विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1) (भाग एक)

मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करनी बंद कर दी है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, तो यहोवा की महिमा और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस महिमा और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और उसके प्रति श्रद्धा दिखाना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृजित जीवों के बीच साक्ष्य हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, खुलासे, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन के खुलासे और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह वह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णत: कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो परमेश्वर की जीत को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक लोग कैसे जीते जाते हैं इस की बात है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझकर, इसे अभ्यास में ला सको, और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और खुद कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और ये उन वचनों का परिणाम होगा। मनुष्यजाति ने साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि कोई भी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्यजाति की जीत लोगों के विश्वास की बहाली है। लोग हमेशा अंधाधुंध लौकिक संसार की ओर भागना चाहते हैं, वे अनेक आशाएँ रखते हैं, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहते हैं और उनकी अनेक अनावश्यक मांगें हैं। वे हमेशा अपने शरीर के विषय में सोचते, शरीर के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं, उनकी रुचि कभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग की खोज में नहीं होती। उनके हृदय को शैतान के द्वारा छीन लिया गया है, उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने सम्मान को खो दिया है, और उनका हृदय शैतान की ओर टकटकी लगाए रहता है परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के द्वारा की गई थी। इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के साक्ष्य को खो चुका है, अर्थात वह परमेश्वर की महिमा को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य की श्रद्धा की महिमा को पुनः प्राप्त करना है। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है : ऐसे अनेक लोग हैं जो जीवन की खोज नहीं करते; यदि कुछ हैं भी तो, उनकी संख्या को उँगलियों पर गिना जा सकता है। लोग अपने भविष्य के विषय में चिन्तित रहते हैं और जीवन की ओर ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते। कुछ लोग परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करते हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन लोगों को फिलहाल अनदेखा कर दिया गया है; फिलहाल विद्रोह के इन पुत्रों का कुछ नहीं किया जाता है, लेकिन भविष्य में तुम विलाप करते और दाँत पीसते हुए अन्धकार में रहोगे। जब तुम ज्योति में रह रहे होते हो तो उसकी बहूमूल्यता का अनुभव नहीं करते, परन्तु जब तुम अँधेरी रात में रहने लगोगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा लगता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आएगा और अन्धकार नीचे उतरेगा और रोशनी फिर कभी नहीं होगी, तब तुम्हारे पास अफसोस करने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। क्योंकि तुम अभी भी आज के कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए तुम अभी तुम्हारे पास जो समय है उसे संजोने में असफल हो। एक बार जब सम्पूर्ण कायनात का कार्य आरम्भ हो जाएगा अर्थात जो कुछ मैं आज कह रहा हूँ, जब वह पूर्ण हो चुका होगा, तो अनेक लोग अपना सर पकड़कर दु:ख के आँसू बहाएँगे। ऐसा करते समय, क्या वे रोते और दांत पीसते हुए अन्धकार में नहीं गिर चुके होंगे? जो लोग वास्तव में जीवन की खोज करते हैं और जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, उनका उपयोग किया जा सकता है, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अन्धकार में गिरेंगे। उन्हें पवित्र आत्मा का कोई भी कार्य प्राप्त नहीं होगा, और वे किसी भी चीज़ का अर्थ समझने में असक्षम होंगे। रो-रोकर उनका बुरा हाल होगा, वे दंड में झोंक दिये जाएँगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित हो और तुम जीवन में विकसित हो चुके हो, तब तुम उपयोग किए जाने के उपयुक्त हो। यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित नहीं हो, तब अगर तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए बुलाया भी गया है, तो भी इस मुकाम पर इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त ही रहोगे, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो भी तुम्हें दूसरा अवसर नहीं मिलेगा। परमेश्वर जा चुका होगा; तब तुम इस प्रकार का अवसर प्राप्त करने के लिए कहाँ जाओगे, जो अभी तुम्हारे समक्ष है? तब तुम उस अभ्यास को प्राप्त करने कहाँ जाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय तक, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं करेगा, और न ही अपनी वाणी प्रदान करेगा; तुम मात्र वही पढ़ने के योग्य होगे जो आज कहा जा रहा है; तो फिर सरलता से समझ कैसे मिलेगी? भविष्य का जीवन आज के जीवन से किस प्रकार बेहतर बन पायेगा? उस समय, क्या रोते और दाँत पीसते हुए तुम एक जीवित मृत्यु की पीड़ा नहीं झेल रहे होगे? अभी तुम्हें आशीष प्रदान की जा रही है; परन्तु तुम नहीं जानते कि उसका आनन्द कैसे उठाना है; तुम आशीष में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम अनजान हो। यह प्रमाणित करता है कि तुम पीड़ा उठाने के लिए अभिशप्त हो! आज कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं। मैं बस तुम्हें अनदेखा करता हूँ, लेकिन यह मत सोचना कि मैं तुम सबके कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सबके सार को नहीं समझता? मुझसे लड़ने में क्यों लगे रहते हो? क्या तुम अपने हित की खातिर जीवन और आशीष की खोज के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? तुम्हारे अंदर आस्था का होना क्या तुम्हारे अपने हित में नहीं है? फिलहाल मैं केवल बोलकर जीतने का कार्य कर रहा हूँ और जब जीतने का यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम्हारा अन्त साफ हो जाएगा। क्या मुझे और स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है?

