परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (4)" | अंश 26

अंत के दिनों का कार्य वचनों को बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों में हुए परिवर्तन उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जो चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों पर हुए थे। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना करने के साथ ही दुष्टात्माएँ मनुष्य से निकल जाती थी, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा किया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु बस वह कार्य, कि किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकला जा सकता है, उसमें नहीं किया गया था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना रहा था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अज्ञात और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा यह विश्वास किया कि वह दाऊद का पुत्र है और उसके एक महान भविष्यद्वक्ता और उदार प्रभु होने की घोषणा की जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र के छोर को छू कर ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। हालाँकि, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं समझ सका और न ही मनुष्य यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई के इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उनका ईश्वरीय प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक अच्छा विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। उन्होंने बस पाप किए थे, फिर परिवर्तित स्वभाव की ओर बिना किसी मार्ग वाले निरंतर चक्र में पाप-स्वीकारोक्ति की थी; अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया था? नहीं! इसलिए, उस चरण के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाता है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर नहीं किया जायेगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उनके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए कहता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

अंत के दिनों में परमेश्वर इंसान का न्याय और शुद्धिकरण वचनों से करता है

अंत के दिनों का काम है वचन बोलना। वचनों से इंसान में बड़े बदलाव आते हैं, उन्हें स्वीकारने वालों में होते हैं और बड़े बदलाव, उनसे ज़्यादा, जिन्होंने अनुग्रह के युग में स्वीकार किए थे चिह्न और चमत्कार। उस युग में हैवान निकाले गए थे बाहर सिर पर हाथ रखकर और प्रार्थना करके, जबकि इंसान का भ्रष्टाचार है अभी भी बना हुआ, इंसान का भ्रष्टाचार है अभी भी बना हुआ, जबकि इंसान का भ्रष्टाचार है अभी भी बना हुआ।

आदमी चंगा हो गया, पाप हो गया माफ़, लेकिन काम अभी भी किया जाना था इंसान को अपना भ्रष्ट स्वभाव खत्म करने लायक बनाने के लिए। इंसान अपने विश्वास के कारण बच गया, पर उसका पापी स्वभाव अभी भी है बना हुआ। देहधारी परमेश्वर के माध्यम से माफ़ हुए इंसान के पाप। लेकिन इंसान के भीतर अभी भी पाप था, इंसान के भीतर अभी भी पाप था, लेकिन इंसान के भीतर अभी भी पाप था।

काम का वो चरण पूरा किए जाने के बाद भी न्याय का काम अभी बचा हुआ है। वचनों से शुद्ध करके इंसान को, दिया जाता है एक मार्ग इस चरण में। पाप-बलि के माध्यम से, कर दिए गए हैं माफ़, इंसान के सभी पाप, क्योंकि सूली पर चढ़ाने का काम पहले ही ख़त्म हो गया है। परमेश्वर शैतान से जीत गया है, शैतान से जीत गया है, परमेश्वर शैतान से जीत गया है।

लेकिन भ्रष्ट स्वभाव अभी भी इंसान के भीतर है। इंसान अभी भी कर सकता है पाप, और परमेश्वर का विरोध, इसलिए परमेश्वर ने इंसान को अभी भी हासिल नहीं किया। इसलिए इस चरण में उजागर करता परमेश्वर वचनों से इंसान के भ्रष्टाचार, ताकि वो चले सही राह पर।

ज़्यादा मायने हैं इस चरण के, ये अधिक फलदायी है, क्योंकि अब वचन करे इंसान के जीवन की आपूर्ति, ये मनुष्य को नया होने का अवसर देता है; ये काम का गहन चरण है। अंत के दिनों में परमेश्वर का देहधारी होना पूरा करे देहधारण के मायने और इंसान को बचाने की परमेश्वर की योजना। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में। वचन करे शुद्ध इंसान को अंत के दिनों में।

“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

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