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त करने से उत्पन्न होती है। परमेश्वर की प्रसन्नता मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाय, वह अच्छे फल एकत्र करने का एहसास है, ऐसा एहसास जो आनंद से भी बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता मानवजाति के दुखों से मुक्त होने की प्रतीक है, और वह मानवजाति के प्रकाश के संसार में प्रवेश करने की प्रतीक है। दूसरी ओर, मनुष्यों की समस्त भावनाएँ उनके अपने हितों की खातिर उपजती हैं, न कि धार्मिकता, प्रकाश, या उसके लिए जो कि सुंदर है, और स्वर्ग द्वारा प्रदत्त अनुग्रह के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अंधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे परमेश्वर की इच्छा के लिए अस्तित्व में नहीं होतीं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं होतीं, और इसलिए मनुष्य और परमेश्वर की तुलना नहीं की जा सकती। परमेश्वर हमेशा सर्वोच्च और आदरणीय है, जबकि मनुष्य हमेशा नीच और निकम्मा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर हमेशा मनुष्यों के लिए बलिदान करता रहता है और उनके लिए खुद को समर्पित करता है; जबकि मनुष्य हमेशा लेता है और सिर्फ अपने लिए प्रयास करता है। परमेश्वर सदा से मानवजाति के अस्तित्व के लिए कष्ट उठा रहा है, लेकिन मनुष्य प्रकाश या धार्मिकता की खातिर कभी कोई योगदान नहीं करता। अगर मनुष्य कुछ समय के लिए प्रयास करता भी है, तो भी वह हलके-से झटके का भी सामना नहीं कर सकता, क्योंकि मनुष्य का प्रयास केवल अपने लिए होता है, दूसरों के लिए नहीं। मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर हमेशा निस्स्वार्थ होता है। परमेश्वर उस सबका स्रोत है, जो धार्मिक, अच्छा और सुंदर है, जबकि मनुष्य समस्त गंदगी और बुराई का वारिस और उसे व्यक्त करने वाला है। परमेश्वर कभी अपनी धार्मिकता और सुंदरता का सार नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थिति में धार्मिकता से विश्वासघात करने और परमेश्वर से दूर जाने में पूरी तरह से सक्षम है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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