तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए (भाग एक)

पवित्र आत्मा वर्तमान समय में कलीसिया के भीतर किस प्रकार से कार्य कर रहा है? क्या तुम्हें इस प्रश्न की कोई ठोस समझ है? तुम्हारे भाइयों और बहनों की सबसे बड़ी कठिनाइयाँ क्या हैं? उनमें सबसे अधिक किस चीज की कमी है? वर्तमान में, कुछ लोग परीक्षणों से गुज़रने पर नकारात्मक हो जाते हैं, और उनमें से कुछ तो शिकायत भी करते हैं। अन्य लोग अब आगे नहीं बढ़ रहे हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बोलना समाप्त कर दिया है। लोगों ने परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। वे स्वतंत्र रूप से नहीं जी सकते, और वे अपना आध्यात्मिक जीवन नहीं बनाए रख सकते। कुछ लोग साथ-साथ अनुसरण करते हैं और ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, और जब परमेश्वर बोलता है तब अभ्यास करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब परमेश्वर नहीं बोलता, तो वे और आगे नहीं बढ़ते। लोगों ने अभी भी परमेश्वर की इच्छा को अपने दिल में नहीं समझा है और उनमें परमेश्वर के लिए स्वत:स्फूर्त प्रेम नहीं है; अतीत में उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण इसलिए किया था, क्योंकि वे मजबूर थे। अब कुछ लोग हैं, जो परमेश्वर के कार्य से थक गए हैं। क्या ऐसे लोग खतरे में नहीं हैं? बहुत सारे लोग सिर्फ निभाने की स्थिति में रहते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं, पर वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं, और उनमें अब वह सहज प्रवृत्ति नहीं है जो उनमें कभी थी। अधिकतर लोग शुद्धिकरण और पूर्ण बनाने के परमेश्वर के कार्य में रुचि नहीं रखते, और वास्तव में यह ऐसा है, मानो वे लगातार किसी अंत:प्रेरणा से रहित हों। जब वे पापों के वशीभूत हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस नहीं करते, न ही उनमें पश्चात्ताप अनुभव करने की जागरूकता होती है। वे सत्य की खोज नहीं करते और न ही कलीसिया को छोड़ते हैं, इसके बजाय वे केवल अस्थायी सुख ढूँढ़ते हैं। ये लोग मूर्ख हैं, एकदम मूढ़! समय आने पर वे बहिष्कृत कर दिए जाएँगे, और किसी एक को भी नहीं बचाया जाएगा! क्या तुम्हें लगता है कि यदि किसी को एक बार बचाया गया है, तो उसे हमेशा बचाया जाएगा? यह विश्वास शुद्ध धोखा है! जो लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, उन सभी को ताड़ना दी जाएगी। अधिकतर लोगों की जीवन में प्रवेश करने में, दर्शनों में, या सत्य का अभ्यास करने में बिलकुल भी रुचि नहीं है। वे प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, और वे अधिक गहराई से प्रवेश करने का प्रयास तो निश्चित रूप से नहीं करते। क्या वे स्वयं को बरबाद नहीं कर रहे? अभी कुछ लोग हैं, जिनकी स्थितियाँ लगातार बेहतर हो रही हैं। पवित्र आत्मा जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक आत्मविश्वास उनमें आता है, और जितना अधिक वे अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के कार्य के गहन रहस्य का अनुभव करते हैं। जितना गहरे वे प्रवेश करते हैं, उतना ही अधिक वे समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और वे अपने भीतर स्थिर और प्रबुद्ध महसूस करते हैं। उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। ये ही वे लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कुछ लोग कहते हैं : “यद्यपि परमेश्वर की ओर से कोई नए वचन नहीं हैं, फिर भी मुझे सत्य में और गहरे जाने का प्रयास करना चाहिए, मुझे अपने वास्तविक अनुभव में हर चीज के बारे में ईमानदार होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए।” इस तरह के व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यद्यपि परमेश्वर अपना चेहरा नहीं दिखाता और हर एक व्यक्ति से छिपा रहता है, और यद्यपि वह एक भी वचन नहीं बोलता और कई बार लोग कुछ आंतरिक शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं, फिर भी परमेश्वर ने लोगों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। यदि कोई व्यक्ति उस सत्य को बरकरार नहीं रख सकता, जिसका उसे पालन करना चाहिए, तो उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। शुद्धिकरण की अवधि के दौरान, परमेश्वर के स्वयं को नहीं दिखाने के दौरान, यदि तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास नहीं होता और तुम डरकर दुबक जाते हो, यदि तुम उसके वचनों का अनुभव करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, तो तुम परमेश्वर के कार्य से भाग रहे होते हो। बाद में, तुम उन लोगों में से एक होगे, जिनका बहिष्कार किया जाता है। जो लोग परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, वे संभवतः उसके गवाह के रूप में खड़े नहीं हो सकते। जो लोग परमेश्वर के लिए गवाही देने और उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं, वे सभी पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करने की अपनी अंत:प्रेरणा पर निर्भर हैं। परमेश्वर द्वारा लोगों में किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग हेतु उपयुक्त बनाने के लिए है। अभी तुम सभी जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह है रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना कि कोई नई चीज़ या रुझान है या नहीं, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे, क्योंकि वे उनके कार्य से थक गए हैं। वे केवल उन वचनों को सुनना चाहते हैं, जो वह आशीष देने के लिए बोलता है, और वे उसके न्याय और ताड़ना के वचनों को सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह जानबूझकर मानवजाति पर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, जो मनुष्य को जीवन देता है, और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।

परमेश्वर का वर्तमान कार्य लोगों में कुछ शुद्धिकरण लाता है, और जो लोग इस शुद्धिकरण के दौरान मजबूती से खड़े रह सकते हैं, केवल वे ही परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेंगे। भले ही वह स्वयं को कैसे भी छिपाए, न बोलकर या कार्य न करके, तुम फिर भी उत्साह के साथ अनुसरण कर सकते हो। यहाँ तक कि यदि परमेश्वर ने कहा कि वह तुम्हें अस्वीकार कर देगा, तुम फिर भी उसका अनुसरण करोगे। यह परमेश्वर की गवाही में खड़े होना है। यदि परमेश्वर स्वयं को तुमसे छिपाता है और तुम उसका अनुसरण करना बंद कर देते हो, तो क्या यह परमेश्वर की गवाही में खड़े होना है? यदि लोग वास्तव में प्रवेश नहीं करते, तो उनके पास वास्तविक कद-काठी नहीं है, और जब वे वास्तव में किसी महान परीक्षण का सामना करते हैं, तो वे लड़खड़ा जाते हैं। जब परमेश्वर नहीं बोलता, या कुछ ऐसा करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, तो तुम टूट जाते हो। यदि परमेश्वर वर्तमान में तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य कर रहा होता, यदि वह तुम्हारी इच्छा पूरी कर रहा होता और तुम खड़े होने और ऊर्जा के साथ अनुसरण करने में सक्षम होते, तो वह आधार क्या होता, जिस पर तुम जी रहे होते? मैं कहता हूँ कि बहुत लोग उस ढंग से जी रहे हैं, जो पूरी तरह से मानव-जिज्ञासा पर आधारित है! वे सच्चे दिल से खोज बिलकुल नहीं करते। जो लोग सत्य में प्रवेश का प्रयास नहीं करते, बल्कि जीवन में अपनी जिज्ञासा पर भरोसा करते हैं, वे सभी अधम लोग हैं, और खतरे में हैं! परमेश्वर के विभिन्न प्रकार के सभी कार्य मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए हैं। हालाँकि, लोग हमेशा उत्सुक होते हैं, वे सुनी हुई बात के बारे में पूछताछ करना चाहते हैं, वे विदेशों के वर्तमान मामलों के बारे में चिंतित होते हैं—उदाहरण के लिए, वे इस बारे में उत्सुक होते हैं कि इस्राएल में क्या हो रहा है, या मिस्र में कोई भूकंप तो नहीं आया—अपनी स्वार्थी इच्छाएँ पूरी करने के लिए वे हमेशा कुछ नई, अनूठी चीजों की तलाश करते रहते हैं। वे जीवन का अनुसरण नहीं करते, न ही वे पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। वे केवल परमेश्वर के दिन के शीघ्र आगमन की चाह रखते हैं, ताकि उनका सुंदर सपना पूरा हो जाए और उनकी असाधारण इच्छाएँ पूरी हो सकें। इस प्रकार का व्यक्ति व्यावहारिक नहीं होता—वह एक अनुचित परिप्रेक्ष्य वाला व्यक्ति होता है। केवल सत्य की तलाश ही परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की नींव है, और यदि लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, यदि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, तो वे दंड के भागी होंगे। जिन्हें दंडित किया जाना है, वे ऐसे लोग हैं, जिन पर परमेश्वर के कार्य के समय के दौरान पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ था।

परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान लोगों को उसके साथ कैसे सहयोग करना चाहिए? परमेश्वर वर्तमान में लोगों की परीक्षा ले रहा है। वह एक वचन भी नहीं बोल रहा; बल्कि स्वयं को छिपा रहा है और लोगों से सीधे संपर्क नहीं कर रहा है। बाहर से ऐसा लगता है, मानो वह कोई कार्य नहीं कर रहा, लेकिन सच्चाई यह है कि वह अभी भी मनुष्य के भीतर कार्य कर रहा है। जीवन में प्रवेश पाने की कोशिश करने वाले हर किसी के पास अपने जीवन की खोज के लिए एक दर्शन होता है, और उसे संदेह नहीं होता, भले ही वह परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से न समझता हो। परीक्षणों से गुजरते हुए, यहाँ तक कि जब तुम नहीं जानते कि परमेश्वर क्या करना चाहता है और वह क्या कार्य निष्पादित करना चाहता है, तब भी तुम्हें पता होना चाहिए कि मानवजाति के लिए परमेश्वर के इरादे हमेशा अच्छे होते हैं। यदि तुम सच्चे दिल से उसका अनुसरण करते हो, तो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा, और अंत में वह निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा, और लोगों को एक उचित मंजिल तक ले जाएगा। भले ही परमेश्वर वर्तमान में लोगों का किसी भी प्रकार से परीक्षण कर रहा हो, एक दिन ऐसा आएगा जब वह लोगों को उचित परिणाम प्रदान करेगा और उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उन्हें उचित प्रतिफल देगा। परमेश्वर लोगों को एक निश्चित बिंदु तक ले जाकर एक तरफ फेंक नहीं देगा और उन्हें अनदेखा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह एक विश्वसनीय परमेश्वर है। इस चरण में पवित्र आत्मा शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है। वह हर एक व्यक्ति को शुद्ध कर रहा है। मृत्यु और ताड़ना के परीक्षणों से युक्त कार्य के चरणों में शुद्धिकरण वचनों के माध्यम से किया गया था। लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए सबसे पहले उसके वर्तमान कार्य को समझना चाहिए और यह भी कि मानवजाति को कैसे सहयोग करना चाहिए। वास्तव में, यह कुछ ऐसा है, जिसे हर किसी को समझना चाहिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या करता है, चाहे वह शुद्धिकरण हो या भले ही वह बोल नहीं रहा हो, परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण मानवजाति की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होता। उसके कार्य का प्रत्येक चरण लोगों की अवधारणाओं को खंड-खंड कर देता है। यह उसका कार्य है। लेकिन तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर का कार्य एक निश्चित चरण में पहुँच गया है, इसलिए चाहे जो हो जाए, वह मानवजाति को मौत के घाट नहीं उतारेगा। वह मानवजाति को वादे और आशीष दोनों देता है, और वे सभी जो उसका अनुसरण करते हैं, उसके आशीष प्राप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन जो अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। यह तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हर एक व्यक्ति की उचित मंजिल होगी। परमेश्वर ने मनुष्यों को सुंदर आकांक्षाएँ प्रदान की हैं, लेकिन यदि वे अनुसरण नहीं करते, तो वे अप्राप्य हैं। तुम्हें अब इसे देखने में सक्षम होना चाहिए—परमेश्वर द्वारा लोगों का शुद्धिकरण और ताड़ना उसका कार्य है, लेकिन लोगों को अपनी तरफ से हर समय अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यावहारिक अनुभव में तुम्हें पहले जानना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएँ और पीएँ; तुम्हें उसके वचनों में यह ढूँढ़ना चाहिए कि तुम्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए और तुम्हारी कमियाँ क्या हैं, तुम्हें अपने व्यावहारिक अनुभव में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के उस भाग को लेना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए, और वैसा करने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना एक पहलू है। उसके अतिरिक्त, कलीसिया का जीवन बनाए रखा जाना चाहिए, तुम्हें एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए, और तुम्हें अपनी सभी वर्तमान अवस्थाओं को परमेश्वर को सौंपने में सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य रहना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन तुम्हारे सामान्य प्रवेश को बनाए रख सकता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन निर्बाध जारी रखना और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही काम है, जो लोगों को करना चाहिए। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है, लेकिन सामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह पूर्ण बनाया जाना है, जबकि एक असामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह एक परीक्षण है। पवित्र आत्मा के शुद्धिकरण के कार्य के वर्तमान चरण में, कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत महान है और कि लोगों को पूरी तरह से शुद्धिकरण की आवश्यकता है, अन्यथा उनकी अध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी हो जाएगी और उनके पास परमेश्वर की इच्छा प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, उनके लिए यह परमेश्वर का अनुसरण न करने और सभाओं में भाग न लेने या परमेश्वर के वचन को न खाने-पीने का एक कारण बन जाता है। परमेश्वर के कार्य में, चाहे वह कुछ भी करे या कोई भी बदलाव लाए, लोगों को एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन की एक आधार-रेखा अवश्य बनाए रखनी चाहिए। शायद तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के इस वर्तमान चरण में शिथिल नहीं हुए हो, लेकिन तुमने अभी भी बहुत-कुछ प्राप्त नहीं किया है, और बहुत अच्छी फसल नहीं काटी है। इस तरह की परिस्थितियों में तुम्हें अभी भी नियमों का पालन करना चाहिए; तुम्हें इन नियमों के अनुसार चलना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन में नुकसान न झेलो और ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करो। यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन असामान्य है, तो तुम परमेश्वर के वर्तमान कार्य को नहीं समझ सकते; बल्कि हमेशा महसूस करते हो कि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, और यद्यपि तुम उसका अनुसरण करने के लिए तैयार होते हो, लेकिन तुममें अंत:प्रेरणा का अभाव रहता है। तो भले ही परमेश्वर वर्तमान में कुछ भी कर रहा हो, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते, तो पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर सकता, और यदि लोगों के पास सहयोग करने वाला दिल नहीं है, तो वे शायद ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अपने अंदर पवित्र आत्मा का कार्य चाहते हो, और यदि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी मूल भक्ति बनाए रखनी चाहिए। अब, तुम्हारे पास गहन समझ, उच्च सिद्धांत, या ऐसी अन्य चीजों का होना आवश्यक नहीं है—बस इतना ही आवश्यक है कि तुम परमेश्वर के वचन को मूल आधार पर बनाए रखो। यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते, तो परमेश्वर उन चीजों को छीन लेगा, जो मूलत: उसकी थीं। अंदर से लोग हमेशा सुविधा के लोभी होते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जो पहले से ही उपलब्ध होता है। वे बिना कोई भी कीमत चुकाए परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये अनावश्यक विचार हैं, जो मनुष्य रखता है। बिना कोई कीमत चुकाए स्वयं जीवन प्राप्त करना—पर क्या कभी कुछ भी इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव चाहता है, तो उसे उसकी कीमत अवश्य चुकानी चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए, जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा, चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। यह ऐसा काम है, जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि तुम इस सबका एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो भी तुम्हें हमेशा इस पर टिके रहना चाहिए, और चाहे परीक्षण कितने भी बड़े हों, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य संबंध को जाने नहीं दे सकते। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया-जीवन को बनाए रखने, और अपने भाइयों और बहनों को कभी न छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले, तब भी तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए। आध्यात्मिक जीवन के लिए यह न्यूनतम अपेक्षा है। हमेशा खोज करने की इच्छा रखना, सहयोग करने का भरसक प्रयास करना, अपनी समस्त ऊर्जा लगा देना—क्या यह किया जा सकता है? यदि लोग इसे आधार के रूप में लें, तो वे विवेक हासिल करने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। तुम्हारी स्वयं की अवस्था सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान है, इन परिस्थितियों में सत्य का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तो परमेश्वर का कार्य कितना भी महान क्यों न हो, और चाहे कोई कितनी भी खूबसूरती से क्यों न बोलता हो, तुम उस पर कोई ध्यान नहीं दोगे। जब व्यक्ति की हालत सामान्य नहीं होती, तो परमेश्वर उसमें कार्य नहीं कर सकता, और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकते।

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