सत्य का अनुसरण कैसे करें (11) भाग एक

परिशिष्ट : जिस मार्ग पर लोग चलते हैं वही तय करता है कि अंततः उन्हें क्या हासिल होगा

परमेश्वर में विश्वास करने का क्या उद्देश्य है? क्या यह अनुग्रह और आशीष पाने के लिए है? क्या यह एक खोखला जीवन जीने से बचने और निम्नस्तरीय रुचियों से मुक्त होने के लिए है? (नहीं।) तो फिर यह क्या है? (सत्य पाने के लिए।) यह सत्य पाने के लिए है, जीवन पाने के लिए है। तो फिर, क्या लोग रोज जो कुछ भी करते हैं वह सब इसी लक्ष्य की ओर निर्देशित होता है? क्या तुम रोज अपना कर्तव्य निभाने में जो समय और ऊर्जा खर्च करते हो, वह सब इसी लक्ष्य की खातिर है? लोग सत्य पाने के स्पष्ट लक्ष्य के बिना ही परमेश्वर में विश्वास करते हैं। अपने दिलों में वे दर्शनों के इस पहलू को लेकर अस्पष्ट होते हैं और नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या उद्देश्य है। ऐसा लगता है मानो वे अपने दिलों में बस इतना ही जानते हैं कि यह आशीष पाने के लिए है—लेकिन आशीष पाने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए? वे नहीं जानते कि आशीष पाने के लिए सत्य समझने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य का अनुसरण करने की आवश्यकता होती है। तो क्या वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं? वे इस बारे में भी निश्चित नहीं होते। वे सोचते हैं, “यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। मैं सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करता हूँ; परमेश्वर मुझे नहीं त्यागेगा। भले ही लोग कहें कि मैं सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” कभी-कभी, जब वे दूसरों को अपनी अनुभवजन्य गवाही साझा करते हुए देखते हैं जबकि वे स्वयं कोई गवाही साझा नहीं कर सकते, तब वे भी परेशान महसूस करते हैं, अपने दिलों में वे थोड़े व्याकुल और बेसब्र हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। बस इसी तरह पाँच साल पलक झपकते ही बीत जाते हैं, दस साल पलक झपकते ही बीत जाते हैं—कुछ लोग अब तीस से चालीस वर्ष की उम्र के हैं, कुछ पचास वर्ष से ऊपर के हैं; उन्होंने शादी नहीं की है और हमेशा अपना कर्तव्य करते रहते हैं। अब तक उन्होंने कितना सत्य पाया है? क्या उनके पास जीवन है? वे खुद इस बारे में निश्चित नहीं हैं। उन्हें लगता है : “ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने काफी सत्य समझ लिया है और मैं कई धर्मोपदेश दे सकता हूँ; मेरे पास जीवन होना चाहिए, है ना?” चाहे सभाओं के दौरान हो या जब वे अपने कर्तव्यों में समस्याओं का सामना करते हों, वे विस्तार से बोल सकते हैं, मानो वे हर सत्य समझते हों, लेकिन वे कोई भी वास्तविक समस्या हल नहीं कर सकते। वे जो धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे चाहे कितने भी ऊँचे लगते हों, फिर भी अपने कर्तव्य निभाते समय वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर सकते, यहाँ तक कि सत्य सिद्धांतों को जरा भी न समझते हुए वे कई मामलों में अभी भी अपनी ही मर्जी चलाते हैं। और इसलिए, अपने दिलों में वे उलझे हुए महसूस करते हैं : “मैं सचमुच ऐसा व्यक्ति हूँ या नहीं जो सत्य समझता है?” वे नहीं जानते कि वे ऐसे व्यक्ति हैं या नहीं जो सत्य समझता है। तो फिर, क्या वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण और अभ्यास करते हैं? वे खुद भी इस बारे में अनिश्चित होते हैं। तो क्या उन्होंने सचमुच सत्य प्राप्त किया है या नहीं? उन्हें अभी भी इस बारे में संदेह है। तो क्या उनके पास सचमुच जीवन है या नहीं? आखिर जीवन है क्या? किसी व्यक्ति के पास जीवन होने पर कैसा महसूस होता है? जब किसी व्यक्ति के पास जीवन होता है, तो उसके दैनिक जीवन में क्या बदलाव आते हैं? उसके विचार कैसे बदलेंगे? उसकी मानवता में क्या बदलाव आएँगे? उसे इनमें से किसी भी चीज के बारे में स्पष्ट नहीं होता। चाहे उसने कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, सत्य के कुछ पहलुओं के बारे में बात करते हुए वह कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार कर सकता है; लेकिन जब सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों की बात आती है, तो वह उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाता है। विशेष रूप से, कुछ लोग अपने क्रियाकलापों में सिद्धांतों के विरुद्ध जाने के कारण अपनी काट-छाँट किए जाने पर न सिर्फ नकारात्मक हो जाते हैं, बल्कि उलझन में भी पड़ जाते हैं और यह कहते हुए खुद पर ही संदेह करने लगते हैं : “मैंने सचमुच जीवन प्राप्त किया है या नहीं? क्या सत्य का मेरे हृदय में कोई स्थान है, क्या वह मेरा जीवन बन गया है? क्या मैं सचमुच अभी भी उद्धार प्राप्त कर सकता हूँ?” वे सत्य से जुड़े इन सभी मामलों के बारे में उलझन में रहते हैं, लेकिन जब उन बाहरी मामलों की बात आती है जिनमें सत्य शामिल नहीं होता, तो वे उन्हें बहुत स्पष्ट रूप से याद रखते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कितने साल, महीने और दिन परमेश्वर में विश्वास किया है, उन्होंने किस स्तर के अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा की है, उन्होंने कौन-से कर्तव्य निभाए हैं, उन्होंने कलीसिया का कितना काम किया है, वे कितनी जगहों की यात्रा कर चुके हैं, सुसमाचार का प्रचार करके उन्होंने कितने लोगों को प्राप्त किया है, उन्होंने कितनी कलीसियाओं का सिंचन किया है, परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में उन्होंने कितना कष्ट सहा है, उन्होंने कितना धन अर्पित किया है, उन्होंने भाई-बहनों को कौन-सी चीजें दान की हैं, वे कितने समय के लिए गिरफ्तार हुए और कैद में रहे हैं, उन्होंने कितनी मार खाई है, उन्हें कितनी यातनाएँ दी गई हैं, वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में कितनी बार अडिग रहे हैं, आदि-आदि—ये सभी बाहरी मामले वे अपनी याददाश्त में सँजोकर रखते हैं और अक्सर इन्हें याद करते रहते हैं। वे अपने मन में इन सबका हिसाब रखते हैं, हर एक प्रविष्टि स्पष्ट रूप से याद रखते हैं और उसे कभी नहीं भूलते। लेकिन जब बात यह आती है कि वे कितने सत्य समझते हैं और उनमें कितनी वास्तविकता है, तो इस बारे में उनका हिसाब हमेशा गड़बड़ रहता है। उनके मन में यह कभी स्पष्ट नहीं होता कि वे कौन-से सत्य समझते हैं, कौन-से सत्य उन्होंने अभ्यास में उतारे हैं और जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं, तो क्या वे सत्य का पालन कर सकते हैं और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं; इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। वे मन में इस बारे में भी स्पष्ट नहीं होते कि अपने किन भ्रष्ट स्वभावों की उन्हें सच्ची समझ है, क्या उन्होंने उन्हें त्याग दिया है और कौन-से भ्रष्ट स्वभाव वे अक्सर प्रकट करते रहते हैं लेकिन उन्हें त्यागा नहीं है; इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। परमेश्वर में इतने वर्षों तक विश्वास करने के बाद वे कौन-से सत्य अभ्यास में ला सकते हैं और कौन-से सत्य वे अभ्यास में नहीं लाए हैं, सत्य के किन पहलुओं में उन्होंने प्रगति की है और कितनी प्रगति की है—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। अपनी मानवता के संदर्भ में वे वास्तव में क्या जीते हैं—क्या उनमें जमीर और विवेक है और क्या उन्होंने सामान्य मानवता को जिया है—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। उन्होंने अपने कितने कर्तव्य सच्चे मन से और वफादारी से निभाए हैं, कितने कर्तव्य जानबूझकर लापरवाही से निभाए हैं, कितने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाए हैं और कितने अभी भी मानक के अनुरूप नहीं रहे हैं, किन कर्तव्यों में वे इस तरह सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाए हैं कि उनके द्वारा इन कर्तव्यों का निर्वहन परमेश्वर को संतुष्ट करता है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, किन कर्तव्यों में वे अभी तक सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ पाए हैं और परमेश्वर को संतुष्ट करने में सफल नहीं हुए हैं—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। ठीक किन पहलुओं में वे परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं, किस हद तक उन्होंने परमेश्वर के प्रति समर्पण किया है, किन पहलुओं में वे अभी भी परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में उनकी अक्षमता का क्या कारण है और आगे बढ़ते हुए उन्हें किस तरह से प्रवेश करना चाहिए—इन सब चीजों के संबंध में उनके पास कोई योजना नहीं होती, न ही कोई विचार होता है और बेशक उनके पास कोई स्पष्ट मार्ग तो बिल्कुल भी नहीं होता। इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी वे नहीं जानते कि परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने कितनी चीजें की हैं या कितने अच्छे कर्म उन्होंने तैयार किए हैं; वे नहीं जानते कि उन्होंने कितनी बुराई की है या कितनी ऐसी चीजें की हैं जिनसे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न हुई हैं—अपनी यादों में उन्हें ऐसा लगता है कि उन्होंने इनमें से कुछ चीजें की हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि बुराई करने के बाद उन्होंने पश्चात्ताप किया है या नहीं। भले ही कभी-कभी उन्हें यह एहसास हो सकता है कि उन्होंने बुराई की है और वे परेशान महसूस करते हैं, उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की है और अपने पाप कबूल किए हैं, तो क्या उन्हें परमेश्वर की क्षमा प्राप्त हो गई है? क्या उनके दिलों में दोषी महसूस करने का भाव होता है? उन्हें इन चीजों का भी पता नहीं होता। वे मन ही मन सोचते हैं : “कौन परवाह करता है कि मैं दोषी महसूस करता हूँ या नहीं? जो भी हो, मैं अभी काफी आराम से जी रहा हूँ; मैं अभी भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ।” तो अपने कर्तव्य निर्वहन में उन्होंने कितने अच्छे कर्म किए हैं? वे यह भी ठीक से नहीं बता सकते, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ अच्छे कर्म किए हैं—हाल ही में उन्होंने सुसमाचार का प्रचार किया और दो लोगों को प्राप्त किया है। उनके पास अच्छे कर्मों की यह छोटी-सी संख्या तो है, लेकिन वे बिना किसी सिद्धांत के चीजें करते हैं, यहाँ तक कि अपनी मनमर्जी से और एक मनमाने और लापरवाही भरे ढंग से काम करते हैं—क्या इन्हें बुरे कर्म माना जाता है? वे इस बारे में भी अस्पष्ट हैं। उन्हें लगता है कि चूँकि कलीसिया ने उनका निपटारा नहीं किया है और अगुआओं ने उनकी काट-छाँट नहीं की है या इन चीजों के लिए उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया है, इसलिए ये बुरे कर्म नहीं हैं; अगर उन्हें जवाबदेह ठहराया जाता, तो शायद ये चीजें बुरे कर्म होतीं। वे नहीं जानते कि उन्होंने कितने अच्छे कर्म तैयार किए हैं। वे अभी जो चीजें कर रहे हैं, वे अच्छे कर्म हैं या बुरे, उनमें से कितने अच्छे कर्म हैं, उनमें से कितने बुरे कर्म हैं, कितने सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं, कितने कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों के विरुद्ध जाते हैं—वे इनमें से किसी भी चीज के बारे में नहीं जानते। उन्होंने इन मामलों का कभी कोई हिसाब-किताब नहीं रखा है। बहरहाल, वे रोज समय पर खाते और सोते हैं, आध्यात्मिक भक्ति या कार्य के लिए तय समय पर उठते हैं और काम करते समय भी वैसी ही दशा बनाए रखते हैं और कार्य के उन चरणों का ही पालन करते हैं जैसा पिछले दिन किया था, वही चीजें करते हैं जो हमेशा से करते आए हैं। उन्होंने सत्य का अनुसरण करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने या भ्रष्ट स्वभावों को त्यागने और जीवन प्राप्त करने जैसे मामलों को कभी विशेष रूप से या व्यवस्थित ढंग से नहीं जाना है या उन्हें सारांशित नहीं किया है। इसलिए सत्य का अनुसरण करने या जीवन प्रवेश से जुड़ी कोई भी चीज उनके लिए एक उलझा हुआ हिसाब है। मुझे बताओ, अगर कोई व्यक्ति रोज इसी तरह जीता है, ऐसी ही दशा में अपना जीवन बिताता है, तो क्या वह भ्रमित नहीं है? (हाँ, है।) “भ्रमित” एक साहित्यिक अभिव्यक्ति है; बोलचाल की भाषा में इसका अर्थ है निरुद्देश्य तरीके से काम करते जाना। क्या जीने की यह दशा, अस्तित्व में रहने की यह दशा अच्छी है या नहीं? (यह अच्छी नहीं है।) ऊपरी तौर पर वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कोई स्पष्ट व्यवहार या अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित नहीं करते, लेकिन जब बात सत्य और जीवन प्रवेश का अनुसरण करने से जुड़े मामलों की आती है, तो वे भ्रमित होते हैं और इस बारे में गंभीर नहीं होते। यह दशा ठीक वही है जिसका अर्थ है भ्रमित होना। यह किसी व्यक्ति की समस्या को स्पष्ट रूप से दर्शाता है और स्पष्ट रूप से उस मार्ग का खुलासा करता है जिस पर वह परमेश्वर में विश्वास करने में चलता है।

परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया में जब सत्य और जीवन प्रवेश का अनुसरण करने की बात आती है, तो व्यक्ति का रवैया, उसकी व्यक्तिपरक इच्छाएँ या अभिव्यक्तियाँ चाहे जैसी भी हों, परमेश्वर की नजरों में, व्यक्ति जिस दशा में होता है वह दर्शाती है कि वह किस मार्ग पर चल रहा है। कुछ लोग जिस पल से परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, उसी पल से सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य पर चाहे कैसे भी संगति की जाए, वे उसे स्वीकार नहीं करते। जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह सीधे मृत्यु और नरक की ओर जाता है। कुछ लोग जब पहली बार परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर की अपेक्षाएँ नहीं समझते और सिर्फ आशीष पाने तथा स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का ही अनुसरण करते हैं। लेकिन परमेश्वर के वचनों को लगातार खाने-पीने से वे सत्य समझने लगते हैं और सत्य का अनुसरण करने में सक्षम हो जाते हैं और सत्य पाने की खातिर कठिनाई सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं। अंत में यह देखा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह प्रकाश और स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाता है। जीवन प्रवेश के मामलों के संबंध में ज्यादातर लोग अपने लक्ष्यों में इसी तरह अस्पष्ट रहते हैं और उलझन की दशा में बने रहते हैं। लेकिन इन लोगों की अभिव्यक्तियों से आँकें, तो कुछ लोग सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में हमेशा लापरवाह रहते हैं और परमेश्वर में कई वर्षों तक विश्वास करने के बाद भी जरा भी नहीं बदलते—जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह विनाश और नरक की ओर ले जाता है। दूसरी ओर, कुछ लोग सत्य स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय काट-छाँट स्वीकार कर सकते हैं, उनमें कुछ सच्चा समर्पण होता है और धीरे-धीरे वे अपने कर्तव्यों को इस तरह से करने लगते हैं जो मानक के अनुरूप होता है—जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह उन्हें प्रकाश और स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाता है। जो लोग सत्य जरा भी स्वीकार नहीं करते—दूसरे शब्दों में, जो लोग सीधे विनाश के मार्ग पर बढ़ रहे हैं—वे अपने कर्तव्य के निर्वहन में लगातार बुराई करते हैं, कलीसियाई जीवन और कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हुए अक्सर ऐसे काम करते हैं जो सत्य के विरुद्ध होते हैं और जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ये लोग कुछ “विशेष” अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। यानी जिस पल से उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, तब से लेकर अब तक उन्होंने कभी पश्चात्ताप नहीं किया है और अपने कर्तव्य के निर्वहन में वे अक्सर लापरवाह रहते हैं, वे कपटी होते हैं और काम से जी चुराते हैं, आसान काम चुनते हैं और मुश्किल कामों से बचते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते; वे विशेष रूप से स्वार्थी और घृणित होते हैं और सिर्फ अपने आनंद की परवाह करते हैं। यह भी इन लोगों की एक विशेषता होती है। कुछ लोग और भी ज्यादा बुरे होते हैं—अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में वे अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं; मनमाने ढंग से और लापरवाही से काम करते हैं, कभी भी कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य का अभ्यास नहीं करते या उसे कार्यान्वित नहीं करते। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने कर्तव्य में अक्सर रुतबे के लिए होड़ करते हैं, खुद को ऊँचा उठाते हैं और अपनी ही गवाही देते हैं; वे लोगों को अपनी तरफ खींचकर अपना एक स्वतंत्र राज्य खड़ा कर लेते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना कर्तव्य करते समय भेंटों की चोरी करते हैं, भेंटों का अपव्यय करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हैं। ये अभिव्यक्तियाँ सकारात्मक हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक।) इन लोगों ने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के पल से ही ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित की हैं। परमेश्वर का घर उन्हें अवसर देता रहता है—जिन कुछ लोगों में थोड़ी-बहुत काबिलियत होती है, उन्हें पर्यवेक्षक का कर्तव्य करने के लिए व्यवस्थित किया जाता है, लेकिन कुछ समय तक खराब प्रदर्शन करने के बाद उन्हें कोई एकपक्षीय कर्तव्य सौंपा जाता है; लेकिन उस एकपक्षीय कर्तव्य में भी वे लापरवाह बने रहते हैं, अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं, मनमाने और लापरवाह ढंग से काम करते हैं, विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं और कुछ तो रुतबे और सत्ता के लिए होड़ भी करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते। मौका मिलने पर वे भेंटों की चोरी भी करते हैं और भेंटों का अपव्यय भी करते हैं। चाहे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए कितने भी साल हो गए हों, उनमें ये अभिव्यक्तियाँ रत्ती भर भी कम नहीं हुई हैं, न ही उनमें रत्ती भर भी बदलाव आया है। अंत में उनमें क्या देखने को मिलता है? यही कि अपने कर्तव्य के निर्वहन में ये लोग निरंतर लापरवाही भरे ढंग से काम करते हैं, धूर्तता बरतते हैं और काम से जी चुराते हैं, आसान काम चुनते हैं और मुश्किल कामों से बचते हैं, यहाँ तक कि शारीरिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हैं और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करते हैं। उनकी अभिव्यक्तियाँ कभी-कभार या अस्थायी नहीं होतीं, बल्कि निरंतर बनी रहती हैं—यह उनके लिए समस्या खड़ी करती है। अपने कर्तव्य निर्वहन में वे निरंतर लापरवाह ढंग से काम करते हैं, अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, चाहे उनसे कोई भी बात करे, वे बदलते नहीं हैं। वे कितने भी धर्मोपदेश क्यों न सुन लें, वे कभी पश्चात्ताप नहीं करते और न ही उनके दिलों में कभी पछतावा होता है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो निरंतर रुतबे के लिए होड़ करते हैं, परमेश्वर के घर के हितों के साथ निरंतर विश्वासघात करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की कभी रक्षा नहीं करते। क्या “निरंतर” शब्द को समझना आसान है? चाहे कोई भी हो, जो अपने कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही भरे ढंग से काम करता है, मनमाना और निरंकुश रहता है या जिसमें कुछ बुरी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, परमेश्वर का घर हमेशा उन्हें पश्चात्ताप करने के अनेक अवसर देता है। ऐसा कभी नहीं होता कि उनकी अस्थायी अभिव्यक्तियों की वजह से उन्हें दूर कर दिया जाता हो और उन्हें अपना कर्तव्य न करने दिया जाता हो। इसके बजाय, उन्हें बार-बार प्रोत्साहित किया जाता है, उनके साथ सत्य के बारे में संगति की जाती है, प्रेमपूर्वक उनकी सहायता की जाती है और सहारा दिया जाता है। इसके अलावा, पवित्र आत्मा उन्हें अतिरिक्त मात्रा में प्रेरित करता है, प्रबुद्ध करता है और फटकारता है। लोग कार्य करते हैं और पवित्र आत्मा भी कार्य करता है, फिर भी ऐसे लोग दिल से पूरी तरह अड़ियल और सत्य से विमुख होते हैं। वे कभी सत्य स्वीकार नहीं करते; वे कभी भाई-बहनों की सहायता, आलोचना, अनुवर्ती कार्रवाई या पर्यवेक्षण स्वीकार नहीं करते और इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा का प्रबोधन और ताड़ना स्वीकार नहीं करते। चाहे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए तीन या पाँच वर्ष हुए हों या दस या बीस वर्ष हुए हों, वे ऐसे ही बने रहते हैं। भले ही अब वे उम्र में बड़े हो गए हैं, थोड़े-से ज्यादा परिपक्व और अनुभवी प्रतीत होते हैं, फिर भी वे अपने कर्तव्य उसी तरह करते हैं—वे लगातार लापरवाही भरे तरीके से काम करते हैं और बेलगाम हो कर बुरी चीजें करते हैं। इन बीस वर्षों में वे ऐसे ही रहे हैं, बिल्कुल भी नहीं बदले हैं। जब वे बोलते हैं, तो उनके मुँह से झूठ की बाढ़ आ जाती है और वे कभी सच नहीं बोलते। वे अब भी वैसे ही हैं; चाहे वे कितने भी शब्द बोलें, कोई नहीं जानता कि उनमें से कौन-से सत्य हैं और कौन-से असत्य—उनमें एक भी ईमानदार शब्द नहीं होता। भले ही इन बीस वर्षों में अपने कर्तव्य करने में उन्होंने कुछ हद तक कष्ट उठाए हैं और सुसमाचार का प्रचार करके उन्होंने कुछ लोगों को प्राप्त किया है, फिर भी उनका जीवन स्वभाव रत्ती भर भी नहीं बदला है। वे आज भी विशेष रूप से चालाक और धोखेबाज हैं; वे बस पुराने साँप हैं, जो एक भी ईमानदार शब्द बोलने में असमर्थ हैं। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य से प्रेम करते हों; अगर वे उसे थोड़ा-बहुत समझते भी हों, तो भी वे उसे अभ्यास में नहीं ला सकते। वे किस तरह के लोग हैं? ये ऐसे लोग हैं जो लगातार लापरवाही से काम करते हैं, लगातार बेलगाम होकर बुरी चीजें करते हैं, मनमाने और निरंकुश तरीके से काम करते हैं, लगातार विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, सत्ता के लिए होड़ करते हैं और लगातार चालें चलते हैं, झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे पुरानी चालाक लोमड़ियाँ हैं—वे बस पुराने साँप, पुरानी चिकनी ईल मछलियाँ, पुराने दानव, पुराने शैतान हैं। उनके समस्त क्रियाकलापों से पहले “निरंतर” विशेषण जोड़ा जाना चाहिए। एक बार “निरंतर” जोड़ दिए जाने पर यह उनके खिलाफ व्यक्तिगत पूर्वाग्रह का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह उनके अपने क्रियाकलापों और व्यवहार के कारण उत्पन्न हुई चीज होगी। हर किसी की नजरों में इस व्यक्ति ने ये चीजें सिर्फ एक या दो बार नहीं की हैं—यह आदतन अपराधी है। विभिन्न देशों के पुलिस विभाग आदतन अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? आदतन अपराधियों के आपराधिक रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से संग्रहित किए जाते हैं। जब भी कोई अपराध होता है, तो ये आदतन अपराधी मुख्य संदिग्ध होते हैं और पुलिस निश्चित रूप से मामले की जाँच-पड़ताल और पूछताछ की शुरुआत उनसे ही करेगी। तो फिर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जो परमेश्वर के घर में निरंतर लापरवाही से अपना कर्तव्य निभाते हैं? लापरवाह होने और अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करने की उनकी अभिव्यक्तियाँ सिर्फ एक या दो बार होने वाली चीजें नहीं हैं, न ही वे सिर्फ विशेष परिस्थितियों में होती हैं। ये दशाएँ और अभिव्यक्तियाँ वह निरंतर तरीका है जिससे वे अपने कर्तव्य के साथ पेश आते हैं। जिस निरंतर तरीके से वे अपने कर्तव्य के साथ पेश आते हैं उससे आँकें तो यह देखा जा सकता है कि सत्य के प्रति उनका क्या रवैया है। तो सत्य के प्रति उनका क्या रवैया है? (वे उससे विमुख हैं और उसके प्रति प्रतिरोध महसूस करते हैं।) इस तरह के लोग सत्य से विमुख होते हैं और उसके प्रति प्रतिरोध महसूस करते हैं। वे उसे कभी स्वीकार नहीं करते। अपने मन की गहराई में वे उसे तुच्छ समझते हैं और सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। चाहे कोई भी उनके साथ सत्य पर संगति करे, वे नहीं सुनते। चाहे उन्हें पश्चात्ताप करने के कितने भी अवसर दिए जाएँ, वे उन्हें सँजोते नहीं या उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। वे जैसा चाहते हैं वैसा ही करते हैं, उसी तरीके से करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। जब पवित्र आत्मा उन्हें प्रेरित करता है, तो उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती और वे उसकी परवाह नहीं करते। वे लोगों के प्रोत्साहनों और मदद से विमुख रहते हैं और उनकी उपेक्षा करते हैं और अगर वे लोग तब उनकी काट-छाँट करते हैं, तो वे क्रोधित हो जाते हैं, आग-बबूला हो जाते हैं, उन पर भड़क उठते हैं और अपने दिलों में उनके प्रति घृणा महसूस करते हैं। कलीसिया हर चरण पर प्रत्येक व्यक्ति की अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन करती है और व्यक्ति के परिणाम