देहधारण का रहस्य (1) (भाग एक)

अनुग्रह के युग में यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। यूहन्ना स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा लेने के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम शुरू किया, अर्थात् उसने मसीह की सेवकाई करनी प्रारंभ की। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान अपनाई, क्योंकि वह परमेश्वर से ही आया था। भले ही इससे पहले उसका विश्वास कैसा भी रहा हो—वह कई बार दुर्बल रहा होगा, या कई बार मज़बूत रहा होगा—यह सब अपनी सेवकाई करने से पहले के उसके सामान्य मानव-जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरंत ही परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा आ गई, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई करनी आरंभ की। वह चिह्नों का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, और उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; वह पवित्रात्मा के स्थान पर उसका काम कर रहा था और पवित्रात्मा की आवाज़ व्यक्त कर रहा था। इसलिए, वह स्वयं परमेश्वर था; यह निर्विवाद है। यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए संभव था। यदि वह ऐसा करना चाहता, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को करने में असमर्थ था, जिसे स्वयं परमेश्वर संपन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो मनुष्य की इच्छा का था, या कुछ ऐसा, जो विचलन भरा था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी ग़लतियाँ और त्रुटिपूर्णता केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किंतु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि उसका सब-कुछ परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसका विचलन और त्रुटिपूर्णता भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में गलत होना सामान्य है, परंतु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विचलित होता है, तो क्या यह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या यह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता, भले ही दूसरों के द्वारा उसे ऊँचा स्थान दिया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को, जैसे मनुष्य चाहे वैसे, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने ही यूहन्ना की गवाही दी और उसी ने उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परंतु पवित्र आत्मा द्वारा उस पर किया गया कार्य अच्छी तरह से मापा हुआ था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय यह है कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया और उसे केवल इसी प्रकार का कार्य करने की अनुमति दी—उसे कोई अन्य कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, और वह उस नबी का प्रतिनिधित्व करता था, जिसने मार्ग तैयार किया था। पवित्र आत्मा ने इसमें उसका समर्थन किया था; जब तक उसका कार्य मार्ग तैयार करना था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। किंतु यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कहा होता कि वह छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा रहा हो, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया हो, फिर भी उसका काम असीम नहीं था। माना कि पवित्र आत्मा द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परंतु उस समय उसे दिया गया सामर्थ्य केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने तक ही सीमित था। वह कोई अन्य काम बिलकुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जिसने मार्ग तैयार किया था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही महत्वपूर्ण है, किंतु पवित्र आत्मा जो कार्य मनुष्य को करने की अनुमति देता है, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना ने उस समय ज़बरदस्त गवाही प्राप्त नहीं की थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किंतु जो काम उसने किया, वह यीशु के काम से बढ़कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इसलिए उसने जो काम किया, वह सीमित था। जब उसने मार्ग तैयार करने का काम समाप्त कर लिया, पवित्र आत्मा ने उसके बाद उसकी गवाही बरक़रार नहीं रखी, कोई नया काम उसके पीछे नहीं आया, और स्वयं परमेश्वर का काम शुरू होते ही वह चला गया।

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

यहाँ तक कि जिस मनुष्य का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, वह भी स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इतना ही नहीं कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि उसके द्वारा किया जाने वाला काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता, और वह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। वह समस्त कार्य, जिसे स्वयं परमेश्वर करता है, ऐसा कार्य है, जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और वह बड़े प्रबंधन से संबंध रखता है। मनुष्य द्वारा किए गए कार्य में उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति शामिल रहती है। उसमें उस मार्ग से भिन्न, जिस पर पहले के लोग चले थे, अनुभव के एक नए मार्ग की खोज, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में अपने भाइयों और बहनों का मार्गदर्शन करना शामिल रहता है। इस तरह के लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों के आध्यात्मिक लेखन की ही आपूर्ति करते हैं। यद्यपि इन लोगों का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं, वह छह-हज़ार-वर्षीय योजना के बड़े प्रबंधन-कार्य से संबंध नहीं रखता। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा विभिन्न अवधियों में उभारा गया, ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की धारा में लोगों की अगुआई करें, जब तक कि वे जो कार्य कर सकते हैं, वे पूरे न हो जाएँ या उनके जीवन का अंत न हो जाए। जो कार्य वे करते हैं, वह केवल स्वयं परमेश्वर के लिए एक उचित मार्ग तैयार करना है या पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का एक निश्चित पहलू जारी रखना है। अपने आप में ये लोग उसके प्रबंधन का महान कार्य करने में सक्षम नहीं होते, न ही वे नए मार्गों की शुरुआत कर सकते हैं, उनमें से कोई पिछले युग के परमेश्वर के समस्त कार्य का समापन तो बिलकुल भी नहीं कर सकता। इसलिए, जो कार्य वे करते हैं, वह केवल अपने कार्य संपन्न करने वाले एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है, वह अपनी सेवकाई संपन्न करने वाले स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो कार्य वे करते हैं, वह स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य के समान नहीं है। एक नए युग की शुरुआत करने का कार्य ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य द्वारा किया जा सकता हो। इसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। मनुष्य के द्वारा किया जाने वाला समस्त कार्य एक सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और वह तब किया जाता है, जब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। इन लोगों द्वारा प्रदान किया जाने वाला मार्गदर्शन मनुष्य को बस दैनिक जीवन में अभ्यास का मार्ग दिखाना और यह बताना होता है कि उसे किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य के कार्य में न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना सम्मिलित है और न ही वह पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, गवाह ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। मार्ग चाहे नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो या स्थानीय कलीसियाओं को बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। उनके द्वारा किए गए कार्य ने उस कार्य को आगे बढ़ाया, जिसे यीशु और उसके प्रेरितों ने समाप्त नहीं किया था या अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में उस चीज़ को बहाल किया, जिसे यीशु ने अपने प्रारंभिक कार्य में अपने बाद आने वाली पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपना सिर ढककर रखना, बपतिस्मा लेना, रोटी साझा करना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य बाइबल का पालन करना था और बाइबल के भीतर ही मार्ग तलाशना था। उन्होंने किसी तरह के कोई नए प्रयास नहीं किए। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यास ही देख सकता है। किंतु कोई उनके कार्य में परमेश्वर की वर्तमान इच्छा नहीं खोज सकता, और उस कार्य को तो बिलकुल नहीं खोज सकता, जिसे अंत के दिनों में करने की परमेश्वर की योजना है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस मार्ग पर वे चले, वह फिर भी पुराना ही था—उसमें कोई नवीनीकरण और नवीनता नहीं थी। उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के तथ्य को पकड़े रखना, लोगों को पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों का पालन जारी रखा, जैसे कि, जो अंत तक सहन करता है उसे बचा लिया जाएगा, और कि पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए, यहाँ तक कि उन्होंने इस परंपरागत धारणा को भी बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकतीं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नया कार्य करने, मनुष्यों को सिद्धांत से मुक्त करने, या उन्हें स्वतंत्रता और सुंदरता के राज्य में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, कार्य का यह चरण, जो युग का परिवर्तन करता है, स्वयं परमेश्वर द्वारा किया और बोला जाना चाहिए, अन्यथा कोई व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से भिन्न है, इसलिए उनकी पहचान और जिन व्यक्तियों की ओर से वे कार्य करते हैं, वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है, वह भिन्न है, और इसलिए समान रूप से कार्य करने वालों को अलग-अलग पहचान और हैसियत प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग कुछ नया कार्य भी कर सकते हैं और वे पूर्व युग में किए गए किसी कार्य को हटा भी सकते हैं, किंतु उनके द्वारा किया गया कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए कुछ नहीं करते। इस प्रकार, चाहे वे पुराने पड़ चुके कितने भी अभ्यासों का उन्मूलन कर दें या वे कितने भी नए अभ्यास आरंभ कर दें, वे फिर भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किंतु जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह खुलकर प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की घोषणा नहीं करता या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता। वह अपने कार्य में स्पष्ट और ईमानदार है। वह उस कार्य को करने में बेबाक है, जिसे करने का वह इरादा रखता है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने किया है, वह अपने अस्तित्व और स्वभाव को व्यक्त करते हुए अपने मूल इरादे के अनुसार सीधे तौर पर अपना कार्य करता है। जैसा कि मनुष्य देखता है, उसका स्वभाव और कार्य भी पिछले युगों से भिन्न हैं। किंतु स्वयं परमेश्वर के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरंतरता और आगे का विकास है। जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपने वचन व्यक्त करता है और सीधे नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो वह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या वह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विस्तार और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य द्वारा किए गए कार्य का सार किसी स्थापित व्यवस्था का अनुसरण करना और "नए जूतों से पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा अपनाया गया मार्ग भी स्वयं परमेश्वर द्वारा शुरू किए गए मार्ग पर ही बना है। इसलिए, कुल मिलाकर मनुष्य फिर भी मनुष्य है, और परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है।

यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, बहुत-कुछ वैसे ही, जैसे अब्राहम के यहाँ इसहाक पैदा हुआ था। उसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया और बहुत कार्य किया, किंतु वह परमेश्वर नहीं था। बल्कि, वह नबियों में से एक था, क्योंकि उसने केवल यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था। उसका कार्य भी महान था, और केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने के बाद ही यीशु ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य शुरू किया। संक्षेप में, उसने केवल यीशु के लिए श्रम किया, और उसके द्वारा किया गया कार्य यीशु के कार्य की सेवा में था। उसके द्वारा मार्ग प्रशस्त किए जाने के बाद यीशु ने अपना कार्य शुरू किया, कार्य जो नया, अधिक ठोस और अधिक विस्तृत था। यूहन्ना ने कार्य का केवल शुरुआती अंश किया; नए कार्य का ज्यादा बड़ा भाग यीशु द्वारा किया गया था। यूहन्ना ने भी नया कार्य किया, किंतु उसने नए युग का सूत्रपात नहीं किया था। यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसका नाम उसके पिता जकरयाह के नाम पर रखना चाहते थे, परंतु उसकी माँ ने कहा, "इस बालक को उस नाम से नहीं पुकारा जा सकता। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।" यह सब पवित्र आत्मा के आदेश से हुआ था। यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के आदेश से रखा गया था, उसका जन्म पवित्र आत्मा से हुआ था, और पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी। यीशु परमेश्वर, मसीह और मनुष्य का पुत्र था। किंतु, यूहन्ना का कार्य भी महान होने के बावजूद उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना द्वारा किए गए कार्य में ठीक-ठीक क्या अंतर था? क्या सिर्फ यही एक कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया था? या इसलिए, क्योंकि इसे परमेश्वर द्वारा पहले से ही नियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है," और उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया था, किंतु उसका कार्य आगे नहीं बढ़ा और उसने मात्र शुरुआत की। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात करने के साथ-साथ पुराने युग का अंत भी किया, किंतु उसने पुराने विधान की व्यवस्था भी पूरी की। उसके द्वारा किया गया कार्य यूहन्ना के कार्य से अधिक महान था, और इतना ही नहीं, वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को पूरा किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और उसका अनुसरण करने वाले चेले भी बहुत थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों के लिए एक नई शुरुआत लेकर आने से बढ़कर कुछ नहीं किया। मनुष्य ने उससे कभी जीवन, मार्ग या गहरे सत्य प्राप्त नहीं किए, न ही मनुष्य ने उसके जरिये परमेश्वर की इच्छा की समझ प्राप्त की। यूहन्ना एक बहुत बड़ा नबी (एलिय्याह) था, जिसने यीशु के कार्य के लिए नई ज़मीन खोली और चुने हुओं को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मामले केवल उनके सामान्य मानवीय स्वरूप देखकर नहीं पहचाने जा सकते। यह इसलिए भी उचित है, क्योंकि यूहन्ना ने भी काफ़ी उल्लेखनीय काम किया; और इतना ही नहीं, पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा द्वारा समर्थन दिया गया था। ऐसा होने के कारण, केवल उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य के माध्यम से व्यक्ति उनकी पहचान के बीच अंतर कर सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य के बाहरी स्वरूप से उसके सार के बारे में बताने का कोई उपाय नहीं है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य यह सुनिश्चित कर सके कि पवित्र आत्मा की गवाही क्या है। यूहन्ना द्वारा किया गया कार्य और यीशु द्वारा किया गया कार्य भिन्न प्रकृतियों के थे। इसी से व्यक्ति यह निर्धारित कर सकता है कि यूहन्ना परमेश्वर था या नहीं। यीशु का कार्य शुरू करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। उसने इनमें से प्रत्येक चरण पूरा किया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरंभ में, यीशु ने सुसमाचार फैलाया और पश्चात्ताप के मार्ग का उपदेश दिया, और फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और संपूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने लगभग हर स्थान पर जाकर मनुष्य को उपदेश दिया और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया। इस दृष्टि से यीशु और यूहन्ना समान थे, अंतर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए, और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में उसने छुटकारे का कार्य पूरा किया। यूहन्ना यह कार्य कभी नहीं कर सकता था। और इसलिए, वह यीशु ही था जिसने स्वयं परमेश्वर का कार्य किया, और वही है जो स्वयं परमेश्वर है और सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की धारणाएँ कहती हैं कि वे सभी जो प्रतिज्ञा द्वारा जन्मे थे, पवित्र आत्मा से जन्मे थे, जिनका पवित्र आत्मा ने समर्थन किया था, और जिन्होंने नए मार्ग खोले, वे परमेश्वर हैं। इस तर्क के अनुसार, यूहन्ना भी परमेश्वर होगा, और मूसा, अब्राहम और दाऊद ..., ये सब भी परमेश्वर होंगे। क्या यह निरा मज़ाक नहीं है?

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