सत्य का अनुसरण कैसे करें (26) भाग तीन
चाहे मैं गपशप कर रहा होऊँ या औपचारिक रूप से संगति कर रहा होऊँ और उपदेश दे रहा होऊँ, मैं जो भी वचन बोलता हूँ, जिस भी मामले के बारे में बात करता हूँ और सत्य के जिस भी पहलू पर संगति करता हूँ उसका उद्देश्य तुम्हें अपनी भ्रष्ट अवस्थाओं को जानने, अपने दोषों, कमियों, अपर्याप्तताओं और कठिनाइयों को पहचानने और, सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अपने भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न पृष्ठभूमियों और परिवेशों में अपनी भ्रष्टता के प्रकाशनों को जानने में सक्षम बनाना है। जैसे ही तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव को जान जाओगे, तुम्हें अपनी गहरी समझ हो जाएगी, तुम अपनी वास्तविक क्षमता और सीमाओं को पहचान जाओगे और तुम कुछ अधिक विवेकपूर्ण बन जाओगे। और तुम परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना करोगे और अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के प्रासंगिक सिद्धांतों और अभ्यास के मार्गों को ढूँढ़ोगे, फिर चाहे यह उन भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना हो जो तुम दैनिक जीवन में प्रकट करते हो या मानवता की अपनी अपर्याप्तताओं का। धीरे-धीरे तुम इन भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न शैतानी विचारों और दृष्टिकोणों को, जिनसे परमेश्वर नफरत करता है, छोड़ दोगे और सत्य स्वीकारकर चीजों के बारे में अपने नजरियों में और अपने जीवन स्वभावों में सच्चे बदलाव प्राप्त करोगे। यही वह एकमात्र मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के अनुसार है। मैं जो वचन बोलता हूँ, चाहे दैनिक जीवन में तुम्हारे साथ गपशप करते हुए या औपचारिक रूप से संगति करते हुए और उपदेश देते हुए, इन सभी वचनों में हर वचन तुम लोगों की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बोला जाता है। मैं ये वचन इसलिए बोलता हूँ क्योंकि मैंने तुम लोगों की जरूरतें देखी हैं। हालाँकि मेरे द्वारा प्रस्तुत तथ्यों में थोड़ा-बहुत संपादन किया गया हो, फिर भी ये उदाहरण तुम्हारी भ्रष्टता के खुलासों और तुम्हारे कार्यों के तथ्यों के आधार पर चुने गए प्रतिनिधि उदाहरण हैं। इन तथ्यों और उदाहरणों का उपयोग करके मैं मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों और प्रकृति सार को उजागर करता हूँ ताकि लोग आत्म-चिंतन कर सकें, और यह अच्छे नतीजे प्रदान करेगा। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस विषय पर संगति करता हूँ, पहली बात, इसमें कोई जाल नहीं है; दूसरी बात, इसमें कोई चालबाजी नहीं है; और तीसरी बात, इसमें कोई परखना नहीं है। यह सब तुम लोगों को परमेश्वर के इरादों और उसकी अपेक्षाओं को बेहतर ढंग से समझने, सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों और चीजों को देखने तथा सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने और कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए है, ताकि अंततः तुम परमेश्वर के सामने आ सको और उसके प्रति समर्पण तथा भय रख सको। ये सभी तथ्य हैं। इसलिए, जब मैं दैनिक जीवन में होने वाले कुछ मामलों पर तुम्हारे साथ संवाद या गपशप करता हूँ या औपचारिक कार्य-संबंधी आदान-प्रदान और पूछताछ करता हूँ तब चाहे कितने भी वर्ष बीत जाएँ, जब तुम पीछे मुड़कर देखोगे तब क्या तुम्हें मेरे वचनों में कोई चालबाजी या जाल दिखाई देगा? (नहीं।) क्या इसमें तुम लोगों का शोषण करने का कोई इरादा है? क्या इसमें तुमसे जबरन वसूली करने का कोई इरादा है? (नहीं।) क्या