के लिए यह मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अगर व्यक्ति का चरित्र-चित्रण करते हुए उसके बुरे कर्मों की अभिव्यक्तियों में “निरंतर” शब्द जोड़ दिया जाता है, तो यह उस व्यक्ति के लिए समस्या खड़ी करता है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोग असल में किस तरह के मार्ग पर चल रहे हैं। तो आखिर वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या यह विनाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है या उद्धार की ओर ले जाने वाला मार्ग है? (यह विनाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है।) यह नतीजा क्यों निकलता है? क्या यह इन लोगों की निंदा करना है? क्या यह वास्तविक स्थिति के विपरीत है? (नहीं।) क्या उन्हें अब भी पश्चात्ताप करने के मौके दिए जाने चाहिए? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “हमें उन्हें पूरी तरह से खारिज नहीं कर देना चाहिए—हो सकता है किसी दिन वे पश्चात्ताप कर लें!” नीनवे के लोगों ने बहुत सारे बुरे कर्म किए थे और उनके बुरे कर्मों की सूचना परमेश्वर के कानों तक पहुँच गई थी। जब परमेश्वर उन्हें नष्ट करने ही वाला था तब उसने योना को उन्हें एक संदेश देने के लिए समय से पहले भेजा, जिसमें बताया गया था कि नीनवे को चालीस दिनों में नष्ट कर दिया जाएगा। यह सुनकर नीनवे के लोगों ने कैसा व्यवहार किया? चालीस दिनों के अंदर ही उन्होंने टाट और राख ओढ़ ली और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया। लेकिन अब, जो लोग अपना कर्तव्य करते समय निरंतर खराब प्रदर्शन करते हैं, उन्हें पश्चात्ताप करने के लिए चालीस दिनों के कितने मौके पहले ही दिए जा चुके हैं? क्या उन्होंने पश्चात्ताप किया है? क्या उनमें पश्चात्ताप करने की इच्छा है? क्या वे पश्चात्ताप की ओर कोई झुकाव दिखाते हैं? (नहीं।) पिछले दस या बीस सालों में उनकी अभिव्यक्तियाँ निरंतर बुराई करने वाली ही रही हैं, तो क्या अगले दस या बीस सालों में वे बदल सकते हैं? क्या वे बुराई करना छोड़ सकते हैं? यह अज्ञात हो सकता है, लेकिन पिछले दस या बीस सालों में इन लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि उनके सभी व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ सत्य के खिलाफ जाती हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं और परमेश्वर का विरोध करती हैं। यह साबित करता है कि उनके दिल सत्य से विमुख हैं, उनका प्रकृति सार दुष्ट है और उसमें सत्य से प्रेम करने का कोई तत्त्व नहीं है, उनमें सत्य से प्रेम करने और उसका अभ्यास करने की मानवता नहीं है। पिछले दस या बीस सालों की उनकी अभिव्यक्तियों से आँकें तो यही निष्कर्ष निकलता है। चूँकि इस बिंदु तक यही निष्कर्ष निकला है, इसलिए उनकी मानवता और उनके सार से आँकने पर क्या अगले दस, बीस या तीस सालों में उनमें से कोई भी सचमुच पश्चात्ताप कर पाएगा और बदल पाएगा? क्या तीस लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? क्या पचास लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? क्या सौ लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? यानी अगले दस या बीस सालों में क्या वे अचानक जमीर की जागरूकता प्राप्त कर पाएँगे, सत्य और सकारात्मक चीजों में दिलचस्पी ले पाएँगे, सत्य और सकारात्मक चीजों को स्वीकार कर पाएँगे, खुद को जान पाएँगे और सच्चा पश्चात्ताप कर पाएँगे और अतीत में किए गए बुरे कामों के लिए पछतावा और ऋणी महसूस कर पाएँगे? तुम लोगों की जाँच-परख के आधार पर इसका अनुपात क्या है? क्या हजार लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? (मुझे लगता है कि हजार लोगों में से भी कोई एक ऐसा नहीं है।) तुम्हें ऐसा किस आधार पर लगता है? (इस तथ्य पर कि दस या बीस सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद ऐसे लोगों का सत्य के प्रति रवैया लगातार नफरत भरा और प्रतिरोध महसूस करने का रहा है; वे सत्य जरा भी स्वीकार नहीं करते और उन्होंने पश्चात्ताप की थोड़ी-सी भी अभिव्यक्ति नहीं दिखाई है। इससे यह साबित होता है कि वे भविष्य में भी सच में पश्चात्ताप नहीं करेंगे।) क्या यह कथन सही है? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं, “हमें दूसरों के प्रति सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए। अगर उन्होंने पिछले दस या बीस सालों में पश्चात्ताप नहीं किया है, तो इसकी वजह यह थी कि वे कम उम्र के और अपरिपक्व थे या उनकी पारिवारिक स्थितियाँ अच्छी थीं और उन्हें बहुत लाड़-प्यार मिला और वे बिगड़ गए या फिर उनके पास ऊँचा सामाजिक रुतबा और कुछ खूबियाँ थीं। क्या इन खास परिस्थितियों और परिवेशों के कारण ही वे ऐसे नहीं हो गए? हो सकता है कि अगले दस या बीस सालों में वे उन पारिवारिक परिवेशों और प्रतिकूल कारकों से मुक्त हो जाएँ और शायद बदल जाएँ।” यह कहना मुश्किल है। लेकिन, इन लोगों की पिछली अभिव्यक्तियों के आधार पर, जिन लोगों की अभिव्यक्तियों से पहले “निरंतर” विशेषण जुड़ा है, वे सभी बहुत बड़े