सत्य का अनुसरण कैसे करें (27) भाग दो

पिछली बार, हमने “देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के साथ बराबरी पर नहीं रखना” विषय के अंतर्गत देहधारी परमेश्वर का “षड्यंत्र नहीं करना” विषय पर संगति की थी। आज हम “दूसरों पर प्रहार न करना” विषय पर संगति करेंगे। दूसरों पर प्रहार न करना देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में मौजूद सार और उसके जीने का एक हिस्सा है और यह उन सिद्धांतों में से एक है जिनका पालन सामान्य मानवता का जमीर और विवेक, लोगों के साथ व्यवहार करते समय करते हैं। यानी, कम से कम, देहधारी परमेश्वर की तुम्हारे साथ शांति से निभ सकती है। तुम चाहे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हो, चाहे तुम बेहतर काबिलियत वाले व्यक्ति हो या खराब काबिलियत वाले, या बेहतर मानवता वाले व्यक्ति हो या खराब मानवता वाले, देहधारी परमेश्वर तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता है और तुम्हारे साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रह सकता है। यदि मुझे पता चलता है कि तुममें कोई दोष या खामी है, या यहाँ तक कि तुम्हारी मानवता के भीतर कोई बुरा सार है, या तुमने कोई बुरा कर्म किया है, तो अवसर मिलने पर या परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर मैं तुम्हारे साथ खुलकर संगति करूँगा। यदि तुम स्वीकार कर सको तो मैं खुलकर तुम्हारी समस्याएँ उजागर करूँगा और तुम्हें उन्हें हल करने का मार्ग बताऊँगा। लेकिन यदि तुम इसे स्वीकार नहीं कर सकते तो शायद मैं उचित समय पर, स्वयं द्वारा खोजी गई किसी वास्तविक जीवन की समस्या का उपयोग करके तुम्हें याद दिलाऊँ, तुम्हें उजागर करूँ और तुम्हें सचेत करूँ, जिससे तुम्हें पता चले कि तुम्हारी समस्या क्या है—वह तुम्हारी मानवता की समस्या है या तुम्हारी काबिलियत की या फिर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की। तुम्हारी समस्या के आधार पर मैं तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हें सचेत करूँगा, जिससे तुम्हें अपनी कमियों का या तुम्हारी समस्या कहाँ है इसका पता चलेगा, और फिर मैं तुम्हें बताऊँगा कि इस प्रकार की समस्या का सार क्या है और जिन लोगों में यह समस्या होती है, उनके प्रति परमेश्वर का रवैया क्या होता है। यदि तुम इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हो और देह से विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो तो मैं तुम्हें अभ्यास का मार्ग बताऊँगा और यह कि इस प्रकार की समस्या से कैसे पेश आना और हल करना है। मैं तुम्हारी समस्याओं और खामियों का इस्तेमाल तुम्हारे खिलाफ या तुम्हारी कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए नहीं करूँगा और फिर समय-समय पर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ाऊँगा या तुम्हारा उपहास नहीं करूँगा या उनके बारे में व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ नहीं करूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा; मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारी मौजूदा समस्याओं के साथ न्यायपूर्ण और वस्तुनिष्ठ ढंग से पेश आऊँगा। यदि मैं तुम्हें कुछ याद दिलाता हूँ, लेकिन तुममें जागरूकता की कमी है और तुम्हें नहीं लगता कि मैंने जो कहा है उसका तुमसे कोई लेना-देना है, या यदि मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारी समस्या की प्रकृति गंभीर है लेकिन तुम इसे स्वीकार नहीं करते और इसे अस्वीकार कर देते हो, इसका प्रतिरोध करते