तुम्हें यकीन है? (बिल्कुल।) उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति किसी खेत में पशुपालन के लिए जिम्मेदार है। मैं उससे पूछता हूँ कि मुर्गी को एक अंडा देने में कितने दिन लगते हैं और वह सोचने लगता है : “तुम यह पूछकर कहना क्या चाहते हो? क्या तुम यह देखने का प्रयास कर रहे हो कि मैं मुर्गियों को ठीक से दाना खिला रहा हूँ या नहीं? तो फिर मुझे उचित ढंग से कैसे उत्तर देना चाहिए? अगर मैंने कहा कि वह दिन में एक अंडा देती है तो यह वास्तव में साध्य नहीं है; यह झूठ बोलना होगा। अगर मैंने कहा कि वह हर दो-तीन दिनों में एक अंडा देती है तो क्या तुम सोचोगे कि मैंने मुर्गियों को ठीक से नहीं खिलाया है और उन्हें पौष्टिक दाना नहीं दिया है? तो फिर मुझे कैसे उचित ढंग से उत्तर देना चाहिए?” वह अपने दिल में सोच-विचार करता रहता है और कभी उत्तर नहीं देता। वास्तव में यह पूछने के पीछे मेरा कोई और इरादा नहीं है; मैं बस इस बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ कि मुर्गियों को कैसे पाला जा रहा है। लेकिन जैसे ही मैं पूछता हूँ, वह इसका बहुत ही ज्यादा मतलब निकाल लेता है और यह अनुमान लगाने का प्रयास करता रहता है कि यह पूछकर मैं क्या कहना चाहता हूँ। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों से निपटना मुश्किल है? क्या ऐसे लोगों के संपर्क में रहते हुए सामान्य रूप से संवाद करना भी संभव है? संवाद करना असंभव हो जाता है। मेरी एक आदत है : मुझे इधर-उधर घूमकर चीजों का जायजा लेना हमेशा अच्छा लगता है। कभी-कभी मुझे कुछ समस्याओं का पता चल जाता है। अगर यह पर्यावरणीय स्वच्छता का मुद्दा है तो उसकी साफ-सफाई की जानी चाहिए। अगर यह कर्मचारियों से संबंधित मुद्दा है तो समायोजन किए जाने चाहिए। अगर यह पेशेवर कौशल से जुड़ा मुद्दा है तो हमें सलाह लेनी चाहिए और सीखना चाहिए। जब समस्याओं का पता चलता है तब उन्हें ठीक किया जाना चाहिए। हर रोज की गपशप के दौरान कई समस्याओं का अनजाने में ही पता चला है और उन्हें हल किया जा चुका है; कुछ वास्तविक समस्याओं को आसानी से हल कर दिया गया। इसलिए, लोगों को मेरे संपर्क में आते समय और मेरे साथ मेलजोल रखते समय इतना घबराने की कोई जरूरत नहीं है। बहुत-सी समस्याएँ लोगों के संपर्क में रहने से पता चलती हैं और आसानी से हल कर दी जाती हैं। लोगों के संपर्क में रहना और उनसे गपशप करना बहुत जरूरी है; यह सिर्फ स्थिति को समझने और समस्याओं को ढूँढ़ निकालने के बारे में नहीं है, बल्कि साथ ही, समस्याओं को हल करने के बारे में भी है। क्या यह लाभ नहीं है? (हाँ।) जब मैं लोगों से गपशप करता हूँ तब कुछ लोग सच्चाई से बोलते हैं, जबकि दूसरे लोग बहुत पेचीदा तरीके से सोचते हैं और सच्चाई से बोलने की हिम्मत नहीं करते, वे हमेशा सोचते रहते हैं कि मेरे शब्दों के छिपे हुए अर्थ तो नहीं हैं या मैं किसी के खिलाफ षड्यंत्र करने का प्रयास तो नहीं कर रहा हूँ। इसलिए, जैसे ही मैं उनसे कुछ पूछता हूँ, वे घबरा जाते हैं और उनके माथे से पसीना छूटने लगता है। मैं कहता हूँ, “गर्मी तो नहीं है, फिर तुम्हें पसीना क्यों आ रहा है?” वे कहते हैं, “हो सकता है कि तुम्हें गर्मी न लग रही हो, पर मुझे तो लग रही है! तुम्हारी बातों ने मुझे इतना डरा दिया कि मेरा दिल सीने से उछलकर लगभग बाहर ही आ गया। अब मेरी हथेलियाँ और तलवे पसीने से तर हैं, मेरा दिल जोरों से धड़क रहा है और मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” मैं कहता हूँ, “तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है। मैं तो सिर्फ यूँ ही बात कर रहा हूँ, सिर्फ गपशप कर रहा हूँ। अगर सच में कोई समस्या है तो हम उसे आसानी से हल कर लेंगे। मुझे इतना डरावना मत समझो, मानो किसी भी समस्या का पता चलने पर मैं तुम्हारे पूरे कुनबे को फाँसी पर लटका दूँगा। मैं लोगों का ‘समाधान’ नहीं करता; मैं समस्याओं को हल करता हूँ। समस्याओं को हल करना ही कुंजी है।” तुममें किस तरह की आस्था होनी चाहिए? एक तरफ मैं निश्चित रूप से सिद्धांतों के अनुसार, पूरी तरह से न्यायसंगत रूप से कार्य करता हूँ। मैं भावनाओं में बहकर, हठधर्मिता या मनमानी से कार्य नहीं करूँगा : ऐसा नहीं होगा कि तुम मुझे अप्रिय लगोगे, फिर मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालूँगा, तुममें नुक्स निकालूँगा या कमियाँ ढूँढ़ूँगा, और फिर तुम्हें बाहर निकाल दूँगा और कार्य करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ लूँगा जो मुझे प्रिय लगता हो। दूसरी तरफ, मैं सभी से वास्तविक स्थिति और वास्तविक समस्या के आधार पर निपटता हूँ; इसके लिए कुछ सिद्धांत हैं। लोगों को गलतियाँ करने, बेवकूफ, कमजोर और नकारात्मक होने की अनुमति है। लेकिन एक चीज की अनुमति नहीं है : अगर तुम परेशान करने वाले व्यक्ति हो और जानबूझकर कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते हो और बाधा डालते हो तो तुम्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव नहीं करते हो, अगर तुम हमेशा परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हो तो कलीसिया को तुम्हारा कर्तव्य करने के लिए तुम्हारी जरूरत नहीं है; परमेश्वर के घर को तुम्हारी जगह लेने के लिए एक उपयुक्त व्यक्ति ढूँढ़ना पड़ेगा। यह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है। मैं समस्याओं को कैसे सुलझाता हूँ, मैं मुद्दों को कैसे सँभालता हूँ, मैं लोगों से कैसे निपटता हूँ—यह सब सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। तुम्हें इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है कि अगर मुझे तुममें किसी समस्या का पता चला तो मैं तुमसे निपटूँगा; यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह समस्या क्या है और समस्या की प्रकृति के अनुसार स्थिति को सँभाला जाएगा। अगर तुम्हारी समस्या की प्रकृति बहुत गंभीर नहीं है, अगर तुमने इसे जानबूझकर नहीं बल्कि क्षणिक चूक या बेवकूफी के कारण उत्पन्न किया है तो फिर इसे सत्य पर संगति के जरिए हल किया जाएगा। सबक सीखो और यह गलती दोबारा मत करो। कभी-कभी ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों में ज्ञान और अनुभव की कमी होती है और वे कुछ पेशेवर कौशल नहीं समझते हैं; ऐसे में जल्दी से पेशेवर कौशल सीख लो और आलसी मत बनो। लेकिन अगर यह सोचा-समझा और इरादतन हो, अगर तुम इस कर्तव्य को करने के अनिच्छुक हो और यहाँ तक कि जानबूझकर परमेश्वर के घर की संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हो, तो इस मामले को गंभीरता से सँभाला जाना चाहिए। जिन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा और जिन्हें भेज दिया जाना चाहिए उन्हें भेज दिया जाएगा; अपना निपटान किए जाने से डरना निरर्थक है। अगर तुम लोगों में यह आस्था है, अगर तुम लोग यह मानते हो कि परमेश्वर धार्मिक है और परमेश्वर हर व्यक्ति के साथ निष्पक्ष रूप से पेश आएगा, तो जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ और तुम लोगों के साथ मामलों को सँभालता हूँ तब तुम लोग और ज्यादा सहज महसूस करोगे। जब मैं तुमसे बात करता हूँ या कार्य या पेशेवर मामलों पर चर्चा करता हूँ तब तुम्हें आश्वस्त रहना चाहिए, तुम्हें यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर किसी के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करेगा और न ही वह तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करेगा; तुम आश्वस्त रह सकते हो। अगर तुममें इतनी भी आस्था नहीं है, अगर तुम यह नहीं मानते कि परमेश्वर दयालु और धार्मिक है तो जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करते हो, मसीह का अनुसरण करते हो—तब तुम्हारी आस्था कहाँ है? तुम उसके साथ स्पष्टवादी होने में सफल कैसे हो सकते हो? अगर तुम हर मोड़ पर उससे सतर्क रहते हो, उसके बारे में अनुमान लगाते हो, उस पर संदेह करते हो और उसकी पड़ताल करते हो तो तुम्हारी उसमें सच्ची आस्था नहीं है। अगर तुम्हें इस व्यक्ति पर सच्चा भरोसा नहीं है, उसमें सच्ची आस्था नहीं है तो तुम मेरे वचनों पर किस हद तक विश्वास कर सकते हो? क्या ऐसा कोई कथन है जिस पर तुम सही मायने में विश्वास कर सकते हो, जिसे सही मायने में स्वीकार सकते हो? लगभग कोई भी नहीं है, है ना? (हाँ।)
एक बार मैं किसी कलीसिया में यह देखने गया कि वहाँ चीजें किस हाल में हैं। जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तब सबसे पहले मैंने सबका अभिवादन किया। कुछ लोग मेरे पास आए, तुरंत मुझे बैठने के लिए एक कुर्सी दी और फिर कहा कि वे किसी बात पर चर्चा कर रहे हैं। जब वे बातें कर रहे थे तब अचानक मेरा ध्यान इस चीज पर गया कि कुछ क्षण पहले कमरे में चार-पाँच लोग थे, लेकिन अब सिर्फ दो ही बचे थे। मैंने सोचा कि शायद वे अपने बालों में कंघी करने और हाथ-मुँह धोने वापस अपने कमरों में चले गए होंगे और थोड़ी देर में बाहर आ जाएँगे, मैं वहाँ काफी देर तक ठहरा रहा, लेकिन वे बाहर नहीं आए। तब मुझे समझ आया : उन्होंने मेरा स्वागत नहीं किया; मैं असुविधाजनक समय पर आ गया था। मैं बिन बुलाया मेहमान था। मेरे आने से उन्होंने बाधित और असहज महसूस किया। उन्होंने सोचा, “क्या तुम्हारे आने का कोई उद्देश्य है?” उन्हें जाल में फँसने का डर था, छले जाने का डर था, किसी चालबाजी का डर था, इसलिए उन्होंने मुझसे आमने-सामने मिलने से इनकार कर दिया और मुझसे संवाद या बातचीत करने से इनकार कर दिया। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है और न ही मैंने इसमें कोई नमक-मिर्च लगाया है। मैं कोई कहानी नहीं सुना रहा हूँ—यह सच में हुआ था। शायद जब मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया तब जाकर उन्होंने राहत की साँस ली और कहा, “आखिर वह चला ही गया! अरे, डर के मारे मेरी तो जान ही निकल गई थी!” मैंने मन ही मन सोचा, क्या मुझमें इतना “जादू” है कि मैं लोगों को इस हद तक डरा सकता हूँ? मुझे बताओ, जब लोग ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं तब यह किस समस्या का संकेत देता है? मैंने सचमुच लोगों को परमेश्वर में इस तरह विश्वास रखते कभी नहीं देखा। इस प्रकार का व्यक्ति अँधेरे कोनों में रहना पसंद करता है; वह प्रकाश में रहना पसंद नहीं करता और वह खुले और ईमानदार ढंग से रहना पसंद नहीं करता। मुझे बताओ, जब मैं तुम लोगों के संपर्क में होता हूँ तब क्या तुम लोग अटपटापन और घबराहट महसूस करते हो, क्या तुम लोग मेरे साथ संवाद नहीं करना चाहते? या क्या तुम मेरे संपर्क में आने के इच्छुक होते हो, कुछ सत्य प्राप्त करना चाहते हो और अगर इससे तुम्हें थोड़ी घबराहट हो तो भी तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होती? तुम लोगों के मन की अवस्था क्या होती है? (वैसे तो हमें थोड़ी घबराहट होती है, लेकिन जब तक हम सत्य समझ सकते हैं और कुछ फायदा प्राप्त कर सकते हैं तब तक कोई बात नहीं।) ज्यादातर लोगों को मेरे संपर्क में आने और दो-तीन घंटे मेरे साथ संवाद करने के बाद, मेरी संगति के कई वचन बहुत महत्वपूर्ण लगते हैं, उन्हें वे ऐसी चीजें लगती हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी हैं, इसलिए उन्हें महसूस होता है कि उस दिन इन वचनों को सुनना अत्यंत सार्थक था और वे मेरी संगति सुनने के लिए विशेष रूप से इच्छुक हो जाते हैं। अगर मैं कभी-कभार कुछ हल्की-फुल्की बातचीत में शामिल होता हूँ तो वे थोड़ा निराश महसूस करते हैं और सिर्फ तभी संतुष्ट होते हैं जब वे मेरे वचनों से कुछ प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए मैं कुछ सत्यों पर संगति करने का इच्छुक हूँ, जिसमें वास्तविक जीवन के मामले शामिल हों ताकि सभी को फायदा पहुँच सके। कुछ लोग जब मुझे देखते हैं, तब हमेशा इस बात से डरते हैं कि मैं उनसे कुछ विशेष परिस्थितियों के बारे में पूछ लूँगा और उन्हें यह नहीं पता होगा कि कैसे उत्तर देना है, जिससे वे बड़ी असहज स्थिति में पड़ जाएँगे। ऐसे लोगों के मन बहुत ही जटिल होते हैं; वे सरल नहीं होते। दूसरे लोग सत्य की तलाश करने के इच्छुक होते हैं। वे अपना मजाक उड़ाए जाने के भय के बिना अपनी सभी कठिनाइयों को खुलकर साझा करते हैं—यही सही तरीका है। हमारी बातचीत और संवाद का सिद्धांत यह है कि हम अपने दिलों को खोलें और जो कुछ भी हमारे मन में है उसे कह दें, सच्चाई से बोलें। मैं सामान्य मानवता के भीतर तुम लोगों से जुड़ता हूँ और अंतःक्रिया करता हूँ। अपनी पहचान और रुतबे के कारण मुझे तुम लोगों से ज्यादा पता है, इसलिए यकीनन मुझे ज्यादा बोलना चाहिए। अगर तुम लोग सुनने के इच्छुक हो तो तुम कुछ प्राप्त कर सकते हो; अगर तुम सुनने के इच्छुक नहीं हो तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। जिन विषयों पर हम चर्चा करते हैं उन पर अगर तुम लोगों के पास अंतर्दृष्टि, विचार, अनुभव, समझ या ज्ञान है तो तुम लोग भी उन्हें साझा कर सकते हो। इसे अंतःक्रिया कहते हैं; यह सामान्य मानवता है। अगर तुम्हें लगता है कि मैं जो कह रहा हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण है तो तुम्हें ध्यान से सुनना चाहिए। अगर तुम मेरी बात ग्रहण नहीं कर सकते, तो मैं बोलना बंद कर दूँगा और तुम्हें बोलने दूँगा। अगर तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं है तो मैं तुमसे प्रश्न पूछूँगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैं पूछूँ, “हाल ही में तुम्हारा कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या अपना कर्तव्य करने में तुम्हें कोई कठिनाई आ रही है?” अगर तुम्हें कठिनाइयाँ हैं तो तुम्हें उनके बारे में सच्चाई से बोलना चाहिए और मैं उन्हें हल करने में तुम्हारी मदद करूँगा। इसे अंतःक्रिया कहते हैं और यह कुछ ऐसी चीज है जो सामान्य मानवता में मौजूद होनी चाहिए। क्या यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे सभी पसंद करते हैं? (हाँ।) अगर तुममें जमीर और विवेक है तो तुम्हारी मानवता सामान्य होगी और हमारी बातचीत और वार्तालाप स्पष्टवादिता, भरोसे और सम्मान की नींव पर खड़े किए जा सकते हैं जिससे हम खुलकर बात कर सकेंगे और अपने दिलों में जो है उसे बोल सकेंगे। अगर तुममें जमीर और विवेक नहीं है और तुम सत्य की तलाश नहीं करना चाहते तो अभ्यास करने के लिए तुम्हारे लिए सिर्फ एक ही मार्ग है : अब से पड़ताल नहीं करना, मेरे वचनों और अभिव्यक्तियों से मेरे मन को पढ़ने का प्रयास नहीं करना, बाधित नहीं होना और परीक्षा लेने वाले शब्द नहीं बोलना सीखो। हो सकता है कि कुछ लोग कहें, “मैं ये चीजें प्राप्त नहीं कर सकता।” ऐसे में बस अपना मुँह बंद रखो। अगर तुम्हें चुप रहने के लिए कहा जाता है, लेकिन तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ और तुम्हें बाधित कर रहा हूँ तो इसे भी सँभालना आसान है : तुम जा सकते हो। मैं जिससे भी मिलता हूँ, उससे मेरी कोई माँग नहीं होती और मैं कभी भी लोगों को बाधित नहीं करता। अगर कोई हमेशा मुझमें गलतियाँ ढूँढ़ता है और चाहे मैं उससे बात करूँ या न करूँ, उसे कभी ठीक नहीं लगता तो मैं ऐसे व्यक्ति से सिर्फ दूर ही रह सकता हूँ और उसके संपर्क से बच सकता हूँ। अगर कुछ लोग मेरे संपर्क में रहने से हमेशा डरते हैं, हमेशा यही सोचते रहते हैं कि मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र करूँगा, लेकिन फिर भी कुछ सत्य प्राप्त करने के लिए मेरे संपर्क में रहना चाहते हैं तो मैं कहता हूँ कि ऐसी मानसिकता के साथ तुम सत्य प्राप्त नहीं कर सकते; तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति नहीं हो। लोगों के बारे में तुम हमेशा सबसे बुरा सोचते हो, यह मानते हो कि कोई भी तुम जितना अच्छा नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमसे क्या कहता हूँ, तुम हमेशा यही सोचते हो कि मैं जरूर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। तुम मेरा विश्वास नहीं करते और तुम्हें मुझ पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। ऐसे में हमारे लिए मिलजुलकर रहना नामुमकिन है; कम से कम, मानवता के लिहाज से हम तालमेल में नहीं हैं। हमारा कोई एक जैसा शौक या रुचि नहीं है, अनुसरण करने या आकांक्षा करने के लिए कोई एक जैसा लक्ष्य नहीं है। मानवता के लिहाज से, तुम जिस मार्ग पर चलते हो, तुम्हारी खुशी, गुस्सा, दुःख और आनंद और तुम्हारी पसंद और रुचियाँ, ये सब मेरे से अलग हैं। तुम्हें जो कुछ भी पसंद है वह नकारात्मक है, जबकि मैं जिन विषयों पर बात करना चाहता हूँ, वे सभी सकारात्मक चीजें हैं। तुम हमेशा मेरी पड़ताल करने का प्रयास करते रहते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस सत्य पर संगति करता हूँ, तुम हमेशा यही सोच-विचार करते रहते हो कि क्या उसमें कोई चालबाजी है, क्या मैं षड्यंत्र कर रहा हूँ, क्या तुम्हारा कोई नुकसान हो सकता है या तुम्हें धोखा दिया जा सकता है। अगर तुम हमेशा इन चीजों पर सोच-विचार करते रहते हो तो जब हम एक-दूसरे से बात करेंगे और मेलजोल रखेंगे तब किस तरह का नजारा बनेगा? (अटपटा-सा।) उस स्थिति में मुझे तुम्हारे आस-पास असहज महसूस होगा और तुम्हें मेरे आस-पास असहज महसूस होगा; हम दोनों असहज महसूस करेंगे। क्या इस तरह से एक-दूसरे के आस-पास रहना सिर्फ एक-दूसरे के लिए यातना नहीं होगी? क्या इसमें कोई खुशी होगी? इसमें कोई खुशी नहीं होगी। अगर मैं जो कहता हूँ उसे सुनना तुम्हें पसंद है, अगर तुम सुनने के इच्छुक हो, अगर मैं जिन विषयों पर बात करता हूँ वे वही हैं जिनकी तुम आकांक्षा करते हो, जिन्हें तुम दिल में सँजोते हो, जिनका तुम अनुसरण करते हो और जो तुम्हारी मानवता की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं तो हमारे दिलों में कोई विमुखता या प्रतिरोध नहीं होगा, भले ही हम चुपचाप ही क्यों न बैठे रहें। हम मेलजोल रख सकते हैं और साथ रहकर हम तालमेल प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन मान लो कि मैं जो वचन बोलता हूँ तुम उन्हें सुनना नापसंद करते हो और यहाँ तक कि अपने दिल में विमुखता और प्रतिरोध भी महसूस करते हो, भले ही वे सभी बहुत ही व्यावहारिक और लोगों के लिए फायदेमंद हों। मैं जिन सकारात्मक बातों के बारे में बोलता हूँ और समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य पर संगति के जो वचन बोलता हूँ, विशेषकर भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के विषय में, उन्हें तुम सही मायने में स्वीकार नहीं कर सकते। बल्कि तुम्हें यह भी लगता है कि मैं तुम्हारा ब्रेनवॉश कर रहा हूँ, तुम्हें धोखा दे रहा हूँ, सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर के घर के प्रभाव का विस्तार करने के लिए अधिक लोगों को प्राप्त करने हेतु तुम्हारा उपयोग करने का प्रयास कर रहा हूँ। ऐसे में तुम ही गलत हो। तुम हमेशा विकृत तरीके से सोचते हो, हमेशा तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना चाहते हो, काले को सफेद कहना चाहते हो, और यहाँ तक कि सत्य के हिसाब से जो सकारात्मक चीजें हैं, उन्हें भी ऐसी नकारात्मक, दुष्ट चीजों के रूप में वर्णित करना चाहते हो जो सामाजिक चलन के अनुरूप नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ, तुम यह विश्वास नहीं करते कि यह सत्य है, यह एक सकारात्मक चीज है। तो फिर हम संवाद नहीं कर सकते; क्योंकि कोई साझी भाषा नहीं है, हम तालमेल में नहीं रह सकते। हम एक ही मेज पर खाना नहीं खा सकते; हम एकदिल और एकमन नहीं हो सकते। तो फिर तुम किस तरह के व्यक्ति हो? सटीकता से कहा जाए तो तुम परमेश्वर के घर का हिस्सा नहीं हो; तुम एक अविश्वासी हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं जिन विषयों पर बात करता हूँ वे कितने उचित हैं, या अभ्यास के मार्ग और अभ्यास के सिद्धांत कितने उचित हैं, तुम हमेशा उनमें कुछ और ही मतलब ढूँढ़ लेते हो। तुम हमेशा उन्हें एक दुष्ट परिप्रेक्ष्य से और एक दुष्ट रुख और दृष्टिकोण से देखते, समझते और उनकी व्याख्या करते हो; मैं अभ्यास के जो सही मार्ग और अभ्यास के जो सिद्धांत बोलता हूँ, तुम उन्हें नहीं स्वीकारते। इसलिए, मुझे बोलते हुए सुनने से तुम्हें असहज महसूस होता है। इससे असहज महसूस क्यों होता है? क्योंकि ये तुम्हारी मानवता की जरूरतें नहीं हैं। तुम्हें किसकी जरूरत है? आजादी का प्रयास करने की, दौलत कमाने की, खाने, पीने और मौज-मस्ती करने की। तुम्हारे जीवन के आदर्श वाक्य हैं, “जीवन सिर्फ अच्छा खाने और सुंदर कपड़े पहनने के बारे में है” और “जब तक कर सकते हो, भरपूर मजे करो।” तुम्हें क्या पसंद है? तुम्हें बुरे चलन, अजीबोगरीब कपड़े, चर्चित हस्तियाँ और मशहूर लोग और मनुष्य की असाधारणता और महानता पसंद हैं। ऐसा होने पर तुम परमेश्वर में सच्चे विश्वासी नहीं हो, तुम परमेश्वर के घर का हिस्सा नहीं हो; तुम्हारी मानवता को सकारात्मक चीजों की कोई जरूरत नहीं है। जब मैं तुमसे मेलजोल रखता हूँ तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ, मैं क्या करता हूँ या मैं यह कैसे करता हूँ, जिनमें जमीर, विवेक या सामान्य मानवता की जरूरतें नहीं हैं, उनके लिए यह सब सिर्फ एक सिद्धांत है, एक कथन है, एक विधि है। कुछ लोग तो यहाँ तक सोचते हैं, “जब तुम बोलते हो तब तुम बहुत विस्तार में चले जाते हो और उदाहरण भी देते हो। क्या यह सिर्फ अपने विचारों और नजरियों को लोगों के दिलों में गहराई से बिठाने का प्रयास नहीं है? क्या यह सिर्फ लोगों को तुम्हारे विचार और नजरिए स्वीकार करवाने, उनका ब्रेनवॉश करने और समय के साथ उन्हें अपने विभिन्न विचारों और नजरियों से सुन्न करने का प्रयास नहीं है?” अगर तुम सच में ऐसा महसूस करते हो, अगर तुम मानते हो कि ये वचन सत्य नहीं हैं, वह सच्चा मार्ग नहीं है जिसे लोगों को स्वीकारना चाहिए और अभ्यास करना चाहिए और न ही वे सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए तो तुम इन्हें स्वीकारने से इनकार कर सकते हो; यह तुम्हारी आजादी है। तुम कलीसिया छोड़ भी सकते हो। तुम्हारे पास अपने लिए चुनने का अधिकार है और सत्य स्वीकारने से इनकार करने का अधिकार भी है। लेकिन तथ्यों को तोड़ो-मरोड़ो नहीं और न ही काले को सफेद कहो। सत्य हर समय सत्य ही होता है; कुछ दानवों और शैतानों द्वारा इसे नकारने और इसकी निंदा करने के कारण यह सत्य होना बंद नहीं हो सकता और यह सत्य होना इसलिए तो बिल्कुल भी बंद नहीं हो सकता क्योंकि बहुत-से लोग इसे नापसंद करते हैं या स्वीकार नहीं करते। सत्य हमेशा अस्तित्व में रहता है; यह अनंतकाल तक अपरिवर्तनशील है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसे कितने लोग स्वीकार सकते हैं, सत्य हमेशा के लिए सत्य है। तुम लोगों के साथ मेरा वार्तालाप, संवाद और अंतःक्रियाएँ तुम लोगों का मुझमें जो भरोसा है पूरी तरह से उसकी नींव पर निर्मित हैं; यह सबसे मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। भरोसा प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी चीज यह है कि तुम सभी को अपने दिलों में यह पुष्टि करनी होगी कि वह हर वचन जो मैं कहता हूँ, वह हर प्रश्न जो मैं पूछता हूँ और वह हर मुद्दा जिसके बारे में मैं बात करता हूँ उसमें कोई षड्यंत्र, कोई चालबाजी, कोई जाल और यकीनन तुम्हारी कोई परीक्षा नहीं है। इसलिए तुम लोग निश्चिंत रह सकते हो—जब मैं तुम लोगों से मेलजोल रखता हूँ तब इससे तुम्हें पूरी तरह से आजाद और तनावमुक्त महसूस होना चाहिए। अगर तुम लोगों को लगता है कि मुझसे मेलजोल रखना आजाद या तनावमुक्त करने वाला नहीं है, तुम या तो बाधित हो जाते हो या बहुत असहज हो जाते हो या फिर अपने दिलों में हमेशा सतर्क रहते हो तो फिर मैं कहता हूँ कि यह सच में मेरी समस्या नहीं है, बल्कि तुम लोगों की समस्या है। तुम लोगों की समस्या किस पहलू में मौजूद है? खुद तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि तुम लोगों की क्या समस्याएँ हैं और तुम अपने दिलों में क्या सोच रहे हो; फिर विशिष्ट समस्याओं को विशिष्ट रूप से सुलझाओ। तुम लोगों को जिन भी समस्याओं का पता चलता है, उन्हें सुलझाओ। अगर तुम्हें बहुत-सी समस्याओं का पता चलता है तो उन्हें दर्ज कर लो और फिर उन्हें एक-एक करके सुलझाओ। अगर हर समस्या को तुरंत नहीं सुलझाया जा सकता तो उन्हें एक समय में एक-एक करके धीरे-धीरे सुलझाओ। जब ये चीजें घटित हों तब तुम्हें जाँच और चिंतन करना चाहिए, यह देखना चाहिए कि उस समय तुम वास्तव में क्या सोच रहे थे, तुम किन मुद्दों पर उस तरीके से सोचते हो और किन मुद्दों पर तुम्हारे क्या दृष्टिकोण बनते हैं; फिर धीरे-धीरे उन्हें हल करो। एक दिन जब तुम अपने दिल में मौजूद इन विचारों और दृष्टिकोणों को छोड़ दोगे, ये सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी, तुम सही मायने में सत्य को समझ जाओगे और उसका मूल्य देखोगे, तब तुम मुझ पर भरोसा करोगे। तुम विश्वास करोगे कि मैं किसी भी व्यक्ति और किसी भी समस्या से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकता हूँ और तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र बिल्कुल नहीं करूँगा। नतीजतन, हमारी बातचीत तनावमुक्त और आनंदमय हो सकेगी, हम तालमेल में रह सकेंगे और फिर हमारे इस तालमेल से खुशी का विकास हो सकेगा। खुशी, सुख, शांति और आनंद होना—क्या यह अच्छा नहीं है? (हाँ है।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?