खतरे में हैं। यहाँ तक कि इन सौ या हजार लोगों में से भी कोई एक भी ऐसा नहीं हो सकता जो सच में पश्चात्ताप कर सके। अगर उनके किसी भी बुरे कर्म से पहले अभी तक “निरंतर” विशेषण नहीं लगा है, तो शायद ऐसे लोगों के लिए अभी भी थोड़ी उम्मीद है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले तीन से पाँच सालों में उनकी अभिव्यक्तियाँ कैसी रहती हैं। अगर ऐसा इसलिए है कि वे कम उम्र के और अपरिपक्व हैं या परमेश्वर में उनके विश्वास की कोई नींव नहीं है या उनकी काबिलियत खराब है या फिर कुछ वस्तुगत परिवेशों ने उनके सत्य को स्वीकारने और समझने को प्रभावित किया है—अगर ऐसा इन वस्तुगत कारणों से हुआ है और बुरे कर्मों की उनकी अभिव्यक्तियाँ सिर्फ अस्थायी हैं, तो आगे और जाँच-परख करना जरूरी है। लेकिन अब तक, जो लोग लगातार बुरे कर्म करते हैं—जिनकी अभिव्यक्तियों से पहले “निरंतर” शब्द जुड़ा है—उन्होंने अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं। इसके बजाय, परमेश्वर में विश्वास करने की अपनी प्रक्रिया में उन्होंने बहुत सारे बुरे कर्म जमा कर लिए हैं। बात बस इतनी है कि वे यह मानने से इनकार करते हैं कि वे बुरे लोग हैं और उन्होंने जो कठिनाइयाँ सही हैं, जो कीमत चुकाई है उनका और परमेश्वर के लंबे समय से विश्वासी होने के नाते अपनी वरिष्ठता का उपयोग करके वे खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करते हैं। जिस मार्ग पर ये लोग चलते हैं, वह न सिर्फ उनके सामने प्रदर्शित किया गया है बल्कि हर किसी के सामने भी प्रकट किया गया है। उनकी अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन, उनके क्रियाकलाप और व्यवहार, अपना कर्तव्य करने के प्रति उनका रवैया, सत्य के प्रति उनका रवैया और सभी सकारात्मक चीजों के प्रति उनका रवैया उनका सार दिखाने के लिए पहले से ही पर्याप्त हैं। बेशक, अपने कर्तव्य के प्रति उनके रवैये और सत्य के प्रति उनके रवैये ने भी उस मार्ग को पहले ही प्रकट कर दिया है जिस पर वे चल रहे हैं।

जिस मार्ग पर लोग चलते हैं, वही तय करता है कि अंततः उन्हें क्या हासिल होगा। अगर लोग विनाश के मार्ग पर चलते हैं, तो अंततः उन्हें यही हासिल होता है कि उनके लिए नरक के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और वे नरक में धकेल दिए जाते हैं। इसका दूसरों से कोई लेना-देना नहीं है—यह दूसरे लोगों की वजह से नहीं होता, बल्कि यह अंततः उस मार्ग द्वारा लाया गया नतीजा है जिस पर तुम चलते हो। ऐसा हो सकता है कि तुमने कई सालों से परमेश्वर में विश्वास किया हो और कई अपराध किए हों, कुछ गलत मोड़ लिए हों और कुछ ऐसी चीजें की हों जो सही मार्ग से हटकर हों; कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्होंने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने और उसका प्रतिरोध करने वाले कुछ काम किए हैं। भले ही ये अभिव्यक्तियाँ अच्छी नहीं हैं और परमेश्वर की नजरों में उन्हें दोषी ठहराया जाता है, फिर भी अगर—अपना भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करने के साथ ही—तुम आत्मचिंतन कर पाते हो और सचमुच बदल जाते हो, अपनी सच्चाई, कीमत चुकाने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य के प्रति अपने सकारात्मक और सक्रिय रवैये का इस्तेमाल करके सक्रिय रूप से कई अच्छे कर्म तैयार कर लेते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया बदल जाएगा। उदाहरण के लिए, मान लो जब मसीह-विरोधी और दुष्ट लोग कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते और उसमें बाधा डालते हैं और भाई-बहनों को गुमराह करते हैं, तो तुम तुरंत उन मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों के बुरे कर्मों को उजागर कर पाते हो, उनके द्वारा पैदा की जाने वाली विघ्न-बाधाओं को रोक पाते हो, भाई-बहनों की रक्षा कर पाते हो और परमेश्वर के घर के हितों की सुरक्षा कर पाते हो। इसके अलावा, अपना कर्तव्य करने की प्रक्रिया में कई अप्रत्याशित कठिनाइयाँ और बाधाएँ आई हों और तुमने अपना समय, ऊर्जा और शारीरिक शक्ति खर्च की हो, अपने शारीरिक आनंद के सुखद पलों का त्याग किया हो और इन कठिनाइयों और समस्याओं को हल करने के लिए अपना पूरा प्रयास किया हो। तुम्हारे दबाव डालने, निगरानी करने और अनुवर्ती कार्रवाई के जरिए, तुम्हारे कष्ट सहने और कीमत चुकाने के जरिए कलीसिया का सुसमाचार कार्य सामान्य और सुचारु रूप से विकसित हो पाया हो और आगे बढ़ पाया हो। इसके अलावा, सुसमाचार का प्रचार करने की प्रक्रिया में, तुम कुछ ऐसे लोगों को साथ लाए हो जिनमें अच्छी काबिलियत और सत्य समझने की क्षमता है और तुमने उनके साथ विभिन्न सत्यों के बारे में स्पष्ट रूप से संगति की हो, जिससे वे सच्चे मार्ग पर नींव रख पाए हों, कलीसिया में अपना कर्तव्य कर पाए हों और कार्य की कुछ खास मदों में सक्षम सहायक बन पाए हों। या फिर तुमने परमेश्वर के घर में किसी खास, विशेषीकृत कार्य में अहम भूमिका निभाई हो, कार्य की प्रगति को आगे बढ़ाने और उसके नतीजे बेहतर बनाने के लिए कार्य के असरदार तरीके या चरण इस्तेमाल किए हों। या फिर कलीसियाई जीवन में तुमने उन कुछ भाई-बहनों की मदद की हो जो नकारात्मक और कमजोर थे या जो दिशाहीन महसूस करते थे और जिनके पास कोई मार्ग नहीं था, तुमने उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग खोजने में, परमेश्वर के इरादे समझने और उसे गलत न समझने में और सत्य का अनुसरण करने का संकल्प करने में मदद की हो। इससे भी बढ़कर, तुम इन लोगों को प्रोत्साहित करने में सक्षम रहे हो जिससे वे कोई कर्तव्य करने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए तैयार हो गए हों। या फिर किसी विशेषीकृत कार्य में तुमने कोई अपरिहार्य भूमिका निभाई हो—यह भी हो सकता है कि तुम जो काम करते हो वह कठिन और थकाऊ हो और उस पर किसी की नजर भी न पड़ती हो, फिर भी तुम एक गुमनाम, परदे के पीछे काम करने वाले कार्यकर्ता बने रहने के लिए तैयार रहते हो, बिना कोई इनाम माँगे बस अपनी सच्चाई और वफादारी अर्पित करने की चाह रखते हुए परिश्रम करते हो। इस तरह की सभी सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर की नजरों में ऐसे अच्छे कर्म हैं जो याद रखे जाने लायक हैं। दूसरी ओर, ऐसा भी हो सकता है कि जब तुम इन चीजों का सामना करते हो, तो तुम न सिर्फ अपना कर्तव्य करने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में विफल रहते हो, बल्कि पल्ला झाड़ने का नजरिया अपनाते हो और किनारे खड़े होकर तमाशा देखते हो और हँसते हो, तुम उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हो, उनसे आँखें मूँद लेते हो और कान बंद कर लेते हो। तुम वह नहीं करते जो तुम कर सकते हो, यहाँ तक कि अपने थक जाने के डर से तुम कोई सुझाव देने की जहमत भी नहीं उठाते। जब भी मुमकिन होता है, तुम यह सोचते हुए चीजों को टाल देते हो कि तुम जितने ज्यादा खाली बैठोगे, उतना ही बेहतर होगा। तुम्हें हमेशा यही लगता है कि ज्यादा सावधान और जिम्मेदार होना बेकार है और कार्य के मामलों में सिर खपाना बहुत बड़ी मुसीबत है। भले ही ये अभिव्यक्तियाँ कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने जैसे बुरे कर्मों से अलग हैं और परमेश्वर तुम्हें कोई खराब रेटिंग नहीं देगा, लेकिन वह तुम्हें कोई अच्छी रेटिंग भी नहीं देगा। तुम्हें अच्छी रेटिंग न देने से मेरा क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि इन चीजों में तुमने अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं, न ही ऐसी चीजें की हैं जिन्हें परमेश्वर याद करे। जब तुमने इन चीजों का सामना किया, तब तुमने अच्छे कर्म तैयार करने का मौका गँवा दिया। तुम बहुत बेवकूफ हो; तुम भरोसे के लायक नहीं हो, बढ़ावा देने लायक नहीं हो, उन्नत करने लायक नहीं हो और परमेश्वर द्वारा मामले सौंपे जाने लायक नहीं हो। तुम नूह और अब्राहम से पूरी तरह अलग हो। मुझे बताओ, जिस व्यक्ति को परमेश्वर कुछ भी सौंपने की हिम्मत नहीं करता, हो सकता है वह अंत में नरक न जाए, लेकिन क्या वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? सिर्फ यही कहा जा सकता है कि यह अनिश्चित है और इसके आगे ढेर सारे प्रश्नचिह्न लगते हैं; यह बहुत ज्यादा अनिश्चितता से भरा है। यह अनिश्चितता उसकी निरंतर अभिव्यक्तियों पर आधारित है। अगर तुम हर किसी से पूछो कि वह परमेश्वर में विश्वास क्यों करता है, वह स्वर्ग के राज्य में जाना चाहता है या नरक में—तो कुछ लोग तुम्हारा मजाक उड़ाएँगे, कहेंगे कि यह सवाल बेहद बेवकूफी भरा है : “कौन नरक में जाना और नष्ट होना चाहेगा? कौन स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना और उद्धार पाना नहीं चाहेगा?” लेकिन यह सवाल सच में पूछा जाना चाहिए। यह बेवकूफी भरा नहीं है। कुछ लोगों ने कभी इस तरह से आत्म-चिंतन नहीं किया है। जब वे स्थितियों का सामना करते हैं, तो वे हमेशा मुसीबत से डरते हैं और विवादों को न्योता देने से घबराते हैं। खासकर जब वे देखते हैं कि बुरे लोग कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह किया जा रहा है और उनका शोषण हो रहा है और नतीजतन कलीसिया का कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है, तो वे नहीं जानते कि परमेश्वर लोगों की पड़ताल कर रहा है, न ही वे यह जानते हैं कि असल में यह अच्छे कर्म तैयार करने का मौका है। इसके बजाय, वे खुशामदी इंसान होना चुनते हैं और सत्य सिद्धांतों को छोड़ देते हैं और जरा भी आत्म-चिंतन नहीं करते। तुम्हारी जिम्मेदारी क्या है? तुम्हारा दायित्व क्या है? तुम्हारे लिए परमेश्वर का क्या आदेश है? परमेश्वर ने बहुत सारे वचन कहे हैं और बहुत सारा कार्य किया है—परमेश्वर की तुम्हारे लिए क्या अपेक्षा है? क्या तुम परमेश्वर को कोई संतोषजनक जवाब दे सकते हो? क्या तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं? इन सभी मामलों में तुम्हें अक्सर आत्म-चिंतन करना चाहिए और अपने दिल में स्पष्टता रखनी चाहिए।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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