हो और यहाँ तक कि बहस करने और खुद को सही ठहराने के लिए बहाने तक बनाते हो तो मैं स्थिति के अनुसार चीजों का आकलन करूँगा। यदि तुम जो कार्य करते हो, वह बहुत महत्वपूर्ण है और तुम्हारी समस्या ने कलीसिया के कार्य को प्रभावित किया है तो मैं विचार करूँगा कि क्या तुम इस कर्तव्य के लिए उपयुक्त हो। लेकिन यदि तुम केवल एक साधारण विश्वासी हो और तुम जो कर्तव्य करते हो उसका और तुम्हारी अभिव्यक्तियों का कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता और यह केवल तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या है, तो मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हारी मदद करूँगा। यदि तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते, तो मैं तुम्हारे प्रति कोई द्वेष नहीं रखूँगा और बेशक मैं तुम्हें इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर करने का हर संभव प्रयास नहीं करूँगा। मैं इस मामले के साथ बहुत तर्कसंगत ढंग से पेश आऊँगा और मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाना और तुम्हारी मदद करना जारी रखूँगा। यदि मैं देख सका कि तुम्हारी समस्या का सार तुम्हारे या दूसरों के लिए नकारात्मक परिणाम लाएगा, तो अपने जमीर से प्रेरित होकर मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हारी मदद करूँगा, न कि मैं बस तुम्हें खुद का मजाक बनवाते हुए देखूँगा। मैं यह कहते हुए यूँ ही तुम्हारा निरूपण भी नहीं करूँगा, “तुमसे कोई आशा नहीं रखी जा सकती, परमेश्वर तुमसे घृणा करता है और तुम्हारा नाश होने वाला है,” और मैं अपना मुँह खोलकर यह कहते हुए तुम्हें शाप तो बिल्कुल नहीं दूँगा, “तुम दानव, तुम शैतान के वंशज, तुम जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो।” मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। चूँकि मेरी पहचान विशेष है, इसलिए मैं अक्सर खुद को बहुत तर्कसंगत ढंग से संयमित करता हूँ : मैं किसी के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ और उससे कैसे बात करता हूँ, यह इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि वह कौन है—यह एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, मुझे लापरवाही से किसी का निरूपण नहीं करना चाहिए। और दूसरी बात, अपनी आवाज के लहजे, शब्दों के चयन या कहने के तरीके से मुझे दूसरे व्यक्ति को यह महसूस कराना चाहिए कि मैं जो कहता और करता हूँ वह सद्भावना से है और द्वेष से मुक्त है। जहाँ तक मेरे इरादे की बात है, मैं ईमानदारी से तुम्हारी मदद करने की कोशिश कर रहा हूँ; मैं तुम्हें लंबे रास्ते पर जाते हुए नहीं देखना चाहता, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि तुम कमजोर पड़ो, हिचकिचाओ और फिर चीजों का सामना करने पर अपनी दिशा खो दो या भटक जाओ। इसके बजाय, मुझे उम्मीद है कि मेरे द्वारा संगति और तुम्हारी मदद कर चुकने के बाद तुम खुद को सही ढंग से देख सको, नकारात्मकता में पड़ने से बच सको, अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपनी समस्याओं की सटीक समझ रख सको और अपने साथ सही ढंग से व्यवहार कर सको और फिर परमेश्वर के वचनों से अभ्यास का मार्ग खोज सको और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपनी समस्याओं को थोड़ा-थोड़ा करके हल कर सको, साथ ही दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रह सको और उनकी मदद कर सको। यानी, मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता हूँ कि लोगों के साथ मिलते-जुलते समय मैं जो कहता और करता हूँ, वह उन्हें परमेश्वर के इरादे समझने में सक्षम बना सके, यह जानने में सक्षम बना सके कि परमेश्वर लोगों से किन सिद्धांतों की अपेक्षा करता है, लोगों की विभिन्न समस्याओं के प्रति परमेश्वर के रवैये और दृष्टिकोण क्या हैं, परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए लोगों को इन समस्याओं को कैसे सँभालना चाहिए और उन्हें अपनी समस्याएँ हल करने के लिए सत्य कैसे खोजना चाहिए। मेरा मकसद लोगों की मदद करना है, ताकि वे सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटते समय और जब उनके भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं तब इन समस्याओं को सही ढंग से लें और उन्हें हल करें, जिसका अंतिम परिणाम यह होता है कि वे सत्य और परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। बेशक, इन वर्षों में कार्य करने और बोलने के दौरान मैं जिन विभिन्न प्रकार के लोगों के संपर्क में आया हूँ, उनके आधार पर, मैंने एक तथ्य पहचाना है : चाहे मैं लोगों के साथ कितनी भी शांति से बोलूँ और बातचीत करूँ, मेरे मन में कितनी भी सद्भावना हो या किसी की मदद करना चाहने की मेरी कैसी भी मानसिकता हो, बहुत कम लोग यह महसूस कर सकते या समझ सकते हैं कि मैं क्या कहता हूँ और क्यों कहता हूँ, और फिर, मैंने जो वचन बोले हैं और जिस विषयवस्तु पर मैंने उनके साथ संगति की है, उसके माध्यम से प्रगति कर सकते हैं या अपने वास्तविक जीवन में वास्तविक, व्यावहारिक मदद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन लोग अंततः मेरे साथ बातचीत और मेल-जोल करने के माध्यम से चाहे कितना भी बटोरें और प्राप्त करें, लोगों के साथ मिलने-जुलने के मेरे सिद्धांत नहीं बदलते। कुछ लोग कहते हैं, “तो तुम अपना तरीका क्यों नहीं बदलते?” मुझे बताओ, मैं अपना तरीका क्यों नहीं बदलता? क्या मुझे अपना तरीका बदलना चाहिए? लोगों से बात करते समय क्या मुझे किसी ऊँचे स्थान से बोलना चाहिए, मानो मूसा को दस आज्ञाओं की घोषणा कर रहा हूँ? क्या मेरी आवाज आकाश में गड़गड़ाहट की तरह होनी चाहिए या क्या मुझे किसी प्रकार का लहजा अपनाना चाहिए, ताकि लोग डर जाएँ, मेरा कहा आसानी से याद रखें और अभ्यास करने के इच्छुक और समर्पण करने में सक्षम हों? या लोगों के साथ संवाद करते समय यदि मैं हमेशा उनसे शाप देने और उनका निरूपण करने के लहजे में बात करूँ, तो क्या लोग तब अपना सबक सीखेंगे? क्या वे तब इसे स्वीकार कर पाएँगे? (नहीं।) क्या तुम लोग जानते हो कि वे ऐसा क्यों नहीं कर पाएँगे? बहुत पहले जब यहोवा ने मूसा के माध्यम से दस आज्ञाएँ जारी की थीं, तब इस्राएलियों ने आकाश में गड़गड़ाहट की आवाज सुनी थी और बिजली देखी थी—क्या इससे वे यहोवा के खिलाफ विद्रोह करने और उसकी आलोचना करने से रुक गए थे? बोलने के लिए तुम चाहे किसी भी तरीके का उपयोग करो, तुम्हारे वचनों की विषयवस्तु कुछ भी हो या बोलने में तुम्हारा उद्देश्य कुछ भी हो, जहाँ तक प्राप्तकर्ता का संबंध है, यदि वह व्यक्तिपरक रूप से सत्य स्वीकार करने और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने की इच्छा और आवश्यकता रखता है—यदि उसके हृदय में यह आवश्यकता है—तो तुम बोलने के लिए चाहे किसी भी तरीके का उपयोग करो, वह इसे स्वीकार कर पाएगा और इसे आसानी से याद रखेगा। लेकिन यदि उसके हृदय में यह आवश्यकता नहीं है, तो भले ही वह जानता हो कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, फिर भी वह तुम्हारी किसी भी बात को स्वीकार नहीं करेगा या उसे दिल से नहीं अपनाएगा, फिर चाहे वह कितनी भी सही हो या उसका स्रोत और मकसद कितना भी सही हो। इसलिए, मेरे परिप्रेक्ष्य से, ये चीजें करने का मेरा सिद्धांत यह है कि मैं किसी के साथ भी सामान्य रूप से संगति करता हूँ। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि व्यक्ति मुझसे क्या प्राप्त कर सकता है और क्या बटोर सकता है और क्या वह सत्य प्राप्त कर सकता है, तो कुंजी इस बात में निहित है कि क्या वह सत्य से प्रेम करता है, और इस बात में भी कि क्या उसमें सामान्य मानवता की आवश्यकताएँ हैं। यदि वह स्वाभाविक रूप से सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, तो जब मैं उसके साथ इस तरह सामान्य रूप से मिलता-जुलता और बात करता हूँ, तो वह इस बात पर विचार कर पाएगा कि मैंने क्या कहा, इन वचनों के पीछे के सिद्धांत क्या हैं और मैंने उसे क्या करने का अनुदेश दिया; वह बाद में इन चीजों पर विचार करेगा, इन्हें ध्यान में रखेगा और फिर इन वचनों के अनुसार अभ्यास करेगा। यदि इस व्यक्ति को अपनी मानवता में सकारात्मक चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है, तो मैं चाहे कुछ भी कहूँ, वह बेकार है। भले ही मैं उसकी काट-छाँट करूँ, उसे अनुशासित करूँ या यहाँ तक कि उसे ताड़ना दूँ, इससे कुछ नहीं होता। ताड़ना दिए जाने के बाद वह बाहर से शिष्ट और आज्ञाकारी लग सकता है, लेकिन चूँकि उसके हृदय में सकारात्मक चीजों की कोई आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इस घटना के बाद वह जल्दी ही वैसा ही हो जाएगा जैसा वह पहले था, उसके हृदय में सकारात्मक वचनों, सकारात्मक चीजों या सत्य सिद्धांतों का कोई निशान नहीं होगा। इसलिए, ऐसे लोगों के लिए, तुम चाहे कितना भी कहो, तुम उन्हें बदल नहीं सकते ताकि वे सामान्य मानवता की आवश्यकताएँ विकसित कर सकें। यह एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, दूसरों पर प्रहार न करना मूल रूप से इस बात के लिए मेरे सिद्धांतों में से एक है कि मैं तुम लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ। तुम चाहे जिस भी प्रकार के व्यक्ति हो, चाहे तुम सत्य का अनुसरण करते हो या नहीं, यदि मैं तुम्हारी कोई समस्या उजागर करता भी हूँ, तो यह केवल इस समस्या के सार का गहन-विश्लेषण करने के लिए होता है ताकि तुम इसे पूरी तरह से समझ और जान सको, भविष्य में अपना कर्तव्य निभाने के दौरान प्रगति कर सको, वही गलतियाँ करना बंद कर सको और कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा डालना या उसे नुकसान पहुँचाना बंद कर सको—यह तुम्हारी मदद करने के लिए है, तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी करने या तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ खोजने के लिए नहीं। इसलिए, यदि मैं अतीत में हुई चीजों को सामने लाता भी हूँ, तो यह तुम्हारा उत्साह कम करने या तुम्हें चोट पहुँचाने के लिए नहीं होता, बल्कि तुम्हें अपनी समस्याओं का सार जानने, सत्य के एक निश्चित पहलू की गहन समझ प्राप्त करने, खुद को जानने, परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना जानने और अंततः परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार सटीक रूप से अभ्यास करने में सक्षम बनाने के लिए होता है। क्या तुम लोगों को इस तथ्य की कोई समझ है कि देहधारी परमेश्वर कभी दूसरों पर प्रहार नहीं करता? (हमें कुछ समझ है।)

दूसरों पर प्रहार न करने के अलावा देहधारी परमेश्वर समय-समय पर लोगों को प्रोत्साहित भी करता है। कुछ लोगों का आध्यात्मिक कद अपरिपक्व होता है और वे नाजुक होते हैं; अपनी मानवता के मामले में वे बहुत मजबूत नहीं होते, उनमें काम करने में दृढ़ता की कमी होती है या वे अक्सर सभी प्रकार की चीजों से बँधे होते हैं, वे नहीं जानते कि सत्य कैसे खोजा जाए और वे अपने कर्तव्य सामान्य रूप से नहीं कर सकते। ऐसी परिस्थितियों में मैं उन्हें कुछ प्रोत्साहन दूँगा ताकि वे आगे का मार्ग देख सकें, जिससे वे अब खुद को किसी मामले में फँसा हुआ और उससे बाधित नहीं पाएँगे। जब तुम प्रोत्साहन के ये वचन सुनते हो, तो तुम्हें लग सकता है कि मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ वह तुम्हारी पहुँच से बाहर है, लेकिन मेरा मकसद तुम्हें तुम्हारे विचारों और धारणाओं द्वारा लाया गया बोझ त्यागने में मदद करना है, ताकि तुम अब उन चीजों से बाधित न रहो और उन्हें पीछे छोड़ सको और फिर परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए अपनी पूरी ताकत अपने कर्तव्य में लगा सको। कुछ लोग पहले विफलता के मार्गों पर चल चुके हैं, या ऐसी चीजें कर चुके हैं जो परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं, या उनमें कुछ स्पष्ट विद्रोही व्यवहार रहे हैं, और कुछ लोगों ने तो अपने कार्यों से विघ्न-बाधाएँ भी पैदा की हैं जिससे कलीसिया के कार्य को कुछ नुकसान हुआ है। यदि मैं अपनी संगति में कभी-कभार इन चीजों का उल्लेख करता हूँ तो मेरा उद्देश्य तुम्हारा उत्साह कम करना नहीं होता, न ही मैं कोई द्वेष रख रहा हूँ; बल्कि, मेरा उद्देश्य तुम्हारे मामले के तथ्यों का एक उदाहरण के रूप में उपयोग करना है, ताकि दूसरों को वही गलतियाँ न करने की याद दिलाई जा सके—मेरा उद्देश्य सत्य के एक पहलू पर स्पष्ट रूप से संगति करना है, ताकि अधिक लोग इससे सबक ले सकें और अधिक लोग इससे यह देख सकें कि तुम जिस मार्ग पर चले वह गलत है और वह कैसे गलत है, और फिर अधिक लोगों को उसी मार्ग पर न चलने की चेतावनी देना और यह याद दिलाना है कि कार्य करते समय उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। विशेष रूप से लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों पर संगति करते और उन्हें उजागर करते समय मैं जो उदाहरण देता हूँ या जिस विशिष्ट दशा पर मैं संगति करता हूँ, उसमें कई लोग शामिल हो सकते हैं या कुछ विशिष्ट लोग और चीजें शामिल हो सकती हैं। इन चीजों पर संगति करने का उद्देश्य तुम लोगों को बेनकाब करने और शर्मिंदा करने का अवसर खोजना नहीं है; जहाँ तक मेरे द्वारा सामने लाए गए तथ्यों या मेरे द्वारा उजागर की गई दशाओं की बात है, उनका केवल उस विषय और सत्य के उस पहलू से संबंध होता है, जिस पर हम संगति कर रहे हैं। हो सकता है कि मैं तुम्हें व्यक्तिगत रूप से न जानता हूँ और मुझे पता न हो कि तुम्हारे साथ ऐसा कुछ हुआ है, लेकिन मैंने जो उदाहरण दिया या जो दशा मैंने उजागर की, वह संयोग से तुममें घटित हुई है और तुम अपनी स्थिति उससे पहचानते हो। जब कुछ लोग अपनी स्थिति ऐसी चीजों से पहचानते हैं, तब वे सोचते हैं, “क्या किसी ने मेरी चुगली की? तुम्हें कैसे पता कि मेरे साथ यह चीज हुई, और मुझे यह समस्या थी और मैं इस दशा में था?” मैं कहता हूँ कि मुझे वास्तव में नहीं पता कि किसी विशेष व्यक्ति के साथ इस तरह की चीज हुई या वह इस तरह की दशा में था, लेकिन मैं जिन सत्यों पर संगति करता हूँ उनमें—या मैं जो समस्याएँ उजागर करता हूँ उनमें—यह दशा, ऐसी समस्या या इस विशिष्ट प्रकार का उदाहरण शामिल होता है। चूँकि इस प्रकार की दशा और इस विशिष्ट प्रकार का उदाहरण प्रतिनिधिक हैं और वे लोगों को कुछ प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को जानने और एक निश्चित