सत्य का अनुसरण कैसे करें (19) भाग एक

उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ

मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ

II. उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत

ग. सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों का भेद कैसे पहचानें

सकारात्मक चीजों के विषय के संबंध में, पिछली बार हमने संगति की थी कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और उनकी एक परिभाषा दी थी। सकारात्मक चीजें क्या हैं? (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) तुम लोगों ने सकारात्मक चीजों की परिभाषा को याद रखा है, लेकिन क्या तुम दिए गए उदाहरणों को समझ सकते हो? (हम उन्हें कुछ हद तक समझ सकते हैं।) सकारात्मक चीजों की यह परिभाषा, यह अवधारणा—क्या यह एक सत्य है? (यह एक सत्य है।) क्या तुम निश्चित हो? परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, तुम्हें लगता है कि यह परिभाषा एक सत्य है और सटीक है, लेकिन जब तुम्हारा सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तब तुम इसे समझ नहीं पाते और सत्य नहीं स्वीकारते। लोगों की धारणाओं के अनुसार चाहे किसी चीज को सकारात्मक चीज के रूप में देखा जाए या नकारात्मक चीज के रूप में, संक्षेप में, अगर यह परमेश्वर की परिभाषा के अनुसार सकारात्मक चीज नहीं है, तो यह सकारात्मक चीज नहीं बल्कि नकारात्मक चीज है। क्या तुम इस तरह से चीजों का भेद पहचानने में समर्थ हो? (हाँ, अगर परमेश्वर ने किसी चीज को सकारात्मक चीज के रूप में परिभाषित किया है, और यह मेरी अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं है और मेरे दिमाग में यह बात नहीं बैठ रही है—लेकिन मैं जानता हूँ कि परमेश्वर जो कहता है वह निश्चित रूप से सत्य है—तो मैं खुद को नकारना सीख जाऊँगा।) अगर यह चीज तुम्हें नुकसान पहुँचाती है या यहाँ तक कि सभी लोगों को नुकसान पहुँचाती है—लोगों की धारणाओं के अनुसार यह उन्हें फायदा नहीं देती है और कोई खुशी या आनंद नहीं लाती है, बल्कि पीड़ा और दुर्भाग्य का कारण बनती है—तो तुम इसे कैसे देखोगे? क्या तुम तब भी अपने इस दृष्टिकोण पर कायम रहोगे कि “सकारात्मक चीजों के बारे में परमेश्वर की परिभाषा वास्तव में सटीक है; लोग अपनी धारणाओं से आकलन नहीं कर सकते, न ही वे इस आधार पर किसी चीज का आकलन कर सकते हैं कि उन्हें इससे फायदा होता है या नहीं”? तुम इस बारे में निश्चित नहीं हो सकते, है ना? (हम निश्चित नहीं हो सकते।) सत्य का कोई भी पहलू सिर्फ सैद्धांतिक स्तर पर समझ में आने वाली या खरी उतरने वाली चीज नहीं है; बल्कि असल जिंदगी में सभी तथ्यों के सामने यह एक कभी नहीं बदलने वाला कथन है। अगर तुम इस बारे में निश्चित नहीं हो सकते, तो तुम्हारे दिल में सत्य के बारे में तुम्हारी अवधारणा वास्तव में अस्पष्ट है। सत्य के विभिन्न पहलू जिन पर हम संगति करते हैं, उन सभी में विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में दृष्टिकोण शामिल हैं; उनमें विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का सार और वास्तविक परिस्थितियाँ शामिल होती हैं; साथ ही, ये लोगों को यह भी देखने देते हैं कि परमेश्वर इन लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ कैसा व्यवहार करता है—उन सब के बारे में उसके क्या दृष्टिकोण और रवैये हैं। चूँकि सकारात्मक चीजों की परिभाषा एक सत्य है, तो बेशक इसमें इस परिभाषा के दायरे में आने वाले अलग-अलग लोगों, घटनाओं और चीजों की वास्तविक परिस्थितियाँ और सार भी शामिल हैं; साथ ही, इन अलग-अलग चीजों के बारे में परमेश्वर के रवैये, परिप्रेक्ष्य और कथन भी शामिल हैं। तो चाहे लोग अपनी धारणाओं के अनुसार सकारात्मक चीजों की परिभाषा को सही मानें या गलत, और चाहे लोगों का अपनी पारंपरिक संस्कृति या दैनिक जीवन के संदर्भ में सकारात्मक चीजों की परिभाषा के बारे में शुरुआती परिप्रेक्ष्य कुछ भी हो, संक्षेप में, चूँकि सकारात्मक चीजों की यह परिभाषा एक सत्य है, तो इसमें शामिल लोग, घटनाएँ और चीजें सभी सकारात्मक चीजें हैं और जो इसके विपरीत हैं, वे सभी नकारात्मक चीजें हैं। यह बिना किसी संदेह के निश्चित है। तुम्हें इस मामले की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब या किस सामाजिक परिवेश में और किस सकारात्मक चीज का तुम पर क्या प्रभाव होता है या उसके बारे में तुम्हारा रवैया और परिप्रेक्ष्य क्या है, सकारात्मक चीजों की परिभाषा और उस परिभाषा में शामिल लोगों, घटनाओं और चीजों का सार नहीं बदलता। समझ गए? (हाँ।)

पिछली बार हमने मुख्य रूप से “परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं” इस कथन से जुड़े कुछ खास उदाहरणों पर संगति की थी। हमने “परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं” वाले हिस्से के बारे में अधिक विस्तार से संगति नहीं की थी। तो क्या तुम लोग संगति के जरिए या बरसों से समझे गए सत्यों के जरिए पुष्टि कर सकते हो कि यह कथन सही है? या फिर, क्या तुम उन लोगों, घटनाओं और चीजों के आधार पर जो तुमने जीवन में देखी हैं और अनुभव की हैं, यह पुष्टि कर सकते हो कि परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं? क्या तुम चीजों को इस तरह समझ पाते हो? क्या तुम इस तरह सत्य खोज पाते हो? (हम कुछ आसान चीजों को इस तरह समझ सकते हैं।) यहाँ एक सिद्धांत है। ऊपरी तौर पर देखें तो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन चीजें क्या हैं, ये विषय बहुत व्यापक दायरे को समेटते हैं और अत्यंत अमूर्त हैं, लेकिन असल में, वे उन अलग-अलग लोगों, घटनाओं और चीजों से गहराई से जुड़े हुए हैं जिनके संपर्क में लोग असल जिंदगी में आते हैं—यह भी कहा जा सकता है कि वे बहुत करीब से जुड़े हुए हैं; वे वास्तविकता से अलग नहीं हैं। इसका संबंध एक मुद्दे से है। जब तुम अपने जीवन में कई अप्रत्याशित लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते हो, तब तुम यह तय नहीं कर पाते कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें। भले ही तुम सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने का सिद्धांत समझते हो, फिर भी तुम इसे तय नहीं कर पाते। भले ही वे ऐसी चीजें हों जो सकारात्मक चीजों के दायरे में आती हैं, तुम उन्हें अपनी धारणाओं में सकारात्मक चीजें नहीं मानते, तुम उनसे दूर भागते हो और अपने दिल में उनसे नफरत करते हो; यहाँ तक कि सोचते हो कि वे सकारात्मक चीजों के दायरे में शामिल होने के बिल्कुल भी लायक नहीं हैं, फिर भी वे वास्तव में परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं और वे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में आती हैं। यहीं पर, लोगों को इस तरह की चीजों का सामना कैसे करना चाहिए इसके अभ्यास के सिद्धांत काम आते हैं। अभ्यास का सबसे सरल सिद्धांत यह है : सबसे पहले, तुम्हें यह पक्का करना होगा कि विचाराधीन चीज सकारात्मक चीजों की परिभाषा के दायरे में आने वाली चीज है। भले ही लोगों की धारणाओं के हिसाब से यह कोई सकारात्मक चीज जैसी नहीं लगती, लेकिन अगर यह परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों की श्रेणी में आती है, तो सबसे पहले तुम्हें निश्चित होना चाहिए कि यह एक सकारात्मक चीज है और इसके बारे में बिल्कुल कुछ भी गलत नहीं है। परमेश्वर द्वारा इसके सृजन का कोई महत्व है; यह लोगों के लिए है ताकि वे इससे कुछ सबक सीख सकें। इस बारे में निश्चित होना जरूरी है। यह अभ्यास का एक सिद्धांत है। दूसरा, इस चीज या इस तरह के मामले के बारे में, हमें वैज्ञानिकों की तरह होने की जरूरत नहीं है और इसकी प्रकृति या कार्यप्रणाली के बारे में या यह मानव जीवन या पूरी खाद्य श्रृंखला में क्या भूमिका निभाता है, इसका अध्ययन करने की जरूरत नहीं है। बस यह निश्चित होना काफी है कि यह एक सकारात्मक चीज है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर यह सकारात्मक चीज अक्सर लोगों की जिंदगी में आती है और उनकी जिंदगी में दखल देती है, उनके इस दृष्टिकोण को प्रभावित करती है कि यह सकारात्मक चीज है, तो इसके साथ कैसे पेश आना चाहिए?” इससे निपटना आसान है। अगर तुम्हें इसे अपने जीवन में इस्तेमाल करने की जरूरत है, तो जरूरत के हिसाब से इसका इस्तेमाल करो; इसे तुम्हारे लिए काम करने दो। अगर तुम्हें इसका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है और यह अक्सर तुम्हारे मामले में दखल देती है या तुम्हारी किसी भी शारीरिक इंद्री को बाधित करती है, तो तुम इसे दूर भगा सकते हो और इससे दूर रह सकते हो। बस इसे अपने मामले में दखल मत देने दो या तुम्हें शारीरिक दर्द मत देने दो। यह दूसरा सिद्धांत है। साथ ही, तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर यह परमेश्वर की सृष्टि, परमेश्वर के विधान या परमेश्वर की संप्रभुता से आती है, तो तुम्हें इसे घिनौना नहीं समझना चाहिए, इससे नफरत नहीं करनी चाहिए या इसे नकारना नहीं चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए और इसे मानना चाहिए। इससे भी बेहतर यह है कि इसे संभालो और इसका विवेकशील तरीके से इस्तेमाल करो। ये अभ्यास के कुल तीन सिद्धांत हैं। ये तीन सिद्धांत क्या हैं? (पहला यह है कि जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों के दायरे में है, हमें निश्चित होना चाहिए कि वह एक सकारात्मक चीज है। परमेश्वर द्वारा उसके सृजन का कोई महत्व है; यह लोगों के लिए है ताकि वे उससे कुछ सबक सीख सकें। दूसरा, यह निश्चित होने के आधार पर कि यह एक सकारात्मक चीज है, जरूरत होने पर इसका इस्तेमाल किया जाए। अगर हमें इसका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है और यह हमारे जीवन में दखल देती है, तो हम इसे दूर भगा सकते हैं और इससे दूर रह सकते हैं, इसे अपनी जिंदगी में दखल नहीं देने दे सकते हैं। तीसरा, अगर यह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो हमें इसे घिनौना नहीं मानना चाहिए या इससे नफरत नहीं करनी चाहिए; हमें इसे स्वीकारना चाहिए और मानना चाहिए। इससे भी बेहतर यह है कि हम इसे संभालें और इसका विवेकशील तरीके से इस्तेमाल करें।) क्या इन तीनों सिद्धांतों को लागू करना आसान है? यह इतना आसान नहीं है, है ना? (नहीं।) अगर कोई मच्छर तुम्हारे कान में भिनभिना रहा है, तो तुम उसे यह सोचकर भगा दोगे, “परमेश्वर ने जो भी बनाया है वह अच्छा है; मैं बस इसे भगा दूँगा और बात खत्म”—तुम इन तीनों सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाओगे। लेकिन अगर तुम उसे भगा देते हो और वह वापस आकर तुम्हें काटता है, तो तुम जितना अधिक इसके बारे में सोचोगे, उतना ही अधिक गुस्सा आएगा : “मैंने तुम्हें जाने दिया, लेकिन तुम मुझे अकेला नहीं छोड़ोगे। इस बार, मैं तुम्हें निश्चित रूप से मार डालूँगा!” क्या उसे मार डालना सही है? असल में, उसे मार डालना गलत नहीं है; इसे उचित प्रबंधन माना जा सकता है। लेकिन साथ ही, क्या तुम्हें इस बात पर संदेह नहीं होने लगेगा कि मच्छर सकारात्मक चीज है? खासकर जब उसके काटने वाली जगह पर और ज्यादा खुजली होने लगती है, इतनी ज्यादा खुजली कि बरदाश्त ही न हो, तो तुम मन ही मन सोचोगे : “परमेश्वर ने मच्छर क्यों बनाए? अगर मच्छर नहीं होते तो क्या लोगों को यह कष्ट होता? यह तो बिल्कुल भी सकारात्मक चीज नहीं लगती!” तुम्हारी तर्कशक्ति तुम्हें बताएगी कि इस तरह सोचना गलत है, मच्छर एक अच्छी चीज है क्योंकि यह परमेश्वर द्वारा सृजित सकारात्मक चीजों के दायरे में एक छोटा-सा जीव है। लेकिन फिर भी तुम्हें यह समझ नहीं आएगा : “इससे लोगों को कोई फायदा नहीं होता, तो परमेश्वर ने इसे क्यों बनाया?” भले ही मच्छर के काटने का निशान बड़ा नहीं होता, लेकिन खुजली बहुत अधिक होती है। जिन्हें एलर्जी की समस्या है, खुजलाने से उनकी त्वचा लाल हो सकती है और उन्हें सूजन हो सकती है, यहाँ तक कि संक्रमण और बुखार भी हो सकता है। इस समय, तुम्हारे मन में कुछ धारणाएँ आएँगी और तुम्हें इसे स्वीकारना मुश्किल लगेगा : “मच्छर मुझे सकारात्मक चीज नहीं लगते। अगर वे सकारात्मक होते, तो वे लोगों को परेशान करके उन्हें दर्द कैसे पहुँचा सकते थे? क्या सकारात्मक चीजों के सकारात्मक प्रभाव नहीं होने चाहिए? यह प्रभाव सकारात्मक नहीं है; वे नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं और लोगों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। मच्छरों को सकारात्मक चीजों की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? यह समझ से परे है। परमेश्वर ने जो किया है, वह मेरी धारणाओं से मेल नहीं खाता!” तुम्हारे दिल में, मच्छरों के सकारात्मक चीजें होने के बारे में धारणाएँ विकसित होंगी। तुम जोर देकर कहोगे, “सबसे पहले, तुम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं। दूसरा, अगर तुम नहीं चाहते कि वे तुम्हें परेशान करें, तो तुम उन्हें भगा सकते हो और उनसे दूर रह सकते हो। आखिरकार, तुम्हें उन्हें घृणास्पद नहीं मानना चाहिए या उनसे नफरत नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें स्वीकार करना चाहिए, उन्हें मानना चाहिए और उन्हें उचित तरीके से संभालना चाहिए।” भले ही तुम कहोगे कि यह आखिरी सिद्धांत तुम्हारे लिए लागू करना बहुत मुश्किल है। फायदेमंद कीटों को स्वीकारना तुम्हारे लिए काफी आसान है। लेकिन जब मच्छरों की बात आती है, अगर तुम उन्हें स्वीकारने की कोशिश करो, उन्हें विवेकशील तरीके से संभालो और उन्हें कोसो नहीं, तो क्या तुम ऐसा कर सकते हो? (परमेश्वर की संगति से पहले, कभी-कभी जब मेरा मूड खराब होता था और मुझे मच्छर काट लेता था, तो मुझे विशेष रूप से नफरत होती थी और मैं कुछ बुरी बातें कहता था। भविष्य में, मैं इससे बचने की पूरी कोशिश करूँगा और अब ऐसी बातें नहीं कहूँगा।) तुम्हें उन्हें कोसना नहीं चाहिए; तुम्हें उन्हें स्वीकारना चाहिए, उनके साथ सही व्यवहार करना चाहिए और उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना चाहिए। विवेकशील तरीके से संभालने वाला यह हिस्सा लागू करना बहुत मुश्किल है, है ना? (हाँ।) अगर तुम्हें उन्हें मौखिक रूप से और धर्म-सिद्धांत के तौर पर मानना और स्वीकारना हो, तो ऐसा करना कुछ हद तक आसान होगा। अगर वे तुम्हें नुकसान पहुँचाते हैं, तो तुम उनसे दूर भी रह सकते हो और उनसे बच सकते हो। लेकिन तुम्हें उन्हें दिल से स्वीकारना और मानना, उनके साथ सही व्यवहार करना और इसके अलावा, उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना—यह तुम्हारे लिए मुश्किल होगा। यह मुश्किल क्यों होगा? क्योंकि जब वे तुम्हें नुकसान पहुँचाते हैं, तो तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुम्हें उनसे कोई फायदा हो रहा है, बल्कि तुम्हें लगता है कि उनसे नुकसान हो रहा है। यानी, तुम्हारी धारणाओं के अनुसार, सकारात्मक चीजों का सकारात्मक प्रभाव होना चाहिए; लेकिन मच्छरों से कोई सकारात्मक फायदा मिलने के बजाय, तुम्हें लगता है कि उनका तुम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस समय, तुम्हारे लिए उन्हें घिनौना या नफरत के लायक नहीं समझना, बल्कि उन्हें स्वीकारना और यहाँ तक कि उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना आसान नहीं होगा। भले ही लोग सैद्धांतिक स्तर पर यह मान सकते हैं कि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं और वे बमुश्किल मच्छरों के साथ सही व्यवहार करने की कोशिश भी कर पाते हैं, लेकिन जब वे असल जिंदगी में मच्छरों से परेशान होते हैं, तब उनके लिए सिद्धांतों के अनुसार उनके साथ व्यवहार करना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए लोगों को सत्य समझने की जरूरत है; कई खास लोगों, घटनाओं और चीजों की प्रकृति को समझने की जरूरत है जो सकारात्मक चीजों के तीन पहलुओं के तहत आती हैं—जो “परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं”—साथ ही यह कि वे मानव जीवन और अस्तित्व के मामले में किस तरह की भूमिकाएँ निभाती हैं; परमेश्वर का उन्हें बनाने और उनके जीने का तरीका देने के पीछे असली उद्देश्य क्या था। ये वो बातें हैं जिन्हें लोगों को समझने की जरूरत है। अगर लोग परमेश्वर के असली उद्देश्य और उसके इरादों की मुख्य बातों और बुनियादी सिद्धांतों को समझ लें, तो कुछ सकारात्मक चीजें जो उनकी धारणाओं से मेल नहीं खातीं, शायद उनसे दूर रहने के अलावा, वे—अलग-अलग हद तक—उन्हें स्वीकार भी सकते हैं, उन्हें मान सकते हैं, उन्हें विवेकशील तरीके से संभाल सकते हैं और उनका सही इस्तेमाल कर सकते हैं। हम धीरे-धीरे इस विषय पर चर्चा करेंगे।

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