आज का विजय कार्य यह स्पष्ट करने के लिए अभीष्ट है कि मनुष्य का अन्त क्या होगा। मैं क्यों कहता हूँ कि आज की ताड़ना और न्याय, अंत के दिनों के महान श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात को प्रकट करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को, ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान, अपना असली रंग दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह उस बात को दर्शाना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का अन्त किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने के बारे में है और फिर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों को उजागर करना और इस प्रकार यह निर्णय करना है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक हैं। विजय-कार्य के पश्चात धार्मिक को पुरस्कृत करने और दुष्ट को दण्ड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णत: आज्ञापालन करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से जीत लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें जीता नहीं गया उनको अन्धकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार मनुष्य को उसकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, दुष्कर्म करने वालों को दुष्टों के साथ समूहित किया जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा, और धर्मियों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए भले लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी बातों का अन्त निकट है; मनुष्य को साफ तौर पर उसका अन्त दिखा दिया गया है, और सभी वस्तुओं का वर्गीकरण उनकी किस्म के अनुसार किया जाएगा। तब, लोग इस तरह वर्गीकरण किए जाने की पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं? जब सभी चीज़ों का अन्त निकट होता है तो मनुष्य के प्रत्येक वर्ग के भिन्न अन्तों को प्रकट कर दिया जाता है, और यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (इसमें समस्त विजय-कार्य सम्मिलित है जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) को जीतने के कार्य के दौरान किया जाता है। समस्त मनुष्यजाति के अन्त का प्रकटीकरण, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना के दौरान और अंत के दिनों के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। लोगों को किस्म के अनुसार वर्गीकृत करना, उन्हें उनके वास्तविक वर्ग में लौटाना नहीं है, क्योंकि संसार की रचना के समय जब मनुष्य को बनाया गया था, तब एक ही किस्म के मनुष्य थे, केवल पुरुष और स्त्री का विभाजन था। उस समय विभिन्न प्रकार के वर्ग नहीं थे। यह तो हज़ारों वर्षों की भ्रष्टता के पश्चात ही हुआ कि मनुष्य के अनेक वर्ग उत्त्पन्न हुए, जिसमें कुछ अशुद्ध हैवानों के अंतर्गत आते हैं, कुछ दुष्टात्माओं के अंतर्गत और कुछ जो सर्वशक्तिमान के प्रभुत्व के अधीन जीवन का मार्ग खोजते हैं। इसी रीति से ही धीरे-धीरे लोगों के मध्य वर्ग अस्तित्व में आते हैं और इस तरह ही लोग मनुष्य के विस्तृत परिवारों में से वर्गों में विभाजित होते हैं। समस्त लोगों के “पिता” भिन्न हो गए हैं; ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति पूर्णत: सर्वशक्तिमान के अधिकार के अधीन आता है, क्योंकि इंसान बहुत ही विद्रोही है। धार्मिक न्याय प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की वास्तविक किस्म को प्रकट करता है और कुछ भी छिपा नहीं रहने देता। प्रकाश में प्रत्येक व्यक्ति अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है। इस बिन्दु पर, मनुष्य वैसा नहीं है जैसा वह वास्तविक रूप में था और उसके पूर्वजों की वास्तविक समानता बहुत पहले ही अन्तर्धान हो चुकी है, क्योंकि आदम और हव्वा के अनगिनत वंशज बहुत पहले से स्वर्ग-सूर्य को पुनः कभी न जानने के लिए शैतान के द्वारा वश में कर लिए गए हैं, और क्योंकि लोग हर प्रकार से शैतान के विष से भर दिए गए हैं। इसीलिए, लोगों के लिए उनकी उपयुक्त मंजिलें हैं। इसके अलावा, उनके विभिन्न प्रकार के विषों के आधार पर उन्हें क़िस्मों में वर्गीकृत किया जाता है, अर्थात आज उन्हें जिस हद तक जीता गया है उसके अनुसार अलग-अलग किया जाता है। मनुष्य का अन्त संसार की सृष्टि के पहले ही निर्धारित नहीं किया गया था। क्योंकि आरंभ में मात्र एक ही वर्ग था, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” पुकारा जाता था, और मनुष्य को पहले शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया था, सभी लोग परमेश्वर के प्रकाश में जीवनयापन करते थे और उन पर किसी भी प्रकार का अन्धकार नहीं था। परन्तु बाद में जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो सभी प्रकार और किस्म के लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल गए—सभी प्रकार और किस्म के लोग, जो उस परिवार से आए थे, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” कहा जाता था, जो पुरुषों और स्त्रियॉं से बनी थी। अपने सबसे पुराने पूर्वज—मनुष्यजाति, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी (अर्थात मूल आदम और हव्वा, जो उनके सबसे पुराने पूर्वज थे) से अलग होने के लिए उन सभी का मार्गदर्शन उनके पूर्वजों के द्वारा किया गया था। उस समय, इस्राएली वे एकमात्र लोग थे, जिनका पृथ्वी पर जीवनयापन के लिए यहोवा के द्वारा मार्गदर्शन किया जा रहा था। विभिन्न प्रकार के लोग, जो सम्पूर्ण इस्राएल (अर्थात वास्तविक पारिवारिक कुल से) से अस्तित्व में आए थे, उन्होंने बाद में यहोवा की अगुवाई को खो दिया। ये आरम्भिक लोग, जो मानव संसार के मामलों से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, वे उन क्षेत्रों में रहने के लिए अपने पूर्वजों के साथ हो लिए, जिन क्षेत्रों पर उन्होंने अधिकार किया था और आज तक ऐसा ही चला आ रहा है। इस तरह, वे आज भी अनजान हैं कि वे यहोवा से कैसे अलग हो गए और आज तक सभी प्रकार के अशुद्ध हैवानों और दुष्टात्माओं के द्वारा किस प्रकार भ्रष्ट किए गए हैं। जो अब तक अत्यधिक गहन रूप से भ्रष्ट और विष से भरे हुए हैं, जिन्हें अन्तत: बचाया नहीं जा सकता, उनके पास अपने पूर्वजों, अशुद्ध हैवानों, जिन्होंने उन्हें भ्रष्ट किया, उनके साथ जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। वे लोग जिन्हें अन्तत: बचाया जा सकता है, वे मनुष्यजाति की उपयुक्त मंजिल पर पहुँच जाएँगे, अर्थात उस अन्त पर, जो बचाए गए और जीते गए लोगों के लिए संरक्षित रखा गया है। उन सभी को बचाने के लिए सबकुछ किया जाएगा, जिन्हें बचाया जा सकता है, परन्तु उन असंवेदनशील, असाध्य लोगों के पास अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे ताड़ना के अथाह गड्ढ़े में जाना ही एकमात्र विकल्प होगा। यह मत सोचो कि तुम्हारा अन्त, आरम्भ में ही पूर्वनियत कर दिया गया था और इसे अब प्रकट किया गया है। यदि तुम ऐसा सोचते हो, तब क्या तुम भूल गए हो कि मनुष्य की आरम्भिक रचना के दौरान, किसी भी अलग शैतानी वर्ग की रचना नहीं की गई थी? क्या तुम भूल चुके हो कि आदम और हव्वा से बनी मात्र एक ही मनुष्यजाति को रचा गया था (अर्थात मात्र पुरुष और स्त्री ही बनाए गए थे)? यदि तुम आरम्भ में ही शैतान के वंशज होते, तो क्या उसका अर्थ यह न होता कि जब यहोवा ने मनुष्य की रचना की, तब उसने एक शैतानी समूह को भी सम्मिलित कर लिया था? क्या वह ऐसा कुछ कर सकता था? उसने मनुष्य को अपने साक्ष्य के लिए बनाया था; उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए रचा था। उसने जानबूझ कर अपने विरोध के लिए शैतान की सन्तान के एक वर्ग को स्वेच्छा से क्यों बनाया होता? यहोवा ऐसा कैसे कर सकता था? यदि उसने ऐसा किया होता तो कौन कहता कि वह धार्मिक परमेश्वर है? आज जब मैं यह बात कहता हूँ कि तुम सब में से कुछ लोग अन्त में शैतान के साथ जाएँगे, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम आरम्भ से ही शैतान के साथ थे; बल्कि इसका अर्थ यह है कि तुम इतना गिर चुके हो कि यदि परमेश्वर ने तुम्हें बचाने का प्रयास किया भी है, तब भी तुम वह उद्धार पाने में असफल हो गए हो। तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि तुम उद्धार के योग्य नहीं हो, इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति अधार्मिक है, अर्थात ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने जानबूझकर तुम्हारी नियति को शैतान की एक अभिव्यक्ति के रूप में तय कर दिया है, और फिर तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत करके जानबूझकर तुम्हें पीड़ित करना चाहता है। यह विजय-कार्य का अंदरूनी सत्य नहीं है। यदि तुम ऐसा मानते हो तो तुम्हारी समझ बहुत ही एक पक्षीय है! विजय के अन्तिम चरण का उद्देश्य लोगों को बचाना और उनके अन्त को प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की विकृति को भी प्रकट करना है और इस प्रकार उनसे पश्चाताप करवाना, उन्हें ऊपर उठाना, जीवन और मानवीय जीवन के सही मार्ग की खोज करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा उनके भीतरी विद्रोह को प्रदर्शित करना है। परन्तु, यदि लोग अभी भी पश्चाताप करने के अयोग्य हैं, अभी भी मानव जीवन के सही मार्ग को खोजने में असमर्थ हैं और अपनी भ्रष्टताओं को दूर करने के योग्य नहीं हैं, तो उनका उद्धार नहीं हो सकता, और वे शैतान द्वारा निगल लिए जाएँगे। परमेश्वर के विजय-कार्य के ये मायने हैं : लोगों को बचाना और उनका अन्त भी दिखाना। अच्छे अन्त, बुरे अन्त—वे सभी विजय-कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब विजय-कार्य के दौरान प्रकट किया जाता है।

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें