परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर" | अंश 137

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह दिव्यता के भीतर केवल अपना कार्य करता है। यही स्वर्गिक परित्रात्मा ने देहधारी परमेश्वर को सौंपा है। जब वह आता है, तो वह हर जगह केवल बातें करने के लिए, अपने कथनों को भिन्न-भिन्न तरीकों से और भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से कहने के लिए जाता है। वह अपने लक्ष्यों और कार्य करने के सिद्धांत के रूप में मुख्यतः मनुष्य को आपूर्ति करने और मनुष्य को पढ़ाने को लेता है और वह अपने आप को किसी के अंतर्वैयक्तिक संबंधों या लोगों के जीवन के विवरण जैसी बातों के विषय में चिंता में नहीं पड़ने देता है। पवित्रात्मा के लिए बोलना उसकी मुख्य सेवकाई है। जब परमेश्वर का आत्मा मूर्त रूप से देह में प्रकट होता है, तो वह केवल मनुष्य के जीवन का भरण पोषण करता है और सत्य को प्रकाशित करता है। वह मनुष्य के कार्य में शामिल नहीं होता है, जिसका अर्थ है कि, वह मानवता के कार्य में भाग नहीं लेता है। मनुष्य दिव्य कार्य नहीं कर सकता है, और परमेश्वर मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है। परमेश्वर के अपना कार्य करने के लिए धरती पर आने के बाद के सभी वर्षों में, उसने इसे हमेशा लोगों के माध्यम से किया है। परन्तु इन लोगों को देहधारी परमेश्वर नहीं माना जा सकता है; वे केवल परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोग माना जा सकता है। परन्तु आज का परमेश्वर, आत्मा की आवाज़ को आगे भेजते हुए, और पवित्रात्मा की ओर से कार्य करते हुए, दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से सीधे बात कर सकता है। युगों भर में परमेश्वर ने जिन सभी लोगों का उपयोग किया है, इसी प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा के दैहिक शरीर में कार्य करने के उदाहरण हैं, तो वे परमेश्वर क्यों नहीं कहे जा सकते हैं? बल्कि आज का परमेश्वर भी परमेश्वर का आत्मा है जो सीधा देह में कार्य कर रहा है, और यीशु भी परमेश्वर का आत्मा था जो कि देह में कार्य कर रहा था; ये दोनों परमेश्वर कहलाते हैं। तो फ़र्क क्या है? युगों भर में, वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने उपयोग किया है सामान्य सोच और तर्क में सक्षम हैं। वे सभी मानव आचरण के सिद्धांतों को जानते हैं। उनके पास सामान्य मानव विचार हैं और वे उन सभी चीज़ों से सुसज्जित हैं जो साधारण लोगों के पास होनी चाहिए। उनमें से अधिकतर लोगों के पास असाधारण प्रतिभा और सहज ज्ञान है। उन लोगों पर कार्य करने में, परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं का उपयोग करता है, जोकि उनमें परमेश्वर-प्रदत्त प्रतिभाएँ हैं। परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर की सेवा में उनकी शक्तियों का उपयोग करके उनकी प्रतिभाओं से काम लेता है। हालाँकि, परमेश्वर का सार विचार-मुक्त और सोच-मुक्त है, उसमें मनुष्य के इरादों की मिलावट नहीं है और यहाँ तक कि उसमें उन बातों का भी अभाव है जिससे सामान्य मनुष्य सुसज्जित होते हैं। कहने का अर्थ है कि, परमेश्वर यहाँ तक कि मानव आचरण के सिद्धांतों का भी जानकार नहीं है। जब आज का परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब ऐसा ही होता है। उसका कार्य और उसके वचन मनुष्य के इरादों या मनुष्य के विचार की मिलावट से रहित होते हैं, किन्तु वे पवित्रात्मा के इरादों की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं, और वह सीधे परमेश्वर की ओर से कार्य करता है। इसका अर्थ है कि पवित्रात्मा मनुष्य के इरादों को जरा सा भी मिश्रित किए बिना कार्य करने के लिए आगे आता है। अर्थात्, देहधारी परमेश्वर सीधे दिव्यता का मूर्तरूप है, मनुष्य की सोच या विचार से रहित है, और मानव आचरण के सिद्धांतों की कोई समझ नहीं रखता है। यदि केवल दिव्यता कार्य कर रही होती (अर्थात् यदि केवल परमेश्वर स्वयं कार्य कर रहा होता), तो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य किए जाने का कोई तरीका नहीं होता। इसलिए जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, उसे थोड़ी सी संख्या में लोग रखने ही पड़ते हैं जिन्हें वह उस कार्य के साथ संयोजन में मानवता में कार्य करने के लिए उपयोग करता है जिसे परमेश्वर दिव्यता में करता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने दिव्य कार्य का समर्थन करने के लिए मनुष्य के कार्य का उपयोग करता है। अन्यथा, दिव्य कार्य के सीधे संपर्क में आने के लिए मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं होगा। यीशु और उसके अनुयायियों के साथ ऐसा ही था। दुनिया में अपने समय के दौरान यीशु ने पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया था और नयी आज्ञाओं की स्थापना की थी। उसने बहुत से वचन भी कहे थे। यह सब कार्य दिव्यता में किया गया था। पतरस, पौलुस, और युहन्ना जैसे अन्य सभी लोगों ने अपने बाद के कार्य को यीशु के वचनों की बुनियाद पर स्थापित किया। अर्थात्, उस युग में परमेश्वर अपना कार्य आरंभ कर रहा था, अनुग्रह के युग के आरंभ का सूत्रपात कर रहा था; अर्थात्, पुराने युग को समाप्त करके, और "परमेश्वर ही आरम्भ और अंत है" वचनों को पूरा करके, वह एक नए युग को लाया। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अवश्य दिव्य कार्य की बुनियाद पर मानव कार्य करना चाहिए। यीशु ने जब वह सब कुछ कह दिया जो उसे कहने की आवश्यकता थी और पृथ्वी पर अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह मनुष्यों के बीच से प्रस्थान कर गया। इसके बाद, लोगों ने, कार्य करने में, उसके वचनों में व्यक्त सिद्धांतों के अनुसार वैसा ही किया, और उसके द्वारा बोले गए सत्य के अनुसार अभ्यास किया। ये सभी यीशु के लिए कार्य करने वाले लोग थे। यदि यीशु अकेले ही कार्य कर रहा होता, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने कितने वचन बोले थे, तब भी लोग उसके वचनों के संपर्क में आने में समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह दिव्यता में कार्य कर रहा था और केवल दिव्यता के वचन ही बोल सकता था, और वह चीज़ों को उस स्तर तक नहीं समझा सकता था जहाँ साधारण लोग उसके वचनों को समझ सकते थे। और इसलिए उसे प्रेरित और नबी रखने पड़े जो उसके बाद में उसके कार्य को पूरा करने के लिए आए। यही वह सिद्धांत है कि कैसे देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करता है—दिव्यता के कार्य को पूरा करने हेतु, बोलने और कार्य करने के लिए देहधारी की देह का उपयोग करता है, और फिर अपने कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर के पसंद के कुछ या अधिक लोगों का उपयोग करता है। अर्थात्, मानवता में चरवाही करने और सींचने का कार्य करने के लिए परमेश्वर अपने समान विचार वाले लोगों का उपयोग करता है ताकि सभी लोग सत्य को प्राप्त कर सकें।

यदि देह में आने में, परमेश्वर अपने साथ परमेश्वर के समान विचार वाले कुछ अतिरिक्त लोगों को लिए बिना केवल दिव्यता का कार्य करता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर की इच्छा को समझने या परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई तरीका नहीं होता। अपने कार्य को पूरा करने, कलीसियाओं की देख-रेख करने और उनकी चरवाही करने, उस स्तर तक पहुँचने जहाँ मनुष्य की संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ, उसका मस्तिष्क मुग्ध करने में सक्षम है, के लिए परमेश्वर को अपने समान विचार वाले सामान्य लोगों का उपयोग अवश्य करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर उस कार्य की "व्याख्या" करने के लिए, जिसे वह अपनी दिव्यता में करता है, अपने समान विचार वाले लोगों की थोड़ी सी संख्या का उपयोग करता है, ताकि इसे प्रकट किया जा सके, अर्थात्, दिव्य भाषा को मानव भाषा में रूपांतरित करना, इसे ऐसा बनाना ताकि सभी लोग इसे बूझ सकें, सब उसे समझ सकें। यदि परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया होता, तो कोई भी परमेश्वर की दिव्य भाषा को कोई नहीं समझता, क्योंकि परमेश्वर के समान विचार वाले लोगों की संख्या, अंततः, थोड़ी सी ही है, और मनुष्य की समझने की क्षमता कमज़ोर है। यही कारण है कि देहधारी परमेश्वर देह में कार्य करते समय केवल इस विधि को चुनता है। यदि केवल दिव्य कार्य ही होता, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर को जानने और उसके संपर्क में आने का कोई तरीका नहीं होता, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की भाषा को नहीं समझता है। मनुष्य इस भाषा को केवल उन्हीं लोगों की एजेंसी के माध्यम से ही समझ सकने में समर्थ है जिनके विचार परमेश्वर के समान हैं जो उसके वचनों को स्पष्ट करते हैं। हालाँकि, यदि मानवजाति के भीतर कार्य करने वाले केवल ऐसे ही लोग होते, तो वह केवल मनुष्य के सामान्य जीवन को ही बनाए रख सकता था, यह मनुष्य के स्वभाव को रूपांतरित नहीं कर सकता था। तब परमेश्वर का कार्य एक नया शुरुआती बिन्दु नहीं होता; वहाँ केवल वही पुराने गीत होते, वही पुरानी मामूली बातें होती। केवल देहधारी परमेश्वर की एजेंसी के माध्यम से ही, अपने देहधारण की अवधि के दौरान वह सब कुछ कहता है जो कहे जाने की आवश्यकता है और वह सब कुछ करता है जो किए जाने की आवश्यकता है, जिसके बाद लोग उसके वचनों के अनुसार कार्य करते हैं और अनुभव करते हैं, केवल इस प्रकार से ही उनका जीवन स्वभाव बदलने में समर्थ होता है और वे समय के साथ चलने में समर्थ हो जाएँगे। जो कोई दिव्यता में कार्य करता है वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि जो मानवता के भीतर कार्य करते हैं वे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए लोग हैं। अर्थात्, देहधारी परमेश्वर उन लोगों से मौलिक रूप से भिन्न है जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं। देहधारी परमेश्वर दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, जबकि परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग समर्थ नहीं हैं। प्रत्येक युग के आरंभ में, नया युग शुरू करने के लिए और मनुष्य को एक नई शुरुआत में लाने के लिए परमेश्वर का आत्मा व्यक्तिगत रूप से बोलता है। जब वह अपना बोलना पूरा कर लेता है, तो यह प्रकट करता है कि परमेश्वर की दिव्यता के भीतर उसका कार्य हो गया है। उसके बाद, सभी लोग अपने जीवन अनुभव में प्रवेश करने के लिए उन लोगों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। उसी तरीके से, यही वह चरण भी है जिसमें परमेश्वर मनुष्य को नए युग में लाता है और हर एक को एक आरंभिक स्थिति देता है। इसके साथ ही, देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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