प्रकार के व्यक्ति का सार पर्याप्त रूप से जानने दे सकते हैं, इसलिए उदाहरण देते समय मैं कलीसिया में हुई कुछ विशिष्ट घटनाओं का हवाला देने या कुछ विशिष्ट दशाओं पर चर्चा करने से नहीं बच सकता। ऐसे में, यह अपरिहार्य है कि कुछ लोग, घटनाएँ और चीजें शामिल होंगी। लेकिन मेरा किन्हीं निश्चित लोगों पर प्रहार करने का ज़रा-सा भी इरादा नहीं है; मेरा लक्ष्य केवल लोगों को याद दिलाना और नसीहत करना है, जिससे परमेश्वर के अधिकांश चुने हुए लोगों को लाभ हो सके। जब मैं उपदेश देते और संगति करते समय कुछ उदाहरण देता हूँ, तो यह बिल्कुल भी किसी विशेष व्यक्ति पर निर्देशित नहीं होता; यह केवल सत्य पर संगति करने और किसी निश्चित समस्या का सार उजागर करने के लिए होता है, ताकि तुम लोग समस्या के सार के बारे में अधिक स्पष्ट हो सको और उसे बेहतर ढंग से समझ सको। समस्या का सार समझने के माध्यम से, चाहे खुद को इस समस्या वाले व्यक्ति के रूप में पहचानकर या इसमें शामिल लोगों, घटनाओं और चीजों की असलियत जानकर, तुम संबंधित सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकते हो, अपने भीतर की समस्याएँ हल करने के लिए उनका उपयोग कर सकते हो और सत्य वास्तविकता में प्रवेश प्राप्त कर सकते हो। मैं चाहे किसी भी प्रकार की समस्या पर संगति करूँ, चाहे वह ऐसी समस्या हो जो तुम्हारे भीतर मौजूद हो या ऐसी समस्या हो जो दूसरों के भीतर मौजूद हो, मैं ऐसा केवल सत्य पर संगति करने और किसी निश्चित प्रकार की समस्या का सार और वास्तविकता बेहतर ढंग से समझने में तुम लोगों की मदद करने के लिए करता हूँ; यह किसी विशिष्ट व्यक्ति या किसी विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति पर निर्देशित नहीं होता। बेशक, यह भी संभव है कि किसी समस्या पर संगति करते समय मैं जो उदाहरण देता हूँ उसका मूल रूप कुछ ऐसा हो जो तुम्हारे साथ हुआ हो और मैंने एक उदाहरण देने के लिए इस मामले का उपयोग किया हो। लेकिन यह उदाहरण देने में मैं किसी ऐसी समस्या का खुलासा नहीं कर रहा होता जो केवल तुम्हारी हो; बल्कि, तुम्हारी समस्या हर किसी में—पूरी मानवजाति में—पाई जाने वाली समस्याओं की प्रतिनिधि होती है। बेशक, समस्या का खुलासा करने का उद्देश्य केवल समस्या हल करना होता है, तुम पर प्रहार करना नहीं। इसलिए, जब तुम इस प्रकार की स्थिति का सामना करते हो, तब तुम्हें उसे सही तरीके से लेना चाहिए; यह मेरा काम है। मेरा काम, एक लिहाज से, तुम लोगों को सभी सत्य, सत्य के सभी पहलू प्रदान करना है, और दूसरे लिहाज से, यह तुम लोगों के भीतर की समस्याएँ, भ्रष्ट मानवजाति की विभिन्न दशाएँ और उसके भीतर के सभी भ्रष्ट स्वभाव, साथ ही भ्रष्ट स्वभावों से जुड़ी समस्याएँ उजागर करना है। यह मेरा काम है। चूँकि मेरे काम में सत्य प्रदान करने के अलावा भ्रष्ट मानवजाति की भ्रष्टता की वास्तविकता उजागर करना भी शामिल है, इसलिए जब इस कार्य की बात आती है, तब मेरे इरादे अच्छे होते हैं। मैं तुम लोगों की मदद और समर्थन करना चाहता हूँ, तुम्हें याद दिलाना और तुम लोगों को पोषण प्रदान करना चाहता हूँ, ताकि तुम लोग समस्या का सार स्पष्ट रूप से देख सको और अपने भ्रष्ट स्वभावों से विद्रोह करने में सक्षम हो सको, जिससे तुम अब अपने भ्रष्ट स्वभावों के भीतर न रहो, बल्कि खुद को बदलने, अपने हाथों की बुराई त्यागने, परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो सको और सत्य के प्रति समर्पण और परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सको।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें